किस्सा प्रद्युम्न का :
चारुदत्त मुखर्जी का छोटा सा परिवार है। बिलासपुर के रेलवे स्टेशन मास्टर हैं। कलकत्ता से नौकरी के चक्कर में यहाँ आए और यहीं के होकर रह गए। बीस साल से बिलासपुर के आसपास के स्टेशनों में पोस्टिंग होती रही इसलिए टिकरापारा में एक घर किराया में ले लिया और जब बाहर पोस्टिंग हुई तो बीच-बीच में वहां से बिलासपुर आना-जाना करते रहे। बिलासपुर में बसना उनकी मजबूरी थी क्योंकि शाश्वती और प्रद्युम्न की पढ़ाई शहर में ही हो सकती थी। चारुदत्त की पत्नी मधुमिता कलकत्ता के एक सुसंस्कृत परिवार की पढ़ी-लिखी कन्या थी इसलिए उसके बच्चे पढ़-लिख कर तरक्की करें, अच्छी नौकरी में लग जाएँ, ऐसा वह चाहती थी। रेलवे की नौकरी में ट्रांसफर होते रहते हैं, चारुदत्त भटकते रहते थे और मधुमिता बच्चों के पालन-पोषण तथा पढ़ाई की ज़िम्मेदारी देखती थी।
शाश्वती पढ़ने-लिखने में तेज थी जबकि प्रद्युम्न कमजोर, स्कूल में किसी प्रकार पास हो जाता था लेकिन उसका रुझान क्रिकेट में अधिक था। मोहल्ले में एक वरदू अण्णा थे, क्रिकेट की अम्पायरिंग किया करते थे, उनकी नज़र प्रद्युम्न के खेल पर पड़ी। उन्हें लगा कि इस लड़के में दम है, अच्छा 'आलराउंडर' बन सकता है तो वे प्रद्युम्न के अघोषित द्रोणाचार्य बन गये। कोई भी मौसम हो, रोज सुबह रेलवे के क्रिकेट ग्राउंड में दोनों पहुँच जाते और दूसरे खिलाड़ियों के आने के पहले 'वार्म-अप' होने की दौड़-भाग करते। वरदू अण्णा प्रद्युम्न के पिता की उम्र के थे लेकिन 'स्टेमिना' में प्रद्युम्न से बहुत आगे थे। गुरु अगर चेले से अधिक दमदार हो तो चेले की दुर्दशा तय है, प्रद्युम्न बहुत थक जाता लेकिन वरदू अन्ना उसको मैदान के दस चक्कर दौड़ा मानते। प्रद्युम्न बोलता, "ऐसे में किसी दिन मेरी सांस उखड़ जाएगी अण्णा।"
''उखड़ जाने दे. सांस वापस लाने की जिम्मेदारी मेरी है।"
"आप भगवान हो क्या जो मेरी प्राण वापस ले आओगे?"
"मैं भगवान नहीं हूँ, तेरा कोच हूँ। तेरे को मालूम है कि दौड़ने से कोई नहीं मरता। बच्चू, क्रिकेट सीखना सरल है लेकिन क्रिकेट खेलना कठिन है और उससे भी अधिक कठिन है उसकी 'टेक्नीक' सीखना।"
"तो सिखाओ न..... इतना दौड़ाते क्यों हो?"
"दौड़ेगा नहीं तो क्या खड़े-खड़े 'फील्डिंग', 'बॉलिंग' करेगा? पिच पर खड़े-खड़े दौड़ेगा?"
"आपकी बात सही है लेकिन मैं बहुत थक जाता हूँ अण्णा। दौड़ने के बाद क्रिकेट खेलना और अधिक थका देता है."
"तू एक काम कर, क्रिकेट का चक्कर छोड़। घर में आराम से दस बजे सोकर उठाकर और कल से अपनी सूरत मुझे नहीं दिखाना।"
"लो, आप तो गुस्सा हो गए, मैं तो अपनी तकलीफ बता रहा था।"
"एक बात याद रख, कोई भी खेल हो, मेहनत मांगता है, लगन मांगता है। खेलकूद आलसी लोगों का काम नहीं है. इस बात को अच्छी तरह समझ ले कि पढ़ाई में केवल दिमाग लगता है लेकिन खेल में दिमाग और ताकत दोनों लगता है, समझा?"
"समझा।" प्रद्युम्न अपना सर झुकाकर बोला।
"नो पेन, नो गेन।" वरदू अण्णा गरजे, "चल दौड़, एक चक्कर और लगा कर आ।"
* * * * *
शाश्वती की अपनी मां से बहुत पटती थी, पटती क्या थी, शाश्वती पटा कर रखती थी क्योंकि पापा की कैशियर मम्मी थी. राशन से लेकर कपड़ों तक, फीस से लेकर किताबों तक, सिनेमा से लेकर घूमने-फिरने तक जो भी खर्च होता, वह मम्मी के जरिए होता, मम्मी की मर्जी से होता। मम्मी हमेशा बचत के साथ चलती है लेकिन दुनिया तो खर्चीली है इसलिए कई बार टकराव की स्थिति आ जाती लेकिन मान-मनव्वल के बाद बीच का कोई रास्ता निकल जाता। जेबखर्च रोज लगता है क्योंकि कालेज के बाहर खड़ा रहने वाला चाट का ठेला रोज ललचाता है लेकिन मम्मी है जो उस बात को समझती नहीं। एक बात और है आपको बताने लायक, प्रद्युम्न जब कभी पैसे मांगता है तो मम्मी ज्यादा बहस नहीं करती, उसको सहज ही दे देती है, यह बात गलत है न? हम लड़कियों से दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों किया जाता है? मम्मी भी तो कभी लड़की रही होगी, उसको समझना चाहिए। कब तक कोई सहेगा? एक दिन भिड़ंत हो गयी.
"मां, मेरे अंडर गारमेंट फट रहे हैं, आज गोलबाज़ार चल कर दिलवा दो न?" शाश्वती ने कहा.
"कैसा पहनती है रे तू ? तेरे कपड़े इतनी जल्दी फट जाते हैं?"
"तो क्या मैं फाड़ती हूँ?"
"यह तो मैंने नहीं कहा."
"पटक-पटक कर धोने से कपड़े जल्दी फट जाते हैं."
"तो मत पटका कर."
"बिना पटके कपड़े साफ़ कैसे होंगे?"
"तू सवाल बहुत करती है."
"मैंने कोई गैरवाजिब सवाल किया क्या? आपसे पूछ रही हूँ कि बिना पटके कपड़े कैसे साफ़ होते हैं, जब आप बताओगी तब तो मुझे समझ आएगा।"
"देख बेटा, जब भी कोई कपड़ा धोना होता है तब पहले उसे सादे पानी में कुछ देर के लिए भिगाते हैं, फिर साबुन वाले पानी में आधे घंटे के लिए छोड़ देते हैं. उसके बाद हल्के हाथ से रगड़ कर साफ़ करने से मैल आसानी से निकल जाता है. सिंपल है."
"ठीक है, मैं समझ गयी लेकिन अभी तो नए लेने होंगे।"
"कुछ दिन और चला अभी."
"मां, मैं सोचती हूँ कि तुमको देश का फायनेंस मिनिस्टर होना चाहिए, कहाँ यहां बिलासपुर में अपना टाइम खराब कर रही हो?"
"मैं और फायनेंस मिनिस्टर?"
"हाँ, सच कह रही हूँ मैं, लेकिन तुम अगर उस कुर्सी में बैठ गयी तो देश की तरक्की ठप्प हो जाएगी।"
"भला क्यों?"
"पैसा नहीं दोगी तो देश कैसे चलेगा? इतनी कंजूसी से काम नहीं चलता मां।"
"तो मैं कंजूस हूँ?"
"नहीं, बहुत दिलदार हो. मेरे ज़रा से खर्चे के लिए इतना गुणा-भाग लगा रही हो, अभी प्रद्युम्न कुछ कहेगा तो तुम्हारा पर्स तुरंत खुल जाएगा।"
"बीच में प्रद्युम्न कहां से आ गया?"
"ये तो आपके समझने की बात है."
"ठीक है बाबा, कल मैं बाज़ार जाऊंगी तो तू भी चलना और जो चाहिए, ले लेना।" मधुमिता ने कहा.
"मेरी अच्छी मां।" शाश्वती बोली।
* * * * *
साधारण नौकरीपेशा परिवारों की सफलता का मापदंड बहुत बड़ा नहीं होता. थोड़ी सी वेतनवृद्धि या तरक्की उन्हें सुख दे जाती है. वे आदतन मितव्ययी होते हैं क्योंकि उनका आज बहुत कठिन बीतता है, कल के लिए बचाना तो जैसे सपना है. जो तनख्वाह में जबरिया काट-पीट होती है, वही उनके भविष्य की बचत होती है. रेल्वे की नौकरी में, चाहे जो काम हो, हर समय चौकस रहना पड़ता है. स्टेशन मास्टर का काम सबसे अधिक जिम्मेदारी का होता है, नज़र चूकी और दुर्घटना घटी. चारुदत्त अपने काम से खुश था लेकिन अपने ट्रांसफर से दुखी था क्योंकि उसे अपना परिवार बिलासपुर में रखना पड़ता और वह अकेले छोटे-छोटे स्टेशनों की तंग खोलियों में अपनी साप्ताहिक छुट्टियों का इंतज़ार करता पड़ा रहता और छुट्टी मिलते ही अगली गाड़ी से बिलासपुर के लिए रवाना हो जाता. सवारी गाड़ी यदि बिलम्ब से चल रही हो तो माल गाड़ी पकड़ लेता और जब घर आता तो मधुमिता को अपनी बाहों में इस तरह कसता कि मधुमिता अकबका जाती और कहती, "छोड़ो न, मेरा दम घुट जाएगा."
"इतने दिन बाद मिली हो, जी भर कर मिल लेने दो."
"आज ही मिलना है? बाद में मिलने के लिए ज़िंदा नहीं छोड़ोगे क्या?'
"कल किसने देखा है मधु?'
"ये कैसा पागलपन है?"
"तुम्हारे कारण है."
"मेरे कारण? मेरा क्या दोष है?"
"तुम नहीं समझोगी."
"मैं क्यों नहीं समझूंगी?"
"इस बात को समझने के लिए एक और जन्म लेना पड़ेगा, पुरुष बनकर."
"हाय, पुरुष क्या इतने उतावले होते हैं?"
"कोई उन्हें उतावला बना देता है."
"कौन बना देता है?"
"फिलहाल तो तुम."
"और?"
"औरों की छोड़ो, तुम नाराज़ हो जाओगी."
"कोई और है क्या?' मधुमिता ने लाड़ दिखाते हुए प्यार से पूछा.
"नज़रों में बहुत हो सकती हैं लेकिन नज़दीकी में सिर्फ तुम हो."
"अच्छा अभी तो छोड़ो, बच्चों के आने का समय हो गया है."
"यही तो, बच्चे जब तक नहीं आते, तब तक यूं ही मेरे करीब रहो. यार, तुम भागती क्यों हो?"
"भाग कर कहाँ जाऊंगी मैं? पर मुझे बाथरूम तो जाने दो." मधुमिता ने चारुदत्त की बाहों से स्वयं को मुक्त करते हुए कहा. तब ही काल-बेल बजी और बाहर से शाश्वती की आवाज़ आयी, "माँ."
* * * * *
बचपन में लगता है कि बड़े होकर टीचर बनेंगे क्योंकि उस समय वे ही हमारे रोल-माडल होते हैं। किशोरावस्था में पायलट या एयर-होस्टेस बनने का जुनून होता है क्योंकि आसमान में उड़ता हवाई जहाज उसे जमीन से ऊंचे होने का एहसास कराता है। इसी उम्र में वह खिलाड़ी बनना चाहता है, सेना या पुलिस में जाना चाहता है, लेखक या कवि बनना चाहता है। युवावस्था का स्पर्श उसकी चुनौतियों को और बढ़ाता है। पढ़ाई पूरी होते ही समझ में आ जाता है कि भविष्य की कल्पनाएँ महज़ कागज की नाव थी, न जाने कहाँ बह कर दूर निकल गयी! अब दिशाभ्रम शुरू होता है। परिवार की उम्मीदें कुछ और है, उसके मन में कुछ और। हर दरवाजे में उसका भविष्य उसे बुला रहा है, "आओ, मेरे पास आओ" लेकिन कभी इस दरवाजे, कभी उस दरवाजे से निकलने की कोशिश करता युवा जल्द ही समझ जाता है कि जिस दरवाजे को वह पसंद करता है, वह उसके लिए नहीं है क्योंकि उसमें अनेक मुश्किलें हैं जिन्हें हल करना उसके वश में नहीं है। प्रगति के लिए खुले दरवाजे उसके साधक न बन कर बाधक बन जाते हैं क्योंकि जितने अधिक दरवाजे, उतने अधिक विकल्प, उतनी अधिक भ्रांतियाँ। "इधर जाऊँ या उधर जाऊँ, बड़ी मुश्किल है, किधर जाऊँ?" अंततः वह जो चाहता है, उसे नहीं मिलता।
चारुदत्त घर आए हुए हैं. रात के भोजन में सब साथ बैठकर चर्चा कर रहे हैं. चारुदत्त ने कहा, "आज माछ-भात बहुत बढ़िया लग रहा है।"
"शाश्वती ने बनाया है." मधुमिता ने बताया।
"अरे वाह, मतलब यह हुआ कि शाश्वती को भी तुमने खाना बनाना सिखा दिया?"
"लड़की है तो खाना बनाना सीखना ही पड़ेगा।"
"पर मैं तो डाक्टर बनूंगी।" शाश्वती बीच में कूद पड़ी।
"डाक्टर बनेगी तो क्या खाना नहीं बनाएगी?" मधुमिता ने हस्तक्षेप किया।
"फुर्सत कहाँ मिलेगी फिर?"
"ठीक है, देखो सब लोग, सुनो शाश्वती की बात, डाक्टर बनी नहीं है और अभी से बिजी हो गयी।"
"मैं मजाक नहीं कर रही हूँ, सीरियस हूँ मम्मी।" शाश्वती ने कहा।
"मालूम है कि तू सीरियस है लेकिन डाक्टर बनना मजाक नहीं है. सब सोचते हैं, कलेक्टर बन जाएं, डाक्टर बन जाएं लेकिन कितने हैं जो बन पाते हैं?" प्रद्युम्न ने कहा।
"मैं बनूंगी, तू चुप रह। हर समय क्रिकेट में डूबा रहता है तो क्या तू टेस्ट प्लेयर बन जाएगा?" वह भड़की।
"तू अगर डाक्टर बन सकती है तो मैं भी बन जाऊंगा।"
"लगी शर्त?"
"लगी।"
"क्या?"
"जो तू बोल।"
"रात को सोच कर बताती हूँ।" शाश्वती ने कहा. चारुदत्त और मधुमिता उनकी बात सुनकर प्रसन्न हो रहे थे, चुनौतियों के परिणाम कई बार अच्छे जो निकलते हैं।
* * * * *
क्रिकेट की अंतर्जिला प्रतियोगिता बिलासपुर के रघुराजसिंह खेल मैदान में चल रही है। आज प्रद्युम्न 'नंबर थ्री' पर बैटिंग के लिए उतरने वाला है।
वरदू अन्ना ने उसका हौसला बढ़ाया, 'आज तुम्हारा 'टेस्ट' है। इतने समय से तुम क्रिकेट में पैर जमाने की कोशिश कर रहे हो, उसका ये पहली परीक्षा है। आज नए खिलाड़ियों के साथ खेलने में तुम्हें समझ आएगा कि तुम कहाँ हो। रायपुर की क्रिकेट टीम में बहुत अच्छे 'बालर' हैं, 'स्पिनर' और 'फास्ट' दोनों। उनका सामना करना है, अपना 'विकेट' बचाते हुए धीरे-धीरे 'सेट' होना है, उनकी 'बालिंग' को समझते हुए 'रन' बनाना है। एक बात ध्यान रखो, केवल अपने लिए नहीं खेलना है, अपनी 'टीम' के लिए खेलना है। हिम्मत के साथ उतरो, घबराए और भैस गयी पानी में, समझे?'
'जी सर,समझ गया।' प्रद्युम्न ने कहा।
मैच शुरू हुआ। जब प्रद्युम्न 'बैटिंग' के लिए उतरा तो वह आत्मविश्वास से लबरेज़ था। 'अंपायर' से उसने 'गार्ड' लिया और 'बाल' का इंतज़ार करने लगा। पहली बाल सामान्य थी लेकिन अगली बाल तेजी से ऊपर उठी और बल्ले से टकराने की बजाय उसके कान के ऊपर सिर से टकराई। प्रद्युम्न अपना सिर पकड़ कर 'पिच' में बैठ गया, कुछ देर में बेहोश हो गया खेल रुक गया। सब उसकी ओर दौड़े। वरदू अन्ना चीखे, 'इसको अस्पताल ले चलो, चोट गहरी है।'
तीन खिलाड़ियों ने उसे किसी प्रकार संभालते हुए उठाया और मैदान के बाहर ले गए। एक रिक्शा बुलाया और उसे रेल्वे हास्पिटल ले चले। साथ में वरदू अन्ना और एक खिलाड़ी बैठकर निकले और एक खिलाड़ी प्रद्युम्न के घर की ओर साइकल से निकल पड़ा, घर में खबर करने के लिए.
अस्पताल में डाक्टर ने जांच की, इंजेक्शन लगाया और होश आने तक इंतज़ार करने को कहा. इतने में प्रद्युम्न के मम्मी-पापा भी आ गए. मम्मी की आँखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे, 'क्या हो गया मेरे लाल को? किसने मारा इसको? क्यों मारा? आग लगे ऐसे खेल को.' चारुदत्त भी चिंतित थे लेकिन वे समझा रहे थे, 'सब ठीक हो जाएगा, अपने प्रद्युम्न को कुछ नहीं होगा।'
दो दिनों तक प्रद्युम्न की हालत यथावत रही, अब सबको घबराहट होने लगी। प्रद्युम्न को कहाँ ले जाएँ? कैसे होश आएगा? जैसे सवाल उठाना लगे तब ही अचानक प्रद्युम्न ने आँखें खोली और पूछा, 'क्या हुआ मैच का?'
'भाड़ में गया तेरा मैच।' प्रद्युम्न की मम्मी ने चिढ़ कर कहा।
'ऐसा क्यों कहती हो मम्मी?'
'तेरे सिर पर बाल लगी थी, दो दिनों से बेहोश था तू, अभी तुझे होश आया तो तू पूछ रहा है, क्या हुआ मैच का?'
'मुझे कुछ याद नहीं है। अरे, मैं तो अस्पताल में हूँ।'
'हाँ बेटा, अब तू ठीक हो रहा है, भगवान ने हमारी सुन ली। अब तू भी सुन ले, अब से तू क्रिकेट नहीं खेलेगा, समझा?' प्रद्युम्न की माँ मधुमिता ने अपना फैसला सुनाया। प्रद्युम्न चुप रहा, कोई जवाब नहीं था उसके पास लेकिन वह सोच रहा था कि क्रिकेट के बिना वह कैसे जिएगा?
अस्पताल से पांचवें दिन प्रद्युम्न की छुट्टी हो गयी। वह घर आ गया। परिवार में हर कोई क्रिकेट के विरोध में खड़ा था सिवाय प्रद्युम्न के। दुर्घटना ऐसी हुई थी कि प्रद्युम्न भी अंदर ही अंदर घबरा गया था लेकिन वह सोच रहा था कि खेल में तो ये सब चलता ही है पर परिवार की खिलाफत के सामने वह टिक न सका और क्रिकेट छूट गया। वह मन ही मन कुढ़ने लगा और बात-बात पर गुस्सा करने लगा। क्रिकेट के माध्यम से उसके शरीर की ऊर्जा जो गतिमान थी वह अब घर में थाली पटकने और गिलास फेंकने में व्यक्त होने लगी।
एक दिन वरदू अन्ना प्रद्युम्न के घर आये. उन्होंने प्रद्युम्न के मम्मी-पापा को समझाने की कोशिश की, 'हो जाता है, खेल में. सड़क में दुर्घटना हो जाती है तो क्या हम सड़क पर आना-जाना बंद कर देते हैं?'
'आपकी बात सही है लेकिन साधारण चोट लगी होती तो बात इतनी गंभीर न होती. इतने दिनों की बेहोशी को हमने कैसे झेला है, हम जानते हैं. आप भी तो घबराए हुए थे, थे कि नहीं?'
'बेशक, मैं भी बहुत चिंतित था लेकिन वह एक घटना थी, हो गयी. बार-बार तो ऐसा होगा नहीं।'
'आप गैरेंटी लेते हैं?'
'मैं कैसे गैरेंटी ले सकता हूँ?'
'तो फिर प्रद्युम्न अब क्रिकेट नहीं खेलेगा।' मधुमिता ने साफ़ मना कर दिया. प्रद्युम्न ने बीच में बोलने की कोशिश की लेकिन मम्मी ने चुप रहने का इशारा कर दिया, वह कुछ न कह सका.
* * * * *
शाश्वती प्री-मेडिकल-टेस्ट की तैयारी में लगी हुई थी। हर समय पढ़ाई और पढ़ाई। टेलीविज़न देखना बंद, सिनेमा जाना बंद, जन्मदिन और शादी की पार्टियों में जाना बंद। ऐसा लगता था जैसे उसका डाक्टर बनने का इरादा पक्का हो गया है। सुबह नहा-धोकर पढ़ने बैठ जाती। घर का काम करने से छूट मिली हुई थी इसलिए पूरा समय पढ़ाई को ही समर्पित था। जब बोर हो जाती तो माँ के पास आकर बैठ जाती और कुछ गप-शप करने लगती। एक दिन माँ ने पूछा, 'तू पढ़ते-पढ़ते बोर नहीं होती क्या?'
'होती तो हूँ, पर क्या करूँ?'
'सच कहती हो लेकिन कितना पढ़ना पड़ता है?'
'फिजिक्स, केमिस्ट्री, बाटनी और जूलोजी सब।'
'फिजिक्स, केमिस्ट्री, बाटनी का डाक्टरी से क्या लेना-देना?'
'कुछ होगा माँ, तब तो।'
'क्या हो सकता है?'
'केमेस्ट्री का संबंध तो समझ में आता है क्योंकि दवाएं 'केमिकल कांबिनेशन' होती हैं लेकिन फिजिक्स और बाटनी का उपयोग मेरी समझ नहीं आता।'
'तो फिर?'
'बाटनी तो सरल है, फिजिक्स बेहद कठिन है।'
'फिर?'
'फिर क्या, सिर खपा रही हूँ अपना।' शाश्वती ने चिढ़ कर उत्तर दिया। वह फिर पढ़ने के लिए बैठ गयी। इतने में प्रद्युम्न आ गया। बोला, 'क्या कर रही है ?'
'दिखाता नहीं क्या?' शाश्वती ने पूछा।
'दिख तो रहा है कि तू पढ़ रही है लेकिन बेकार पढ़ रही है।'
'कैसे? बेकार कैसे?'
'तू पीएमटी नहीं निकाल सकती।'
'तेरे को कैसे मालूम हुआ?'
'मैं तेरी काबिलियत जानता हूँ।'
'क्या जानता है?'
'यही कि तेरे वश का नहीं है।'
'मुझे अपने जैसा बुद्धू समझता है क्या?'
'मैं बुद्धू हूँ?'
'और क्या? दिन भर इधर-उधर घूमता रहता है, पढ़ाई में दिल लगता है क्या तेरा?'
'मेरी बात छोड़ तू, मुझे डाक्टर-वाक्टर नहीं बनना है।'
'तो क्या बनेगा?'
'अभी तय नहीं है। क्रिकेटर बनना चाहता था लेकिन अड़ंगा लग गया।'
'सोच कुछ और।'
'अब सोचना बंद कर दिया है।'
'क्यों?'
'सोचने से क्या मिलेगा? मैं जो भी सोचूंगा, उसमें मम्मी या पापा रुकावट पैदा कर देंगे।'
'तू ऐसा क्यों सोचता है? क्रिकेट छोड़ने वाली बात के कारण न? तुझे कितनी गंभीर चोट लगी थी, मरते-मरते बचा था इसलिए मम्मी ने तुझे क्रिकेट खेलने को मना किया था। अपने मम्मी-पापा वैसे नहीं हैं, जैसा तू सोचता है।'
'ऐसा है क्या?'
'हाँ, ऐसा ही है। देख, मैं डाक्टर बनना चाहती हूँ, मुझे पूरा सपोर्ट कर रहे हैं। तू भी जो बनना चाहता है, बन सकता है, बस, क्रिकेटर भर नहीं।'
'तो फिर मैं कुछ सोचता हूँ।' प्रद्युम्न ने कहा।
* * * * *
प्रद्युम्न का गुस्सा बढ़ते जा रहा था. बात-बात में वह सबसे झगड़ने लग गया था. खाते समय वह परसी हुई थाली को पटक कर उठ जाता, या पानी भरा गिलास फेंक देता. घर में किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि उसे आखिर क्या हो गया है? क्या चाहिए उसे? ऐसा क्यों कर रहा है? दरअस्ल खेल से दूर कर दिए जाने के कारण उसकी उस ऊर्जा का निस्तारण नहीं हो पा रहा था जो उसके शरीर में स्वाभाविक रूप से विकसित हो रही थी. क्रिकेट के खेल से वह मन से जुड़ गया था. क्रिकेट से दूरी उसके लिए मानसिक परेशानी का सबब बन गया था. वह अपनी मां को दोषी मानता था जिसने उसके मनपसंद खेल से दूर कर दिया था. वह मां से नाराज था. पापा से भी नाराज था क्योंकि पापा ने भी मां की हाँ में हाँ मिला दिया था उस दिन. उनकी आपसी बातचीत केवल काम की बात तक सीमित हो गयी थी, अन्य किसी भी विषय पर उनके बीच चुप्पी बन जाती थी.
यूँ ही दिन बीतते जा रहे थे, माह बीत गये, साल बीत गये. शाश्वती पीएमटी में दो बार बैठी, सफल नहीं हो सकी इसलिए कालेज में विज्ञान विषय लेकर स्नातक की पढ़ाई करने लगी. प्रद्युम्न भी किसी साधारण विद्यार्थी की तरह बिना मकसद के आगे बढ़ रहा था. क्रिकेट उसके दिमाग में अब भी बसा हुआ था लेकिन उस पर रोक लग गयी थी. परिवार की गैरजानकारी में वह खेल सकता था लेकिन झूठ बोलना उसे पसंद नहीं था इसलिए उसने बल्ले में हाथ भी नहीं लगाया. वह क्रिकेट मैच तक देखने नहीं जाता था क्योंकि वह मैच देखने वाला बंदा नहीं था, खेलने वाला था. पढ़ाई में उसका दिल नहीं लगता था. बस, कालेज जाना और वापस घर आ जाना. वह खुद तय नहीं कर पा रहा था कि आगे क्या करना है, क्या बनना है? मम्मी-पापा उससे पूछते, 'क्या करोगे अपनी ज़िन्दगी में' तो वह चुप रह जाता जैसे उसने तय कर लिया हो कि उसे कुछ नहीं बनना है. वे दोनों प्रद्युम्न के भविष्य के लिए चिंतित रहते लेकिन प्रद्युम्न को न अपने वर्तमान की फ़िक्र थी न भविष्य की, वह अनिश्चित भाव से चुपचाप अपनी ज़िन्दगी जी रहा था. कोई पूछता तो कहता, 'अभी तो पढ़ रहा हूँ, पूरी कर लूँ पढ़ाई, उसके बाद सोचूंगा.'
* * * * * *
आज रेलवे इंस्टीट्यूट के सभागार में कत्थक नृत्य का कार्यक्रम आयोजित था. मधुमिता को नृत्य के कार्यक्रम अच्छे लगते थे क्योंकि विवाह के पूर्व वह स्वयं कत्थक सीखती थी. विवाह के पश्चात् यह शौक हाथ से निकल गया क्योंकि गृहस्थी का चक्कर ऐसा होता है कि सारे शौक जाने कहाँ विलीन जाते हैं. एक बड़ा बच्चा और दो छोटे बच्चों की देखरेख में मधुमिता का जीवन चक्र ऐसा घूमा जैसा कि कोई नर्तकी कत्थक का नृत्य प्रस्तुत करते हुए तेजी से चक्कर लेती घूमती है. संगीत और नृत्य केवल यादों में सिमट कर रह गया था. चारुदत्त ने कभी रोका नहीं लेकिन बिलासपुर में वैसा माहौल न था, न कोई सिद्ध गुरु था जिससे सीखा जा सके. एक नया शौक लग गया था उसे, किताबें पढ़ने का. बांग्ला भाषा की पुस्तकें बिलासपुर में मिलती नहीं थी इसलिए जो भी जान-पहचान का कलकत्ते जाता था उससे अपनी मनपसंद किताब मंगवा लेती थी और खाली समय में पढ़ती रहती.
आज वह शाश्वती और प्रद्युम्न के साथ सायकल-रिक्शा में बैठ कर इंस्टीट्यूट के सभागार की ओर चल पड़ी. मन ही मन मुस्कुरा रही थी क्योंकि उसके साथ-साथ पुरानी यादें भी तो रिक्शा में बैठी हुई थी. अचानक प्रद्युम्न का ध्यान मां की मुस्कराहट पर गया तो उसने पूछा, 'मम्मी, आज बहुत खुश दिख रही हो?'
'हाँ रे, खुश तो हूँ.'
'क्या बात है?'
'इस समय मेरे पुराने दिन मुझे याद आ रहे हैं जब मैं नृत्य किया करती थी, कलकत्ते में.'
'अब क्यों नहीं करती?'
'नाचती तो अब हूँ, तुम लोगों के आगे-पीछे।'
'ये नाचना भी कोई नाचना है?'
'विवाहित स्त्री के भाग्य में यही नाच होता है बेटा।'
'पर यह तो गलत है न?'
'गलत है भी और नहीं भी.'
'क्या मतलब?'
'मतलब यह है कि जब शौक का समय था तब वह नाच नाच लिया, जब जिम्मेदारी का समय आया तो यह नाच नाच रही हूँ.' मधुमिता का चेहरा तनिक उतर सा गया. तब ही रिक्शा सभागार के सामने आकर खड़ा हो गया. सब उतर गए. मधुमिता ने रिक्शा वाले को पैसे दिए और तेज चाल में सब सभागार की ओर बढ़ चले.
कत्थक नृत्य का कार्यक्रम मनोरम था, नर्तक बिरजू महराज ने डेढ़ घंटे तक अपनी नृत्य कला का शानदार प्रदर्शन किया। सभागार कई बार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा. मधुमिता प्रसन्न भाव से निकली और घर वापस जाने के लिए रिक्शा तय किया. सब रिक्शा में बैठे. प्रद्युम्न ने कहा, 'मम्मी, मैं भी कत्थक नर्तक बनूंगा।'
'तू कत्थक नर्तक बनेगा? सच कह रहा है तू?' मधुमिता ने आश्चर्यचकित होकर पूछा.
'हाँ, मैं सच कह रहा हूँ.'
'परन्तु इस क्षेत्र में तो लड़कियां हैं, तू तो लड़का है.'
'और बिरजू महाराज?
'इनकी बात अलग है.'
'क्यों अलग है? गोपीकृष्ण हैं, बी. सोहन लाल, हीरालाल और उदयशंकर भी तो पुरुष हैं.'
'ये बात सही है.'
'फिर मैं क्यों नहीं सीख सकता?'
'सीख सकते हो लेकिन .....'
'लेकिन क्या?'
'तुझे शौकिया सीखना है या तू गंभीर है?'
'मैं इस कला को अपना जीवन अर्पित करना चाहता हूँ.' प्रद्युम्न की आवाज में आत्मविश्वास झलक थी. मधुमिता चुप रह गयी.
मधुमिता ने चारुदत्त से प्रद्युम्न के निर्णय की जब चर्चा की तो वे अवाक रह गए, 'प्रद्युम्न नर्तक बनेगा?'
'हाँ, वह गंभीर है इस मामले पर.'
'तुमसे कब बात हुई?'
'शनिवार को, जब हम लोग कत्थक का कार्यक्रम देखकर लौट रहे थे.'
'और तुमने उस बात को गंभीरता से ले लिया? अरे, वह कत्थक के कार्यक्रम के त्वरित प्रभाव में होगा. कुछ दिन में भूल जाएगा, तुम अब इस विषय में उससे चर्चा मत करना, उसे अपने आप बोलने दो.' चारुदत्त ने समझाया।
'पापा, मैं कत्थक सीखना चाहता हूँ.' प्रद्युम्न ने इच्छा व्यक्त की.
'हाँ, अच्छी बात है लेकिन कहाँ सीखोगे?'
'बिलासपुर में तो कोई गुरु नहीं है, पास में रायगढ़ है, वहां जाना होगा या फिर दिल्ली।'
'जब शहर छोड़कर बाहर जा रहे हो तो अच्छी जगह जाओ. कौन है दिल्ली में?'
'बिरजू महराज जी, जिनका कार्यक्रम यहाँ हुआ था, लेकिन वहां 'घुसना' मुश्किल है.'
'क्यों?'
'बहुत बड़े हैं वे, मुझे स्वीकार करें या न करें।'
'ऐसा क्यों सोचते हो?'
'मुझे तो कत्थक की प्रारंभिक जानकारी तक नहीं है, बस, मन में नृत्य के प्रति आकर्षण भर है.'
'उनका फोन नंबर पता करो और बात करो.'
'फोन नंबर मेरे पास है.'
'कहाँ से मिला?'
'मैंने उनसे ले लिया था, जब वे बिलासपुर आए थे.'
'क्या तुम उनसे मिल चुके हो?'
'हाँ पापा, जब उनका प्रस्तुतीकरण समाप्त हो गया तो मैं उन्हें देखकर अभिभूत हो गया था. मैं चुपके से स्टेज के पीछे चला गया. उनके चरण स्पर्श किए, उन्होंने आशीर्वाद दिया और मुझसे पूछा, "क्या करते हो."
"पढता हूँ, कालेज में हूँ."
"आगे क्या करना चाहते हो?"
"पता नहीं लेकिन अभी-अभी एक राह मिली है."
"अभी-अभी? कौन सी राह?"
"मैं कत्थक सीखूंगा।"
"अरे वाह, तुम आओ हमारे पास, हम तुम्हें सिखाएंगे लेकिन घर वालों की सहमति लेकर आना."
"जी, गुरुदेव। आपसे कैसे संपर्क करूंगा?"
"मेरे सहायक वो खड़े हैं, उनसे फोन नंबर ले लो." बिरजू महराज ने अपने सहायक को इशारा किया।
प्रद्युम्न को पापा से अनुमति मिल गयी. मम्मी ने कहा, 'जिसमें तुम खुश, उसमें हम खुश.' प्रद्युम्न ने दिल्ली फोन लगाया, महराज जी से बात हो गयी. उन्होंने दो माह बाद बुलाया. यह भी अच्छा संयोग था कि उस बीच परीक्षा थी, वह भी निपट जाएगी. प्रद्युम्न अब खुश दिखने लगा, सबसे बातें करने लगा, उसे जीवन की राह जो मिल गयी थी.
बी.एस सी. के अंतिम वर्ष की परीक्षा निपट गयी और गुरु के पास जाने का समय करीब आ गया. प्रद्युम्न ने पुनः फोन करके उनकी स्वीकृति प्राप्त की और दिल्ली पहुँच गया.
दिल्ली नया शहर था प्रद्युम्न के लिए. ऊँची-ऊँची इमारतें, कार के लम्बे काफिले और जिधर देखो उधर उमड़ता जनसैलाब. बिलासपुर जैसे छोटे शहर के प्रद्युम्न के लिए विस्मित कर देने वाला दृश्य था यह. एक घंटे की सड़क यात्रा के बाद वह अपने गंतव्य तक पहुँच गया. एक बंगलानुमा घर जिसके आसपास अपूर्व शांति थी. वहां फूलों के पौधे आपस में मुस्कुरा बातें कर रहे थे. घर के प्रवेशद्वार से आगे एक गलियारा था, अंदर आँगन था. आँगन के तीन तरफ कमरे बने हुए थे. प्रद्युम्न ज़रा झिझका किन्तु एक कमरे से किसी पुरुष के बात करने की आवाज़ आ रही थी, उसी ओर बढ़ गया. दरवाज़े के बाहर से उसे सामने की दीवार से लगे हुए एक तख़्त पर गुरु जी बैठे नज़र आए, वह उन्हें देखकर सिहर गया. कुछ क्षणों बाद उसने खुद को स्थिर किया और पूछा, 'मैं भीतर आ जाऊं क्या?'
'आ जाओ, कौन हो तुम?' बिरजू महराज ने पूछा।
'मैं प्रद्युम्न हूँ, प्रद्युम्न मुखर्जी, बिलासपुर से आया हूँ.'
'कौन से बिलासपुर से?'
'छत्तीसगढ़ वाले बिलासपुर से.'
'क्यों आए हो?'
'नृत्य सीखने.'
'अरे, नृत्य कोई सीखने की चीज होती है क्या?'
'क्या नृत्य सीखने की चीज नहीं होती गुरुवर?'
'नहीं. हम हर पल नृत्यरत रहते हैं. पूरी सृष्टि नृत्यरत है.'
'किन्तु कोई विधि-विधान तो होगा ही या यूँ ही उछलना-कूदना भी नृत्य है?'
'वह भी नृत्य है लेकिन जो विधि-विधान वाला नृत्य होता है, उसे शास्त्रीय नृत्य कहते हैं.'
'जी, मैं शास्त्रीय नृत्य सीखने आया हूँ, कत्थक, आपसे.'
'तो ऐसा कहो कि कत्थक सीखने आए हो. कुछ सीखे हो?'
'नहीं गुरुवर.'
'तो फिर यहाँ कैसे चले आए?'
'आपके मार्गदर्शन में श्री गणेश करूँगा.'
'बहुत कठिन मार्ग है यह. मंदिर में बंट रहा प्रसाद नहीं है. नृत्य सीखने की ललक चाहिए, लगन चाहिए और सम्पूर्ण समर्पण.'
'जी, गुरुवर.'
'गुरुवर तब तक मत कहना मुझे, तक मैं तुम्हें शिष्य न मान लूँ।'
'जी, गुरुवर.'
'फिर वही भूल?'
'जी, मैंने तो आपको हृदय से गुरु मान लिया है इसलिए बार-बार मुंह से निकल जाता है.'
'मेरे यहाँ बहुत से सिखाड़ी आते हैं और कुछ दिनों में भाग खड़े होते हैं.'
'मैं नहीं भागूंगा.'
'देखेंगे तुमको भी.'
'जी.'
'कहाँ रहोगे? दिल्ली में ठहरने की कोई व्यवस्था है तुम्हारी?'
'नहीं, यहीं आपकी शरण में रहूँगा.'
'ठीक है, दायीं तरफ से दूसरे कमरे में चले जाओ, अपना सामान रख दो, बाकी बातें तुमको अनुराग समझा देगा.' बिरजू महराज ने अपने एक शिष्य की ओर इशारा करते हुए कहा.
'जी, कृपा है आपकी.' साष्टाङ्ग प्रणाम करते हुए प्रद्युम्न ने कहा.
प्रद्युम्न वहां एक माह तक रहा. सुबह चार बजे से अभ्यास आरम्भ हो जाता. शुरूआती दिनों में उसे चुपचाप बैठकर अन्य प्रशिक्षार्थियों को देखने का काम मिला, फिर उसे अभ्यास का अवसर मिला. नाचते-नाचते पैर पत्थर के हो गए, दर्द के मारे बुरा हाल हो गया लेकिन नाचना है तो नाचना है, बचने का कोई रास्ता नहीं था. वह सोचता, 'नृत्य देखना कितना सुखद लगता है और सीखना कितना दुखदायक?'
एक माह केवल पैर पटकने में बीत गये. अब उसे घर की याद सताने लगी. जीवन में पहली बार इतने समय तक के लिए वह अपने परिवार से दूर रहा. यहाँ तो हर समय नृत्य था या नृत्य की बात थी. एक दिन उसे उदास देखकर गुरु ने पूछा, 'क्यों प्रद्युम्न, बहुत उदास दिख रहे हो, घर की याद आ रही है क्या?'
'जी. दो-तीन दिनों से बहुत याद आ रही है.' प्रद्युम्न ने कहा.
'घर जाना चाहते हो क्या?'
'जी, यदि आप अनुमति दें.'
'ये बताओ, तुम्हें यहाँ कैसा लगा?'
'अच्छा लगा.'
'बस, अच्छा लगा?'
'जी, अच्छा लगा.'
'क्या इसका अर्थ मैं यह लूं कि अब तुम नहीं लौटोगे?'
'मैं लौटूंगा, अवश्य लौटूंगा.'
'क्यों?'
'क्योंकि मैं यहाँ दो बातें समझ गया हूँ.'
'कौन सी बातें?'
'पहली, कि नृत्य करना तपस्या है और दूसरी, कि मैं इस तपस्या को कर सकता हूँ.'
'यहाँ तुम्हें क्या अच्छा नहीं लगा?'
'ऐसा तो कुछ भी नहीं.'
'सच कह रहे हो?'
'जी.'
'हमारी डांट-फटकार?'
'आपने मुझे कब डांटा?' प्रद्युम्न ने आश्चर्य मिश्रित भाव से प्रश्न किया. उत्तर सुनकर बिरजू महराज मुस्कुराए और बोले, 'अगले सप्ताह सोमवार को हम मुंबई जा रहे हैं, कार्यक्रम देने, उस बीच तुम अपने घर हो आओ.'
'जैसा आपका आदेश.'
'जैसा आपका आदेश? गुरु से इस तरह बात करते हैं? मूर्ख.'
'जैसा आपका आदेश गुरुवर.' प्रसन्न मन से प्रद्युम्न ने हाथ जोड़े और रोते हुए बिरजू महराज के चरणों में लोट गया.
* * * * *
घर घर होता है. प्रद्युम्न अपने घर लौट आया. मां के हाथ से बना माछ-भात खाकर उसका केवल पेट नहीं भरा, आत्मा भी संतुष्ट हुई. शाम को पापा ड्यूटी से लौटे, हाल-चाल पूछा. रात को भोजन की टेबल पर चर्चा शुरू हुई, 'कैसा लग रहा है तुम्हें वहां?' पापा ने बात शुरू की.
'बहुत अच्छा।' प्रद्युम्न ने कहा.
'कहाँ तक गाड़ी पहुंची तुम्हारी?'
'गाड़ी?'
'हाँ, गाड़ी. भई, हम तो रेल्वे वाले हैं, हमारी तो गाड़ी चलती है न?'
'जी, समझ गया. अभी तो गाड़ी ने स्टेशन छोड़ा है.'
'अरे, स्पीड नहीं पकड़ी अभी तक?'
'नहीं पापा, अभी तो पैर पटक-पटक कर पैरों को मजबूत बना रहा हूँ.'
'कब तक चलेगा ऐसा?'
'नहीं, ऐसा नहीं है. पैरों के साथ-साथ हाथों को भी तैयार किया जा रहा है. भावाभिव्यक्ति का प्रशिक्षण चल रहा है और संगीत की समझ भी बन रही है.'
'रहने-खाने की व्यवस्था ठीक है?'
'ठीक ही है.'
'क्या मतलब? तुम्हारी आवाज़ कमजोर सी लग रही है?'
'वहां नृत्य सीखने गया हूँ. वहां रहने-खाने की सोचूंगा तो सीख चुका नृत्य।'
'फिर भी?'
'ठीक है. पेट भर जाया करता है और इतनी थकान हो जाती है कि जैसा भी बिस्तर होता है, नींद आ जाती है.'
'क्यों इतनी तकलीफ सह रहा है वहां फिर? मां ने प्रश्न किया.
'जब मैं क्रिकेट खेलता था तब मेरे कोच वरदू अन्ना क्या कहते थे मालूम है आपको?'
'क्या कहते थे?'
'वे कहते थे, "प्रद्युम्न, नो पेन नो गेन". बताते हुए प्रद्युम्न जोर से हंसा. उसकी बात सुनकर सब हंसने लगे.
'कितने लोग सीखते हैं वहां?'
'हम दो लड़के और ग्यारह लड़कियां.'
'लड़के कम क्यों हैं?'
'लड़कियां अधिक क्यों हैं, यह पूछिए.'
'बताओ.'
'इसलिए कि उनके शरीर में लोच अधिक होता है.'
'और लड़कों में?'
'लड़कों को अपना शरीर लचीला बनाना पड़ता है.'
'वैसे भी नृत्य करती लड़कियां अच्छी लगती हैं.' शाश्वती ने अपनी राय दी.
'मैं सहमत हूँ लेकिन पुरुष भी कम कमनीय नहीं लगते।'
'जैसे?'
'जैसे मेरे गुरु महराज और जैसे नर्तक गोपीकृष्ण. इनके नृत्य मनोहारी होते हैं. इन्होंने कत्थक को प्राणवान बनाया है.'
'वैसे, स्कोप क्या है तेरा?' पापा ने दखल दिया.
'कैसा स्कोप?'
'फायनेंशियल?'
'पैसा लगना भर है, मिलना कुछ नहीं है.'
'तो फिर क्या फायदा?'
'मैं कत्थक नर्तक बन जाऊँगा।'
'नर्तक बनने से क्या फायदा? आखिर पेट भी तो लगा हुआ है हमारे साथ?'
'मैं आपकी चिंता को समझ रहा हूँ पापा लेकिन कुछ लोग संसार में ऐसे भी होते हैं जो आर्थिक लाभ के लिए नहीं जीते, आत्मिक सुख के लिए जीते हैं.'
'ठीक है, तू जिसमें खुश है, रह. मेरे जीते-जी तेरी व्यवस्था बन जाएगी। मेरे बाद कैसा होगा, वह तेरे देखने का काम है.'
'पापा......' प्रद्युम्न की आँखों से आंसू बहने लगे.
चौथे दिन प्रद्युम्न दिल्ली वापस चला गया. घर में सूनापन छा गया. कोई किसी से बात नहीं कर रहा है. दरअसल किसी को कुछ सूझ ही नहीं रहा है कि किससे क्या कहा जाए? प्रद्युम्न के निर्णय के आगे सब नतमस्तक थे लेकिन उसका निर्णय किसी के पल्ले नहीं पड़ रहा था. नर्तक बनेगा!
* * * * * * * *
साधने की बात होती है साधना. मनुष्य का पूरा जीवन कुछ-न-कुछ साधने में ही बीत जाता है. अधिकतर घर-परिवार को साधते-साधते अंतिम साँसें गिनने लगते हैं. अंतिम समय जब जीवन भर का चलचित्र अत्यंत त्वरित गति से मस्तिष्क में चलता है तो आँखों से आंसू बहने लगते हैं, संतुष्टि के नहीं, अफ़सोस के आंसू. जो भी किया, जिसके लिए किया, सब निरर्थक चला गया. कोई नहीं मानता कि मृत्यु शैय्या पर लेटे हुए व्यक्ति ने उन सबके लिए अपने जीवन का होम कर दिया है. उसे अफ़सोस होता है कि उसने अपना जीवन अपने लिए क्यों नहीं जिया? जो जीवन में चाहा था, क्यों नहीं किया. अपनी इच्छाओं को दरकिनार करके दूसरों के लिए क्यों अपने जीवन की आहुति दे दी? कम लोग होते हैं जो इस सोच से बाहर निकलकर अपनी अभिलाषाओं को पूरा करने के लिए यत्न करते हैं. ऐसे लोग आजीविका चलाने के बदले अपने जीवन को चलाते हैं, अपनी मर्जी से. जो उनके दिल ने चाहा, उसे पूरा करने के प्रयत्न करते हैं. इसके लिए उन्हें अपने परिवार का प्रतिरोध सहना पड़ता है, समाज का उपहास सहना पड़ता है. इस दिशा में चलने वालों का भविष्य अनिश्चित होता है लेकिन चलने की राह निश्चित होती है, उनका लक्ष्य स्पष्ट रहता है. वे जानते हैं कि मार्ग में कांटे हैं, रास्ता उबड़-खाबड़ है, पैर नंगे हैं फिर भी उनकी लगन उनके साथ चलती है जो उन्हें मंज़िल तक पहुँचाती है.
प्रद्युम्न लगनशील था लेकिन गुरु का घर आसान नहीं होता। गुरु अपना ज्ञान मुफ्त में नहीं बांटता, पूरी कीमत वसूल करता है. घर की साफ़-सफाई, सब के लिए भोजन तैयार करना और परोसना भी संगीत के प्रशिक्षण में शामिल रहता है. रात को गुरु के शयन के पूर्व उनके पैर दबाना भी जरूरी होता है, भले ही खुद के पैर दर्द के मारे टूटे जा रहे हों. प्रद्युम्न को इन कामों से शुरुआत में झिझक हुई फिर यह सब रोज की गतिविधि में आ गया. एक और अभ्यास सीखना पड़ा, गन्दी गालियां सुनने का. नृत्य सिखाते समय गुरुदेव एकदम निर्मम हो जाते थे, ज़रा सी चूक हो जाए तो इतनी भद्दी गालियां देते थे लेकिन चुपचाप सुनना पड़ता था. ऐसा नहीं था कि केवल लड़कों को पड़ती थी, लड़कियों को भी बराबर से सुननी पड़ती थी. यह सब नृत्यप्रशिक्षण का एक जरूरी अंग जैसा था. दरअसल, गुरु सुशिक्षित नहीं थे, वे केवल नृत्य विधा के पारंगत थे, कला जानते थे इसलिए नृत्य सिखाते समय वे अपने मौलिक स्वरुप में उपस्थित होते थे, कोई आडम्बर नहीं होता था उनके बातों और व्यवहार में. शिष्य भी धीरे-धीरे उनकी आदतों से परिचित होकर उनकी बातों का बुरा नहीं मानते थे. जिसे गुरु का व्यवहार अच्छा नहीं लगता था वह बीच में साधना छोड़कर चला जाता था, जिसे गुरु की गालियाँ अच्छी लगी वह गुरु से सीख कर जाता था. गुरु का आदेश मानना अनिवार्य था. जैसे, गुरु ने कोई मुद्रा सिखाई और बोले, 'तुम लोग इसका अभ्यास करो, हम पान खाकर आते हैं.' और वे घर के बाहर चले गए, वे कब लौटेंगे, किसी को पता नहीं होता था. हो सकता है डेढ़-दो घंटे बाद लौटें लेकिन सभी शिष्य उसी मुद्रा का अभ्यास करते मिलना चाहिए उन्हें अन्यथा डांट और गालियों की बौछार।
बिरजू महाराज ने भारतीय कत्थक की नृत्य परंपरा में नए प्रयोग किए. उन्होंने अपनी विदेश यात्राओं में विदेशी नर्तकों को समूह में नृत्य करते देखा जिसे वे भारतीय कत्थक में ले आए. कत्थक नृत्य में 'लाईट एंड साउंड इफेक्ट' का उपयोग करना भी आरम्भ किया. वे कत्थक की परंपरा में नित नूतन प्रयोग कर रहे थे. वे अपने शिष्यों से कहते थे, 'देख्या, परख्या और सीख्या' अर्थात देखो, परखो और सीखो.
उन्होंने कत्थक नृत्य की विधा को गिनती से जोड़ा. जैसे एक दो तीन चार पांच छै सात आठ नौ...आदि. पति-पत्नी के रूठने, प्रेमी-प्रेमिका को रिझाने के लिए कत्थक को गिनती से जोड़ा. उनका मानना था कि गिनती बताने से दर्शकों को नृत्य समझने में आसानी होती है. उन्होंने अनेक तिहाइयां बनायी, तिहाई का अर्थ किसी क्रिया को समाप्त करना जैसे मन्त्र में 'ॐ शांति, शांति शांतिः' का तीन बार प्रयोग या राष्ट्रगीत में 'जय हे जय हे जय हे' की तीन बार आवृत्ति. उन्होंने हाकी के खेल की तिहाई, कबड्डी की तिहाई, हवाई जहाज के जमीन पर उतरने की तिहाई विकसित की.
प्रद्युम्न बचपन से खेल से जुड़ा हुआ था. यद्यपि अब वह खेल से दूर-दूर रहता था लेकिन उसके स्वभाव में थोड़ा रूखापन आ गया था, सरसता का अभाव था. क्रिकेट छोड़ने के बाद वह अक्खड़ हो गया था, घर में भी और बाहर भी. यह रूखापन उसकी नृत्य साधना में बाधक बन रहा था. वह नृत्य सीखता था, लगन से लेकिन भावाभिव्यक्ति में वह बात नहीं ला पाता था जिसकी कत्थक में अनिवार्यता होती थी. वह कोशिश करता था लेकिन असफल हो जाता था. उसकी इस कमी की और बिरजू महाराज का ध्यान गया. उन्होंने पूछा, 'क्यों, क्या बात है, तुम अपने चेहरे पर नृत्य के भाव नहीं ला पाते हो? तुम्हारा मुखड़ा सपाट रहता है.'
'कोशिश करता हूँ गुरुदेव.'
'कोशिश, कैसी कोशिश?'
'जैसा आप बताते हैं.'
'तो फिर वह बात क्यों नहीं आती जो हम चाहते हैं.'
'पता नहीं गुरुदेव, मैं शायद समझ नहीं पा रहा हूँ.
'जब अन्य शिष्य समझ रहे हैं तो तुमको क्यों समझ में नहीं आ रहा है?'
'........'
'देखो, नृत्य देवी सरस्वती की आराधना है. सरस्वती को साधने के लिए सरसता चाहिए. यदि तुममें सरसता नहीं आएगी तो तुम सरस्वती को कभी नहीं पा सकोगे. जैसे ही अभिमान आया तो सरस्वती पास में नहीं आएगी और उसके बाद लक्ष्मी भी दूर चली जाएगी.'
'लेकिन मुझमें वह बात नहीं है गुरुदेव. अभिमान करने लायक तो मैं अभी हुआ भी नहीं हूँ.'
'तो फिर मुझे ऐसा क्यों दिखाई पड़ता है?'
'यह तो मुझे नहीं पता है लेकिन बचपन की एक घटना का प्रभाव है मुझ पर, मैं उससे बाहर नहीं निकल पा रहा हूँ.'
'कौन सी घटना?' गुरुदेव ने सहज भाव से पूछा. प्रद्युम्न ने अपने किशोरावस्था की क्रिकेट वाली घटना को आद्योपांत बताया .गुरु ने उसकी पूरी बात ध्यान से सुनी और वे अचानक खड़े हो गए. उन्होंने अपने पैरों को 'क्रास' किया, दोनों हाथों को अपने सिर के पास ले गए और मटकी को पकड़ने की मुद्रा बनाई, फिर चेहरे पर एक अरुचिकर भाव बनाया और मटकी को उतार कर फेंकने का अभिनय किया और अपने हाथों को झटकार कर बैठ गए. उसके बाद उन्होंने प्रद्युम्न को वैसा ही करने के लिए संकेत किया. प्रद्युम्न ने हूबहू उनकी नक़ल की. उसको अभिनय में छुपा हुआ अर्थ समझ में आ गया और उसकी आँखों से आंसू बहने लगे. वह घुटनों के बल बैठकर बहुत देर तक रोता रहा और गुरु के चरण भिगोता रहा. इस घटना के बाद प्रद्युम्न बदल गया.
एक साल की कठिन तपस्या के बाद प्रद्युम्न बिलासपुर लौटा. यहाँ की एक संस्था ने प्रद्युम्न के कत्थक नृत्य के एकल प्रदर्शन का आयोजन किया. सभागार उत्सुकता से परिपूर्ण था, क्यों न हो, शहर के एक नवयुवक ने अपने जीवन के लिए कत्थक को चुना और देश के माने हुए नर्तक बिरजू महराज से नृत्य सीख कर आया था.
मंच पर प्रद्युम्न का नृत्य शुरू हुआ. एक घंटे तक वह अनवरत नाचता रहा, वाह-वाह की आवाज़ उठती रही. अंत में उसने क्रिकेट की तिहाई का प्रदर्शन किया. गेंदबाज ने गेंद फेंकी, बल्लेबाज ने शाट लगाया, गेंद चूक गयी, बल्लेबाज की मुखाकृति में रोष प्रगट हुआ. दूसरी गेंद आई, वह भी छूट गयी, बल्लेबाज के चेहरे पर क्रोध और विषाद के मिश्रित भाव उभरे. तीसरी गेंद फेंकी गयी, यह गेंद उसके बल्ले पर आई और बल्लेबाज ने दौड़कर एक रन बनाया. नर्तक के चेहरे पर असंतोष का भाव उभरा. चौथी गेंद पर उसने अपना बल्ला घुमाया और वह गेंद सीमारेखा के उस पार गिरी, छक्का लग गया. नर्तक ख़ुशी के मारे झूम-झूम कर नाचने लगता है. पूरा सभागार तालियों की गडगडाहट से गूंजने लगा. दर्शक खड़े होकर प्रद्युम्न का अभिवादन करने लगे. प्रद्युम्न के पग थमे, उसने रूककर सबका अभिवादन स्वीकार किया. वह मंच पर खड़े-खड़े काँप रहा था और अपने गुरु को मन ही मन में प्रणाम कर रहा था.
प्रद्युम्न के माता-पिता और बहन की आँखों से अश्रुधार बह रही थी, ख़ुशी के आंसू थे उनकी आँखों में. वे खुश थे कि प्रद्युम्न अपने जीवन को जिस दिशा में ले जाना चाहा, सफलतापूर्वक ले गया और वे सब उसकी इस अभूतपूर्व जीवन यात्रा में सहायक बने.
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शाश्वती पढ़ने-लिखने में तेज थी जबकि प्रद्युम्न कमजोर, स्कूल में किसी प्रकार पास हो जाता था लेकिन उसका रुझान क्रिकेट में अधिक था। मोहल्ले में एक वरदू अण्णा थे, क्रिकेट की अम्पायरिंग किया करते थे, उनकी नज़र प्रद्युम्न के खेल पर पड़ी। उन्हें लगा कि इस लड़के में दम है, अच्छा 'आलराउंडर' बन सकता है तो वे प्रद्युम्न के अघोषित द्रोणाचार्य बन गये। कोई भी मौसम हो, रोज सुबह रेलवे के क्रिकेट ग्राउंड में दोनों पहुँच जाते और दूसरे खिलाड़ियों के आने के पहले 'वार्म-अप' होने की दौड़-भाग करते। वरदू अण्णा प्रद्युम्न के पिता की उम्र के थे लेकिन 'स्टेमिना' में प्रद्युम्न से बहुत आगे थे। गुरु अगर चेले से अधिक दमदार हो तो चेले की दुर्दशा तय है, प्रद्युम्न बहुत थक जाता लेकिन वरदू अन्ना उसको मैदान के दस चक्कर दौड़ा मानते। प्रद्युम्न बोलता, "ऐसे में किसी दिन मेरी सांस उखड़ जाएगी अण्णा।"
''उखड़ जाने दे. सांस वापस लाने की जिम्मेदारी मेरी है।"
"आप भगवान हो क्या जो मेरी प्राण वापस ले आओगे?"
"मैं भगवान नहीं हूँ, तेरा कोच हूँ। तेरे को मालूम है कि दौड़ने से कोई नहीं मरता। बच्चू, क्रिकेट सीखना सरल है लेकिन क्रिकेट खेलना कठिन है और उससे भी अधिक कठिन है उसकी 'टेक्नीक' सीखना।"
"तो सिखाओ न..... इतना दौड़ाते क्यों हो?"
"दौड़ेगा नहीं तो क्या खड़े-खड़े 'फील्डिंग', 'बॉलिंग' करेगा? पिच पर खड़े-खड़े दौड़ेगा?"
"आपकी बात सही है लेकिन मैं बहुत थक जाता हूँ अण्णा। दौड़ने के बाद क्रिकेट खेलना और अधिक थका देता है."
"तू एक काम कर, क्रिकेट का चक्कर छोड़। घर में आराम से दस बजे सोकर उठाकर और कल से अपनी सूरत मुझे नहीं दिखाना।"
"लो, आप तो गुस्सा हो गए, मैं तो अपनी तकलीफ बता रहा था।"
"एक बात याद रख, कोई भी खेल हो, मेहनत मांगता है, लगन मांगता है। खेलकूद आलसी लोगों का काम नहीं है. इस बात को अच्छी तरह समझ ले कि पढ़ाई में केवल दिमाग लगता है लेकिन खेल में दिमाग और ताकत दोनों लगता है, समझा?"
"समझा।" प्रद्युम्न अपना सर झुकाकर बोला।
"नो पेन, नो गेन।" वरदू अण्णा गरजे, "चल दौड़, एक चक्कर और लगा कर आ।"
* * * * *
शाश्वती की अपनी मां से बहुत पटती थी, पटती क्या थी, शाश्वती पटा कर रखती थी क्योंकि पापा की कैशियर मम्मी थी. राशन से लेकर कपड़ों तक, फीस से लेकर किताबों तक, सिनेमा से लेकर घूमने-फिरने तक जो भी खर्च होता, वह मम्मी के जरिए होता, मम्मी की मर्जी से होता। मम्मी हमेशा बचत के साथ चलती है लेकिन दुनिया तो खर्चीली है इसलिए कई बार टकराव की स्थिति आ जाती लेकिन मान-मनव्वल के बाद बीच का कोई रास्ता निकल जाता। जेबखर्च रोज लगता है क्योंकि कालेज के बाहर खड़ा रहने वाला चाट का ठेला रोज ललचाता है लेकिन मम्मी है जो उस बात को समझती नहीं। एक बात और है आपको बताने लायक, प्रद्युम्न जब कभी पैसे मांगता है तो मम्मी ज्यादा बहस नहीं करती, उसको सहज ही दे देती है, यह बात गलत है न? हम लड़कियों से दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों किया जाता है? मम्मी भी तो कभी लड़की रही होगी, उसको समझना चाहिए। कब तक कोई सहेगा? एक दिन भिड़ंत हो गयी.
"मां, मेरे अंडर गारमेंट फट रहे हैं, आज गोलबाज़ार चल कर दिलवा दो न?" शाश्वती ने कहा.
"कैसा पहनती है रे तू ? तेरे कपड़े इतनी जल्दी फट जाते हैं?"
"तो क्या मैं फाड़ती हूँ?"
"यह तो मैंने नहीं कहा."
"पटक-पटक कर धोने से कपड़े जल्दी फट जाते हैं."
"तो मत पटका कर."
"बिना पटके कपड़े साफ़ कैसे होंगे?"
"तू सवाल बहुत करती है."
"मैंने कोई गैरवाजिब सवाल किया क्या? आपसे पूछ रही हूँ कि बिना पटके कपड़े कैसे साफ़ होते हैं, जब आप बताओगी तब तो मुझे समझ आएगा।"
"देख बेटा, जब भी कोई कपड़ा धोना होता है तब पहले उसे सादे पानी में कुछ देर के लिए भिगाते हैं, फिर साबुन वाले पानी में आधे घंटे के लिए छोड़ देते हैं. उसके बाद हल्के हाथ से रगड़ कर साफ़ करने से मैल आसानी से निकल जाता है. सिंपल है."
"ठीक है, मैं समझ गयी लेकिन अभी तो नए लेने होंगे।"
"कुछ दिन और चला अभी."
"मां, मैं सोचती हूँ कि तुमको देश का फायनेंस मिनिस्टर होना चाहिए, कहाँ यहां बिलासपुर में अपना टाइम खराब कर रही हो?"
"मैं और फायनेंस मिनिस्टर?"
"हाँ, सच कह रही हूँ मैं, लेकिन तुम अगर उस कुर्सी में बैठ गयी तो देश की तरक्की ठप्प हो जाएगी।"
"भला क्यों?"
"पैसा नहीं दोगी तो देश कैसे चलेगा? इतनी कंजूसी से काम नहीं चलता मां।"
"तो मैं कंजूस हूँ?"
"नहीं, बहुत दिलदार हो. मेरे ज़रा से खर्चे के लिए इतना गुणा-भाग लगा रही हो, अभी प्रद्युम्न कुछ कहेगा तो तुम्हारा पर्स तुरंत खुल जाएगा।"
"बीच में प्रद्युम्न कहां से आ गया?"
"ये तो आपके समझने की बात है."
"ठीक है बाबा, कल मैं बाज़ार जाऊंगी तो तू भी चलना और जो चाहिए, ले लेना।" मधुमिता ने कहा.
"मेरी अच्छी मां।" शाश्वती बोली।
* * * * *
साधारण नौकरीपेशा परिवारों की सफलता का मापदंड बहुत बड़ा नहीं होता. थोड़ी सी वेतनवृद्धि या तरक्की उन्हें सुख दे जाती है. वे आदतन मितव्ययी होते हैं क्योंकि उनका आज बहुत कठिन बीतता है, कल के लिए बचाना तो जैसे सपना है. जो तनख्वाह में जबरिया काट-पीट होती है, वही उनके भविष्य की बचत होती है. रेल्वे की नौकरी में, चाहे जो काम हो, हर समय चौकस रहना पड़ता है. स्टेशन मास्टर का काम सबसे अधिक जिम्मेदारी का होता है, नज़र चूकी और दुर्घटना घटी. चारुदत्त अपने काम से खुश था लेकिन अपने ट्रांसफर से दुखी था क्योंकि उसे अपना परिवार बिलासपुर में रखना पड़ता और वह अकेले छोटे-छोटे स्टेशनों की तंग खोलियों में अपनी साप्ताहिक छुट्टियों का इंतज़ार करता पड़ा रहता और छुट्टी मिलते ही अगली गाड़ी से बिलासपुर के लिए रवाना हो जाता. सवारी गाड़ी यदि बिलम्ब से चल रही हो तो माल गाड़ी पकड़ लेता और जब घर आता तो मधुमिता को अपनी बाहों में इस तरह कसता कि मधुमिता अकबका जाती और कहती, "छोड़ो न, मेरा दम घुट जाएगा."
"इतने दिन बाद मिली हो, जी भर कर मिल लेने दो."
"आज ही मिलना है? बाद में मिलने के लिए ज़िंदा नहीं छोड़ोगे क्या?'
"कल किसने देखा है मधु?'
"ये कैसा पागलपन है?"
"तुम्हारे कारण है."
"मेरे कारण? मेरा क्या दोष है?"
"तुम नहीं समझोगी."
"मैं क्यों नहीं समझूंगी?"
"इस बात को समझने के लिए एक और जन्म लेना पड़ेगा, पुरुष बनकर."
"हाय, पुरुष क्या इतने उतावले होते हैं?"
"कोई उन्हें उतावला बना देता है."
"कौन बना देता है?"
"फिलहाल तो तुम."
"और?"
"औरों की छोड़ो, तुम नाराज़ हो जाओगी."
"कोई और है क्या?' मधुमिता ने लाड़ दिखाते हुए प्यार से पूछा.
"नज़रों में बहुत हो सकती हैं लेकिन नज़दीकी में सिर्फ तुम हो."
"अच्छा अभी तो छोड़ो, बच्चों के आने का समय हो गया है."
"यही तो, बच्चे जब तक नहीं आते, तब तक यूं ही मेरे करीब रहो. यार, तुम भागती क्यों हो?"
"भाग कर कहाँ जाऊंगी मैं? पर मुझे बाथरूम तो जाने दो." मधुमिता ने चारुदत्त की बाहों से स्वयं को मुक्त करते हुए कहा. तब ही काल-बेल बजी और बाहर से शाश्वती की आवाज़ आयी, "माँ."
* * * * *
बचपन में लगता है कि बड़े होकर टीचर बनेंगे क्योंकि उस समय वे ही हमारे रोल-माडल होते हैं। किशोरावस्था में पायलट या एयर-होस्टेस बनने का जुनून होता है क्योंकि आसमान में उड़ता हवाई जहाज उसे जमीन से ऊंचे होने का एहसास कराता है। इसी उम्र में वह खिलाड़ी बनना चाहता है, सेना या पुलिस में जाना चाहता है, लेखक या कवि बनना चाहता है। युवावस्था का स्पर्श उसकी चुनौतियों को और बढ़ाता है। पढ़ाई पूरी होते ही समझ में आ जाता है कि भविष्य की कल्पनाएँ महज़ कागज की नाव थी, न जाने कहाँ बह कर दूर निकल गयी! अब दिशाभ्रम शुरू होता है। परिवार की उम्मीदें कुछ और है, उसके मन में कुछ और। हर दरवाजे में उसका भविष्य उसे बुला रहा है, "आओ, मेरे पास आओ" लेकिन कभी इस दरवाजे, कभी उस दरवाजे से निकलने की कोशिश करता युवा जल्द ही समझ जाता है कि जिस दरवाजे को वह पसंद करता है, वह उसके लिए नहीं है क्योंकि उसमें अनेक मुश्किलें हैं जिन्हें हल करना उसके वश में नहीं है। प्रगति के लिए खुले दरवाजे उसके साधक न बन कर बाधक बन जाते हैं क्योंकि जितने अधिक दरवाजे, उतने अधिक विकल्प, उतनी अधिक भ्रांतियाँ। "इधर जाऊँ या उधर जाऊँ, बड़ी मुश्किल है, किधर जाऊँ?" अंततः वह जो चाहता है, उसे नहीं मिलता।
चारुदत्त घर आए हुए हैं. रात के भोजन में सब साथ बैठकर चर्चा कर रहे हैं. चारुदत्त ने कहा, "आज माछ-भात बहुत बढ़िया लग रहा है।"
"शाश्वती ने बनाया है." मधुमिता ने बताया।
"अरे वाह, मतलब यह हुआ कि शाश्वती को भी तुमने खाना बनाना सिखा दिया?"
"लड़की है तो खाना बनाना सीखना ही पड़ेगा।"
"पर मैं तो डाक्टर बनूंगी।" शाश्वती बीच में कूद पड़ी।
"डाक्टर बनेगी तो क्या खाना नहीं बनाएगी?" मधुमिता ने हस्तक्षेप किया।
"फुर्सत कहाँ मिलेगी फिर?"
"ठीक है, देखो सब लोग, सुनो शाश्वती की बात, डाक्टर बनी नहीं है और अभी से बिजी हो गयी।"
"मैं मजाक नहीं कर रही हूँ, सीरियस हूँ मम्मी।" शाश्वती ने कहा।
"मालूम है कि तू सीरियस है लेकिन डाक्टर बनना मजाक नहीं है. सब सोचते हैं, कलेक्टर बन जाएं, डाक्टर बन जाएं लेकिन कितने हैं जो बन पाते हैं?" प्रद्युम्न ने कहा।
"मैं बनूंगी, तू चुप रह। हर समय क्रिकेट में डूबा रहता है तो क्या तू टेस्ट प्लेयर बन जाएगा?" वह भड़की।
"तू अगर डाक्टर बन सकती है तो मैं भी बन जाऊंगा।"
"लगी शर्त?"
"लगी।"
"क्या?"
"जो तू बोल।"
"रात को सोच कर बताती हूँ।" शाश्वती ने कहा. चारुदत्त और मधुमिता उनकी बात सुनकर प्रसन्न हो रहे थे, चुनौतियों के परिणाम कई बार अच्छे जो निकलते हैं।
* * * * *
क्रिकेट की अंतर्जिला प्रतियोगिता बिलासपुर के रघुराजसिंह खेल मैदान में चल रही है। आज प्रद्युम्न 'नंबर थ्री' पर बैटिंग के लिए उतरने वाला है।
वरदू अन्ना ने उसका हौसला बढ़ाया, 'आज तुम्हारा 'टेस्ट' है। इतने समय से तुम क्रिकेट में पैर जमाने की कोशिश कर रहे हो, उसका ये पहली परीक्षा है। आज नए खिलाड़ियों के साथ खेलने में तुम्हें समझ आएगा कि तुम कहाँ हो। रायपुर की क्रिकेट टीम में बहुत अच्छे 'बालर' हैं, 'स्पिनर' और 'फास्ट' दोनों। उनका सामना करना है, अपना 'विकेट' बचाते हुए धीरे-धीरे 'सेट' होना है, उनकी 'बालिंग' को समझते हुए 'रन' बनाना है। एक बात ध्यान रखो, केवल अपने लिए नहीं खेलना है, अपनी 'टीम' के लिए खेलना है। हिम्मत के साथ उतरो, घबराए और भैस गयी पानी में, समझे?'
'जी सर,समझ गया।' प्रद्युम्न ने कहा।
मैच शुरू हुआ। जब प्रद्युम्न 'बैटिंग' के लिए उतरा तो वह आत्मविश्वास से लबरेज़ था। 'अंपायर' से उसने 'गार्ड' लिया और 'बाल' का इंतज़ार करने लगा। पहली बाल सामान्य थी लेकिन अगली बाल तेजी से ऊपर उठी और बल्ले से टकराने की बजाय उसके कान के ऊपर सिर से टकराई। प्रद्युम्न अपना सिर पकड़ कर 'पिच' में बैठ गया, कुछ देर में बेहोश हो गया खेल रुक गया। सब उसकी ओर दौड़े। वरदू अन्ना चीखे, 'इसको अस्पताल ले चलो, चोट गहरी है।'
तीन खिलाड़ियों ने उसे किसी प्रकार संभालते हुए उठाया और मैदान के बाहर ले गए। एक रिक्शा बुलाया और उसे रेल्वे हास्पिटल ले चले। साथ में वरदू अन्ना और एक खिलाड़ी बैठकर निकले और एक खिलाड़ी प्रद्युम्न के घर की ओर साइकल से निकल पड़ा, घर में खबर करने के लिए.
अस्पताल में डाक्टर ने जांच की, इंजेक्शन लगाया और होश आने तक इंतज़ार करने को कहा. इतने में प्रद्युम्न के मम्मी-पापा भी आ गए. मम्मी की आँखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे, 'क्या हो गया मेरे लाल को? किसने मारा इसको? क्यों मारा? आग लगे ऐसे खेल को.' चारुदत्त भी चिंतित थे लेकिन वे समझा रहे थे, 'सब ठीक हो जाएगा, अपने प्रद्युम्न को कुछ नहीं होगा।'
दो दिनों तक प्रद्युम्न की हालत यथावत रही, अब सबको घबराहट होने लगी। प्रद्युम्न को कहाँ ले जाएँ? कैसे होश आएगा? जैसे सवाल उठाना लगे तब ही अचानक प्रद्युम्न ने आँखें खोली और पूछा, 'क्या हुआ मैच का?'
'भाड़ में गया तेरा मैच।' प्रद्युम्न की मम्मी ने चिढ़ कर कहा।
'ऐसा क्यों कहती हो मम्मी?'
'तेरे सिर पर बाल लगी थी, दो दिनों से बेहोश था तू, अभी तुझे होश आया तो तू पूछ रहा है, क्या हुआ मैच का?'
'मुझे कुछ याद नहीं है। अरे, मैं तो अस्पताल में हूँ।'
'हाँ बेटा, अब तू ठीक हो रहा है, भगवान ने हमारी सुन ली। अब तू भी सुन ले, अब से तू क्रिकेट नहीं खेलेगा, समझा?' प्रद्युम्न की माँ मधुमिता ने अपना फैसला सुनाया। प्रद्युम्न चुप रहा, कोई जवाब नहीं था उसके पास लेकिन वह सोच रहा था कि क्रिकेट के बिना वह कैसे जिएगा?
अस्पताल से पांचवें दिन प्रद्युम्न की छुट्टी हो गयी। वह घर आ गया। परिवार में हर कोई क्रिकेट के विरोध में खड़ा था सिवाय प्रद्युम्न के। दुर्घटना ऐसी हुई थी कि प्रद्युम्न भी अंदर ही अंदर घबरा गया था लेकिन वह सोच रहा था कि खेल में तो ये सब चलता ही है पर परिवार की खिलाफत के सामने वह टिक न सका और क्रिकेट छूट गया। वह मन ही मन कुढ़ने लगा और बात-बात पर गुस्सा करने लगा। क्रिकेट के माध्यम से उसके शरीर की ऊर्जा जो गतिमान थी वह अब घर में थाली पटकने और गिलास फेंकने में व्यक्त होने लगी।
एक दिन वरदू अन्ना प्रद्युम्न के घर आये. उन्होंने प्रद्युम्न के मम्मी-पापा को समझाने की कोशिश की, 'हो जाता है, खेल में. सड़क में दुर्घटना हो जाती है तो क्या हम सड़क पर आना-जाना बंद कर देते हैं?'
'आपकी बात सही है लेकिन साधारण चोट लगी होती तो बात इतनी गंभीर न होती. इतने दिनों की बेहोशी को हमने कैसे झेला है, हम जानते हैं. आप भी तो घबराए हुए थे, थे कि नहीं?'
'बेशक, मैं भी बहुत चिंतित था लेकिन वह एक घटना थी, हो गयी. बार-बार तो ऐसा होगा नहीं।'
'आप गैरेंटी लेते हैं?'
'मैं कैसे गैरेंटी ले सकता हूँ?'
'तो फिर प्रद्युम्न अब क्रिकेट नहीं खेलेगा।' मधुमिता ने साफ़ मना कर दिया. प्रद्युम्न ने बीच में बोलने की कोशिश की लेकिन मम्मी ने चुप रहने का इशारा कर दिया, वह कुछ न कह सका.
* * * * *
शाश्वती प्री-मेडिकल-टेस्ट की तैयारी में लगी हुई थी। हर समय पढ़ाई और पढ़ाई। टेलीविज़न देखना बंद, सिनेमा जाना बंद, जन्मदिन और शादी की पार्टियों में जाना बंद। ऐसा लगता था जैसे उसका डाक्टर बनने का इरादा पक्का हो गया है। सुबह नहा-धोकर पढ़ने बैठ जाती। घर का काम करने से छूट मिली हुई थी इसलिए पूरा समय पढ़ाई को ही समर्पित था। जब बोर हो जाती तो माँ के पास आकर बैठ जाती और कुछ गप-शप करने लगती। एक दिन माँ ने पूछा, 'तू पढ़ते-पढ़ते बोर नहीं होती क्या?'
'होती तो हूँ, पर क्या करूँ?'
'सच कहती हो लेकिन कितना पढ़ना पड़ता है?'
'फिजिक्स, केमिस्ट्री, बाटनी और जूलोजी सब।'
'फिजिक्स, केमिस्ट्री, बाटनी का डाक्टरी से क्या लेना-देना?'
'कुछ होगा माँ, तब तो।'
'क्या हो सकता है?'
'केमेस्ट्री का संबंध तो समझ में आता है क्योंकि दवाएं 'केमिकल कांबिनेशन' होती हैं लेकिन फिजिक्स और बाटनी का उपयोग मेरी समझ नहीं आता।'
'तो फिर?'
'बाटनी तो सरल है, फिजिक्स बेहद कठिन है।'
'फिर?'
'फिर क्या, सिर खपा रही हूँ अपना।' शाश्वती ने चिढ़ कर उत्तर दिया। वह फिर पढ़ने के लिए बैठ गयी। इतने में प्रद्युम्न आ गया। बोला, 'क्या कर रही है ?'
'दिखाता नहीं क्या?' शाश्वती ने पूछा।
'दिख तो रहा है कि तू पढ़ रही है लेकिन बेकार पढ़ रही है।'
'कैसे? बेकार कैसे?'
'तू पीएमटी नहीं निकाल सकती।'
'तेरे को कैसे मालूम हुआ?'
'मैं तेरी काबिलियत जानता हूँ।'
'क्या जानता है?'
'यही कि तेरे वश का नहीं है।'
'मुझे अपने जैसा बुद्धू समझता है क्या?'
'मैं बुद्धू हूँ?'
'और क्या? दिन भर इधर-उधर घूमता रहता है, पढ़ाई में दिल लगता है क्या तेरा?'
'मेरी बात छोड़ तू, मुझे डाक्टर-वाक्टर नहीं बनना है।'
'तो क्या बनेगा?'
'अभी तय नहीं है। क्रिकेटर बनना चाहता था लेकिन अड़ंगा लग गया।'
'सोच कुछ और।'
'अब सोचना बंद कर दिया है।'
'क्यों?'
'सोचने से क्या मिलेगा? मैं जो भी सोचूंगा, उसमें मम्मी या पापा रुकावट पैदा कर देंगे।'
'तू ऐसा क्यों सोचता है? क्रिकेट छोड़ने वाली बात के कारण न? तुझे कितनी गंभीर चोट लगी थी, मरते-मरते बचा था इसलिए मम्मी ने तुझे क्रिकेट खेलने को मना किया था। अपने मम्मी-पापा वैसे नहीं हैं, जैसा तू सोचता है।'
'ऐसा है क्या?'
'हाँ, ऐसा ही है। देख, मैं डाक्टर बनना चाहती हूँ, मुझे पूरा सपोर्ट कर रहे हैं। तू भी जो बनना चाहता है, बन सकता है, बस, क्रिकेटर भर नहीं।'
'तो फिर मैं कुछ सोचता हूँ।' प्रद्युम्न ने कहा।
* * * * *
प्रद्युम्न का गुस्सा बढ़ते जा रहा था. बात-बात में वह सबसे झगड़ने लग गया था. खाते समय वह परसी हुई थाली को पटक कर उठ जाता, या पानी भरा गिलास फेंक देता. घर में किसी को समझ में नहीं आ रहा था कि उसे आखिर क्या हो गया है? क्या चाहिए उसे? ऐसा क्यों कर रहा है? दरअस्ल खेल से दूर कर दिए जाने के कारण उसकी उस ऊर्जा का निस्तारण नहीं हो पा रहा था जो उसके शरीर में स्वाभाविक रूप से विकसित हो रही थी. क्रिकेट के खेल से वह मन से जुड़ गया था. क्रिकेट से दूरी उसके लिए मानसिक परेशानी का सबब बन गया था. वह अपनी मां को दोषी मानता था जिसने उसके मनपसंद खेल से दूर कर दिया था. वह मां से नाराज था. पापा से भी नाराज था क्योंकि पापा ने भी मां की हाँ में हाँ मिला दिया था उस दिन. उनकी आपसी बातचीत केवल काम की बात तक सीमित हो गयी थी, अन्य किसी भी विषय पर उनके बीच चुप्पी बन जाती थी.
यूँ ही दिन बीतते जा रहे थे, माह बीत गये, साल बीत गये. शाश्वती पीएमटी में दो बार बैठी, सफल नहीं हो सकी इसलिए कालेज में विज्ञान विषय लेकर स्नातक की पढ़ाई करने लगी. प्रद्युम्न भी किसी साधारण विद्यार्थी की तरह बिना मकसद के आगे बढ़ रहा था. क्रिकेट उसके दिमाग में अब भी बसा हुआ था लेकिन उस पर रोक लग गयी थी. परिवार की गैरजानकारी में वह खेल सकता था लेकिन झूठ बोलना उसे पसंद नहीं था इसलिए उसने बल्ले में हाथ भी नहीं लगाया. वह क्रिकेट मैच तक देखने नहीं जाता था क्योंकि वह मैच देखने वाला बंदा नहीं था, खेलने वाला था. पढ़ाई में उसका दिल नहीं लगता था. बस, कालेज जाना और वापस घर आ जाना. वह खुद तय नहीं कर पा रहा था कि आगे क्या करना है, क्या बनना है? मम्मी-पापा उससे पूछते, 'क्या करोगे अपनी ज़िन्दगी में' तो वह चुप रह जाता जैसे उसने तय कर लिया हो कि उसे कुछ नहीं बनना है. वे दोनों प्रद्युम्न के भविष्य के लिए चिंतित रहते लेकिन प्रद्युम्न को न अपने वर्तमान की फ़िक्र थी न भविष्य की, वह अनिश्चित भाव से चुपचाप अपनी ज़िन्दगी जी रहा था. कोई पूछता तो कहता, 'अभी तो पढ़ रहा हूँ, पूरी कर लूँ पढ़ाई, उसके बाद सोचूंगा.'
* * * * * *
आज रेलवे इंस्टीट्यूट के सभागार में कत्थक नृत्य का कार्यक्रम आयोजित था. मधुमिता को नृत्य के कार्यक्रम अच्छे लगते थे क्योंकि विवाह के पूर्व वह स्वयं कत्थक सीखती थी. विवाह के पश्चात् यह शौक हाथ से निकल गया क्योंकि गृहस्थी का चक्कर ऐसा होता है कि सारे शौक जाने कहाँ विलीन जाते हैं. एक बड़ा बच्चा और दो छोटे बच्चों की देखरेख में मधुमिता का जीवन चक्र ऐसा घूमा जैसा कि कोई नर्तकी कत्थक का नृत्य प्रस्तुत करते हुए तेजी से चक्कर लेती घूमती है. संगीत और नृत्य केवल यादों में सिमट कर रह गया था. चारुदत्त ने कभी रोका नहीं लेकिन बिलासपुर में वैसा माहौल न था, न कोई सिद्ध गुरु था जिससे सीखा जा सके. एक नया शौक लग गया था उसे, किताबें पढ़ने का. बांग्ला भाषा की पुस्तकें बिलासपुर में मिलती नहीं थी इसलिए जो भी जान-पहचान का कलकत्ते जाता था उससे अपनी मनपसंद किताब मंगवा लेती थी और खाली समय में पढ़ती रहती.
आज वह शाश्वती और प्रद्युम्न के साथ सायकल-रिक्शा में बैठ कर इंस्टीट्यूट के सभागार की ओर चल पड़ी. मन ही मन मुस्कुरा रही थी क्योंकि उसके साथ-साथ पुरानी यादें भी तो रिक्शा में बैठी हुई थी. अचानक प्रद्युम्न का ध्यान मां की मुस्कराहट पर गया तो उसने पूछा, 'मम्मी, आज बहुत खुश दिख रही हो?'
'हाँ रे, खुश तो हूँ.'
'क्या बात है?'
'इस समय मेरे पुराने दिन मुझे याद आ रहे हैं जब मैं नृत्य किया करती थी, कलकत्ते में.'
'अब क्यों नहीं करती?'
'नाचती तो अब हूँ, तुम लोगों के आगे-पीछे।'
'ये नाचना भी कोई नाचना है?'
'विवाहित स्त्री के भाग्य में यही नाच होता है बेटा।'
'पर यह तो गलत है न?'
'गलत है भी और नहीं भी.'
'क्या मतलब?'
'मतलब यह है कि जब शौक का समय था तब वह नाच नाच लिया, जब जिम्मेदारी का समय आया तो यह नाच नाच रही हूँ.' मधुमिता का चेहरा तनिक उतर सा गया. तब ही रिक्शा सभागार के सामने आकर खड़ा हो गया. सब उतर गए. मधुमिता ने रिक्शा वाले को पैसे दिए और तेज चाल में सब सभागार की ओर बढ़ चले.
कत्थक नृत्य का कार्यक्रम मनोरम था, नर्तक बिरजू महराज ने डेढ़ घंटे तक अपनी नृत्य कला का शानदार प्रदर्शन किया। सभागार कई बार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा. मधुमिता प्रसन्न भाव से निकली और घर वापस जाने के लिए रिक्शा तय किया. सब रिक्शा में बैठे. प्रद्युम्न ने कहा, 'मम्मी, मैं भी कत्थक नर्तक बनूंगा।'
'तू कत्थक नर्तक बनेगा? सच कह रहा है तू?' मधुमिता ने आश्चर्यचकित होकर पूछा.
'हाँ, मैं सच कह रहा हूँ.'
'परन्तु इस क्षेत्र में तो लड़कियां हैं, तू तो लड़का है.'
'और बिरजू महाराज?
'इनकी बात अलग है.'
'क्यों अलग है? गोपीकृष्ण हैं, बी. सोहन लाल, हीरालाल और उदयशंकर भी तो पुरुष हैं.'
'ये बात सही है.'
'फिर मैं क्यों नहीं सीख सकता?'
'सीख सकते हो लेकिन .....'
'लेकिन क्या?'
'तुझे शौकिया सीखना है या तू गंभीर है?'
'मैं इस कला को अपना जीवन अर्पित करना चाहता हूँ.' प्रद्युम्न की आवाज में आत्मविश्वास झलक थी. मधुमिता चुप रह गयी.
मधुमिता ने चारुदत्त से प्रद्युम्न के निर्णय की जब चर्चा की तो वे अवाक रह गए, 'प्रद्युम्न नर्तक बनेगा?'
'हाँ, वह गंभीर है इस मामले पर.'
'तुमसे कब बात हुई?'
'शनिवार को, जब हम लोग कत्थक का कार्यक्रम देखकर लौट रहे थे.'
'और तुमने उस बात को गंभीरता से ले लिया? अरे, वह कत्थक के कार्यक्रम के त्वरित प्रभाव में होगा. कुछ दिन में भूल जाएगा, तुम अब इस विषय में उससे चर्चा मत करना, उसे अपने आप बोलने दो.' चारुदत्त ने समझाया।
'पापा, मैं कत्थक सीखना चाहता हूँ.' प्रद्युम्न ने इच्छा व्यक्त की.
'हाँ, अच्छी बात है लेकिन कहाँ सीखोगे?'
'बिलासपुर में तो कोई गुरु नहीं है, पास में रायगढ़ है, वहां जाना होगा या फिर दिल्ली।'
'जब शहर छोड़कर बाहर जा रहे हो तो अच्छी जगह जाओ. कौन है दिल्ली में?'
'बिरजू महराज जी, जिनका कार्यक्रम यहाँ हुआ था, लेकिन वहां 'घुसना' मुश्किल है.'
'क्यों?'
'बहुत बड़े हैं वे, मुझे स्वीकार करें या न करें।'
'ऐसा क्यों सोचते हो?'
'मुझे तो कत्थक की प्रारंभिक जानकारी तक नहीं है, बस, मन में नृत्य के प्रति आकर्षण भर है.'
'उनका फोन नंबर पता करो और बात करो.'
'फोन नंबर मेरे पास है.'
'कहाँ से मिला?'
'मैंने उनसे ले लिया था, जब वे बिलासपुर आए थे.'
'क्या तुम उनसे मिल चुके हो?'
'हाँ पापा, जब उनका प्रस्तुतीकरण समाप्त हो गया तो मैं उन्हें देखकर अभिभूत हो गया था. मैं चुपके से स्टेज के पीछे चला गया. उनके चरण स्पर्श किए, उन्होंने आशीर्वाद दिया और मुझसे पूछा, "क्या करते हो."
"पढता हूँ, कालेज में हूँ."
"आगे क्या करना चाहते हो?"
"पता नहीं लेकिन अभी-अभी एक राह मिली है."
"अभी-अभी? कौन सी राह?"
"मैं कत्थक सीखूंगा।"
"अरे वाह, तुम आओ हमारे पास, हम तुम्हें सिखाएंगे लेकिन घर वालों की सहमति लेकर आना."
"जी, गुरुदेव। आपसे कैसे संपर्क करूंगा?"
"मेरे सहायक वो खड़े हैं, उनसे फोन नंबर ले लो." बिरजू महराज ने अपने सहायक को इशारा किया।
प्रद्युम्न को पापा से अनुमति मिल गयी. मम्मी ने कहा, 'जिसमें तुम खुश, उसमें हम खुश.' प्रद्युम्न ने दिल्ली फोन लगाया, महराज जी से बात हो गयी. उन्होंने दो माह बाद बुलाया. यह भी अच्छा संयोग था कि उस बीच परीक्षा थी, वह भी निपट जाएगी. प्रद्युम्न अब खुश दिखने लगा, सबसे बातें करने लगा, उसे जीवन की राह जो मिल गयी थी.
बी.एस सी. के अंतिम वर्ष की परीक्षा निपट गयी और गुरु के पास जाने का समय करीब आ गया. प्रद्युम्न ने पुनः फोन करके उनकी स्वीकृति प्राप्त की और दिल्ली पहुँच गया.
दिल्ली नया शहर था प्रद्युम्न के लिए. ऊँची-ऊँची इमारतें, कार के लम्बे काफिले और जिधर देखो उधर उमड़ता जनसैलाब. बिलासपुर जैसे छोटे शहर के प्रद्युम्न के लिए विस्मित कर देने वाला दृश्य था यह. एक घंटे की सड़क यात्रा के बाद वह अपने गंतव्य तक पहुँच गया. एक बंगलानुमा घर जिसके आसपास अपूर्व शांति थी. वहां फूलों के पौधे आपस में मुस्कुरा बातें कर रहे थे. घर के प्रवेशद्वार से आगे एक गलियारा था, अंदर आँगन था. आँगन के तीन तरफ कमरे बने हुए थे. प्रद्युम्न ज़रा झिझका किन्तु एक कमरे से किसी पुरुष के बात करने की आवाज़ आ रही थी, उसी ओर बढ़ गया. दरवाज़े के बाहर से उसे सामने की दीवार से लगे हुए एक तख़्त पर गुरु जी बैठे नज़र आए, वह उन्हें देखकर सिहर गया. कुछ क्षणों बाद उसने खुद को स्थिर किया और पूछा, 'मैं भीतर आ जाऊं क्या?'
'आ जाओ, कौन हो तुम?' बिरजू महराज ने पूछा।
'मैं प्रद्युम्न हूँ, प्रद्युम्न मुखर्जी, बिलासपुर से आया हूँ.'
'कौन से बिलासपुर से?'
'छत्तीसगढ़ वाले बिलासपुर से.'
'क्यों आए हो?'
'नृत्य सीखने.'
'अरे, नृत्य कोई सीखने की चीज होती है क्या?'
'क्या नृत्य सीखने की चीज नहीं होती गुरुवर?'
'नहीं. हम हर पल नृत्यरत रहते हैं. पूरी सृष्टि नृत्यरत है.'
'किन्तु कोई विधि-विधान तो होगा ही या यूँ ही उछलना-कूदना भी नृत्य है?'
'वह भी नृत्य है लेकिन जो विधि-विधान वाला नृत्य होता है, उसे शास्त्रीय नृत्य कहते हैं.'
'जी, मैं शास्त्रीय नृत्य सीखने आया हूँ, कत्थक, आपसे.'
'तो ऐसा कहो कि कत्थक सीखने आए हो. कुछ सीखे हो?'
'नहीं गुरुवर.'
'तो फिर यहाँ कैसे चले आए?'
'आपके मार्गदर्शन में श्री गणेश करूँगा.'
'बहुत कठिन मार्ग है यह. मंदिर में बंट रहा प्रसाद नहीं है. नृत्य सीखने की ललक चाहिए, लगन चाहिए और सम्पूर्ण समर्पण.'
'जी, गुरुवर.'
'गुरुवर तब तक मत कहना मुझे, तक मैं तुम्हें शिष्य न मान लूँ।'
'जी, गुरुवर.'
'फिर वही भूल?'
'जी, मैंने तो आपको हृदय से गुरु मान लिया है इसलिए बार-बार मुंह से निकल जाता है.'
'मेरे यहाँ बहुत से सिखाड़ी आते हैं और कुछ दिनों में भाग खड़े होते हैं.'
'मैं नहीं भागूंगा.'
'देखेंगे तुमको भी.'
'जी.'
'कहाँ रहोगे? दिल्ली में ठहरने की कोई व्यवस्था है तुम्हारी?'
'नहीं, यहीं आपकी शरण में रहूँगा.'
'ठीक है, दायीं तरफ से दूसरे कमरे में चले जाओ, अपना सामान रख दो, बाकी बातें तुमको अनुराग समझा देगा.' बिरजू महराज ने अपने एक शिष्य की ओर इशारा करते हुए कहा.
'जी, कृपा है आपकी.' साष्टाङ्ग प्रणाम करते हुए प्रद्युम्न ने कहा.
प्रद्युम्न वहां एक माह तक रहा. सुबह चार बजे से अभ्यास आरम्भ हो जाता. शुरूआती दिनों में उसे चुपचाप बैठकर अन्य प्रशिक्षार्थियों को देखने का काम मिला, फिर उसे अभ्यास का अवसर मिला. नाचते-नाचते पैर पत्थर के हो गए, दर्द के मारे बुरा हाल हो गया लेकिन नाचना है तो नाचना है, बचने का कोई रास्ता नहीं था. वह सोचता, 'नृत्य देखना कितना सुखद लगता है और सीखना कितना दुखदायक?'
एक माह केवल पैर पटकने में बीत गये. अब उसे घर की याद सताने लगी. जीवन में पहली बार इतने समय तक के लिए वह अपने परिवार से दूर रहा. यहाँ तो हर समय नृत्य था या नृत्य की बात थी. एक दिन उसे उदास देखकर गुरु ने पूछा, 'क्यों प्रद्युम्न, बहुत उदास दिख रहे हो, घर की याद आ रही है क्या?'
'जी. दो-तीन दिनों से बहुत याद आ रही है.' प्रद्युम्न ने कहा.
'घर जाना चाहते हो क्या?'
'जी, यदि आप अनुमति दें.'
'ये बताओ, तुम्हें यहाँ कैसा लगा?'
'अच्छा लगा.'
'बस, अच्छा लगा?'
'जी, अच्छा लगा.'
'क्या इसका अर्थ मैं यह लूं कि अब तुम नहीं लौटोगे?'
'मैं लौटूंगा, अवश्य लौटूंगा.'
'क्यों?'
'क्योंकि मैं यहाँ दो बातें समझ गया हूँ.'
'कौन सी बातें?'
'पहली, कि नृत्य करना तपस्या है और दूसरी, कि मैं इस तपस्या को कर सकता हूँ.'
'यहाँ तुम्हें क्या अच्छा नहीं लगा?'
'ऐसा तो कुछ भी नहीं.'
'सच कह रहे हो?'
'जी.'
'हमारी डांट-फटकार?'
'आपने मुझे कब डांटा?' प्रद्युम्न ने आश्चर्य मिश्रित भाव से प्रश्न किया. उत्तर सुनकर बिरजू महराज मुस्कुराए और बोले, 'अगले सप्ताह सोमवार को हम मुंबई जा रहे हैं, कार्यक्रम देने, उस बीच तुम अपने घर हो आओ.'
'जैसा आपका आदेश.'
'जैसा आपका आदेश? गुरु से इस तरह बात करते हैं? मूर्ख.'
'जैसा आपका आदेश गुरुवर.' प्रसन्न मन से प्रद्युम्न ने हाथ जोड़े और रोते हुए बिरजू महराज के चरणों में लोट गया.
* * * * *
घर घर होता है. प्रद्युम्न अपने घर लौट आया. मां के हाथ से बना माछ-भात खाकर उसका केवल पेट नहीं भरा, आत्मा भी संतुष्ट हुई. शाम को पापा ड्यूटी से लौटे, हाल-चाल पूछा. रात को भोजन की टेबल पर चर्चा शुरू हुई, 'कैसा लग रहा है तुम्हें वहां?' पापा ने बात शुरू की.
'बहुत अच्छा।' प्रद्युम्न ने कहा.
'कहाँ तक गाड़ी पहुंची तुम्हारी?'
'गाड़ी?'
'हाँ, गाड़ी. भई, हम तो रेल्वे वाले हैं, हमारी तो गाड़ी चलती है न?'
'जी, समझ गया. अभी तो गाड़ी ने स्टेशन छोड़ा है.'
'अरे, स्पीड नहीं पकड़ी अभी तक?'
'नहीं पापा, अभी तो पैर पटक-पटक कर पैरों को मजबूत बना रहा हूँ.'
'कब तक चलेगा ऐसा?'
'नहीं, ऐसा नहीं है. पैरों के साथ-साथ हाथों को भी तैयार किया जा रहा है. भावाभिव्यक्ति का प्रशिक्षण चल रहा है और संगीत की समझ भी बन रही है.'
'रहने-खाने की व्यवस्था ठीक है?'
'ठीक ही है.'
'क्या मतलब? तुम्हारी आवाज़ कमजोर सी लग रही है?'
'वहां नृत्य सीखने गया हूँ. वहां रहने-खाने की सोचूंगा तो सीख चुका नृत्य।'
'फिर भी?'
'ठीक है. पेट भर जाया करता है और इतनी थकान हो जाती है कि जैसा भी बिस्तर होता है, नींद आ जाती है.'
'क्यों इतनी तकलीफ सह रहा है वहां फिर? मां ने प्रश्न किया.
'जब मैं क्रिकेट खेलता था तब मेरे कोच वरदू अन्ना क्या कहते थे मालूम है आपको?'
'क्या कहते थे?'
'वे कहते थे, "प्रद्युम्न, नो पेन नो गेन". बताते हुए प्रद्युम्न जोर से हंसा. उसकी बात सुनकर सब हंसने लगे.
'कितने लोग सीखते हैं वहां?'
'हम दो लड़के और ग्यारह लड़कियां.'
'लड़के कम क्यों हैं?'
'लड़कियां अधिक क्यों हैं, यह पूछिए.'
'बताओ.'
'इसलिए कि उनके शरीर में लोच अधिक होता है.'
'और लड़कों में?'
'लड़कों को अपना शरीर लचीला बनाना पड़ता है.'
'वैसे भी नृत्य करती लड़कियां अच्छी लगती हैं.' शाश्वती ने अपनी राय दी.
'मैं सहमत हूँ लेकिन पुरुष भी कम कमनीय नहीं लगते।'
'जैसे?'
'जैसे मेरे गुरु महराज और जैसे नर्तक गोपीकृष्ण. इनके नृत्य मनोहारी होते हैं. इन्होंने कत्थक को प्राणवान बनाया है.'
'वैसे, स्कोप क्या है तेरा?' पापा ने दखल दिया.
'कैसा स्कोप?'
'फायनेंशियल?'
'पैसा लगना भर है, मिलना कुछ नहीं है.'
'तो फिर क्या फायदा?'
'मैं कत्थक नर्तक बन जाऊँगा।'
'नर्तक बनने से क्या फायदा? आखिर पेट भी तो लगा हुआ है हमारे साथ?'
'मैं आपकी चिंता को समझ रहा हूँ पापा लेकिन कुछ लोग संसार में ऐसे भी होते हैं जो आर्थिक लाभ के लिए नहीं जीते, आत्मिक सुख के लिए जीते हैं.'
'ठीक है, तू जिसमें खुश है, रह. मेरे जीते-जी तेरी व्यवस्था बन जाएगी। मेरे बाद कैसा होगा, वह तेरे देखने का काम है.'
'पापा......' प्रद्युम्न की आँखों से आंसू बहने लगे.
चौथे दिन प्रद्युम्न दिल्ली वापस चला गया. घर में सूनापन छा गया. कोई किसी से बात नहीं कर रहा है. दरअसल किसी को कुछ सूझ ही नहीं रहा है कि किससे क्या कहा जाए? प्रद्युम्न के निर्णय के आगे सब नतमस्तक थे लेकिन उसका निर्णय किसी के पल्ले नहीं पड़ रहा था. नर्तक बनेगा!
* * * * * * * *
साधने की बात होती है साधना. मनुष्य का पूरा जीवन कुछ-न-कुछ साधने में ही बीत जाता है. अधिकतर घर-परिवार को साधते-साधते अंतिम साँसें गिनने लगते हैं. अंतिम समय जब जीवन भर का चलचित्र अत्यंत त्वरित गति से मस्तिष्क में चलता है तो आँखों से आंसू बहने लगते हैं, संतुष्टि के नहीं, अफ़सोस के आंसू. जो भी किया, जिसके लिए किया, सब निरर्थक चला गया. कोई नहीं मानता कि मृत्यु शैय्या पर लेटे हुए व्यक्ति ने उन सबके लिए अपने जीवन का होम कर दिया है. उसे अफ़सोस होता है कि उसने अपना जीवन अपने लिए क्यों नहीं जिया? जो जीवन में चाहा था, क्यों नहीं किया. अपनी इच्छाओं को दरकिनार करके दूसरों के लिए क्यों अपने जीवन की आहुति दे दी? कम लोग होते हैं जो इस सोच से बाहर निकलकर अपनी अभिलाषाओं को पूरा करने के लिए यत्न करते हैं. ऐसे लोग आजीविका चलाने के बदले अपने जीवन को चलाते हैं, अपनी मर्जी से. जो उनके दिल ने चाहा, उसे पूरा करने के प्रयत्न करते हैं. इसके लिए उन्हें अपने परिवार का प्रतिरोध सहना पड़ता है, समाज का उपहास सहना पड़ता है. इस दिशा में चलने वालों का भविष्य अनिश्चित होता है लेकिन चलने की राह निश्चित होती है, उनका लक्ष्य स्पष्ट रहता है. वे जानते हैं कि मार्ग में कांटे हैं, रास्ता उबड़-खाबड़ है, पैर नंगे हैं फिर भी उनकी लगन उनके साथ चलती है जो उन्हें मंज़िल तक पहुँचाती है.
प्रद्युम्न लगनशील था लेकिन गुरु का घर आसान नहीं होता। गुरु अपना ज्ञान मुफ्त में नहीं बांटता, पूरी कीमत वसूल करता है. घर की साफ़-सफाई, सब के लिए भोजन तैयार करना और परोसना भी संगीत के प्रशिक्षण में शामिल रहता है. रात को गुरु के शयन के पूर्व उनके पैर दबाना भी जरूरी होता है, भले ही खुद के पैर दर्द के मारे टूटे जा रहे हों. प्रद्युम्न को इन कामों से शुरुआत में झिझक हुई फिर यह सब रोज की गतिविधि में आ गया. एक और अभ्यास सीखना पड़ा, गन्दी गालियां सुनने का. नृत्य सिखाते समय गुरुदेव एकदम निर्मम हो जाते थे, ज़रा सी चूक हो जाए तो इतनी भद्दी गालियां देते थे लेकिन चुपचाप सुनना पड़ता था. ऐसा नहीं था कि केवल लड़कों को पड़ती थी, लड़कियों को भी बराबर से सुननी पड़ती थी. यह सब नृत्यप्रशिक्षण का एक जरूरी अंग जैसा था. दरअसल, गुरु सुशिक्षित नहीं थे, वे केवल नृत्य विधा के पारंगत थे, कला जानते थे इसलिए नृत्य सिखाते समय वे अपने मौलिक स्वरुप में उपस्थित होते थे, कोई आडम्बर नहीं होता था उनके बातों और व्यवहार में. शिष्य भी धीरे-धीरे उनकी आदतों से परिचित होकर उनकी बातों का बुरा नहीं मानते थे. जिसे गुरु का व्यवहार अच्छा नहीं लगता था वह बीच में साधना छोड़कर चला जाता था, जिसे गुरु की गालियाँ अच्छी लगी वह गुरु से सीख कर जाता था. गुरु का आदेश मानना अनिवार्य था. जैसे, गुरु ने कोई मुद्रा सिखाई और बोले, 'तुम लोग इसका अभ्यास करो, हम पान खाकर आते हैं.' और वे घर के बाहर चले गए, वे कब लौटेंगे, किसी को पता नहीं होता था. हो सकता है डेढ़-दो घंटे बाद लौटें लेकिन सभी शिष्य उसी मुद्रा का अभ्यास करते मिलना चाहिए उन्हें अन्यथा डांट और गालियों की बौछार।
बिरजू महाराज ने भारतीय कत्थक की नृत्य परंपरा में नए प्रयोग किए. उन्होंने अपनी विदेश यात्राओं में विदेशी नर्तकों को समूह में नृत्य करते देखा जिसे वे भारतीय कत्थक में ले आए. कत्थक नृत्य में 'लाईट एंड साउंड इफेक्ट' का उपयोग करना भी आरम्भ किया. वे कत्थक की परंपरा में नित नूतन प्रयोग कर रहे थे. वे अपने शिष्यों से कहते थे, 'देख्या, परख्या और सीख्या' अर्थात देखो, परखो और सीखो.
उन्होंने कत्थक नृत्य की विधा को गिनती से जोड़ा. जैसे एक दो तीन चार पांच छै सात आठ नौ...आदि. पति-पत्नी के रूठने, प्रेमी-प्रेमिका को रिझाने के लिए कत्थक को गिनती से जोड़ा. उनका मानना था कि गिनती बताने से दर्शकों को नृत्य समझने में आसानी होती है. उन्होंने अनेक तिहाइयां बनायी, तिहाई का अर्थ किसी क्रिया को समाप्त करना जैसे मन्त्र में 'ॐ शांति, शांति शांतिः' का तीन बार प्रयोग या राष्ट्रगीत में 'जय हे जय हे जय हे' की तीन बार आवृत्ति. उन्होंने हाकी के खेल की तिहाई, कबड्डी की तिहाई, हवाई जहाज के जमीन पर उतरने की तिहाई विकसित की.
प्रद्युम्न बचपन से खेल से जुड़ा हुआ था. यद्यपि अब वह खेल से दूर-दूर रहता था लेकिन उसके स्वभाव में थोड़ा रूखापन आ गया था, सरसता का अभाव था. क्रिकेट छोड़ने के बाद वह अक्खड़ हो गया था, घर में भी और बाहर भी. यह रूखापन उसकी नृत्य साधना में बाधक बन रहा था. वह नृत्य सीखता था, लगन से लेकिन भावाभिव्यक्ति में वह बात नहीं ला पाता था जिसकी कत्थक में अनिवार्यता होती थी. वह कोशिश करता था लेकिन असफल हो जाता था. उसकी इस कमी की और बिरजू महाराज का ध्यान गया. उन्होंने पूछा, 'क्यों, क्या बात है, तुम अपने चेहरे पर नृत्य के भाव नहीं ला पाते हो? तुम्हारा मुखड़ा सपाट रहता है.'
'कोशिश करता हूँ गुरुदेव.'
'कोशिश, कैसी कोशिश?'
'जैसा आप बताते हैं.'
'तो फिर वह बात क्यों नहीं आती जो हम चाहते हैं.'
'पता नहीं गुरुदेव, मैं शायद समझ नहीं पा रहा हूँ.
'जब अन्य शिष्य समझ रहे हैं तो तुमको क्यों समझ में नहीं आ रहा है?'
'........'
'देखो, नृत्य देवी सरस्वती की आराधना है. सरस्वती को साधने के लिए सरसता चाहिए. यदि तुममें सरसता नहीं आएगी तो तुम सरस्वती को कभी नहीं पा सकोगे. जैसे ही अभिमान आया तो सरस्वती पास में नहीं आएगी और उसके बाद लक्ष्मी भी दूर चली जाएगी.'
'लेकिन मुझमें वह बात नहीं है गुरुदेव. अभिमान करने लायक तो मैं अभी हुआ भी नहीं हूँ.'
'तो फिर मुझे ऐसा क्यों दिखाई पड़ता है?'
'यह तो मुझे नहीं पता है लेकिन बचपन की एक घटना का प्रभाव है मुझ पर, मैं उससे बाहर नहीं निकल पा रहा हूँ.'
'कौन सी घटना?' गुरुदेव ने सहज भाव से पूछा. प्रद्युम्न ने अपने किशोरावस्था की क्रिकेट वाली घटना को आद्योपांत बताया .गुरु ने उसकी पूरी बात ध्यान से सुनी और वे अचानक खड़े हो गए. उन्होंने अपने पैरों को 'क्रास' किया, दोनों हाथों को अपने सिर के पास ले गए और मटकी को पकड़ने की मुद्रा बनाई, फिर चेहरे पर एक अरुचिकर भाव बनाया और मटकी को उतार कर फेंकने का अभिनय किया और अपने हाथों को झटकार कर बैठ गए. उसके बाद उन्होंने प्रद्युम्न को वैसा ही करने के लिए संकेत किया. प्रद्युम्न ने हूबहू उनकी नक़ल की. उसको अभिनय में छुपा हुआ अर्थ समझ में आ गया और उसकी आँखों से आंसू बहने लगे. वह घुटनों के बल बैठकर बहुत देर तक रोता रहा और गुरु के चरण भिगोता रहा. इस घटना के बाद प्रद्युम्न बदल गया.
एक साल की कठिन तपस्या के बाद प्रद्युम्न बिलासपुर लौटा. यहाँ की एक संस्था ने प्रद्युम्न के कत्थक नृत्य के एकल प्रदर्शन का आयोजन किया. सभागार उत्सुकता से परिपूर्ण था, क्यों न हो, शहर के एक नवयुवक ने अपने जीवन के लिए कत्थक को चुना और देश के माने हुए नर्तक बिरजू महराज से नृत्य सीख कर आया था.
मंच पर प्रद्युम्न का नृत्य शुरू हुआ. एक घंटे तक वह अनवरत नाचता रहा, वाह-वाह की आवाज़ उठती रही. अंत में उसने क्रिकेट की तिहाई का प्रदर्शन किया. गेंदबाज ने गेंद फेंकी, बल्लेबाज ने शाट लगाया, गेंद चूक गयी, बल्लेबाज की मुखाकृति में रोष प्रगट हुआ. दूसरी गेंद आई, वह भी छूट गयी, बल्लेबाज के चेहरे पर क्रोध और विषाद के मिश्रित भाव उभरे. तीसरी गेंद फेंकी गयी, यह गेंद उसके बल्ले पर आई और बल्लेबाज ने दौड़कर एक रन बनाया. नर्तक के चेहरे पर असंतोष का भाव उभरा. चौथी गेंद पर उसने अपना बल्ला घुमाया और वह गेंद सीमारेखा के उस पार गिरी, छक्का लग गया. नर्तक ख़ुशी के मारे झूम-झूम कर नाचने लगता है. पूरा सभागार तालियों की गडगडाहट से गूंजने लगा. दर्शक खड़े होकर प्रद्युम्न का अभिवादन करने लगे. प्रद्युम्न के पग थमे, उसने रूककर सबका अभिवादन स्वीकार किया. वह मंच पर खड़े-खड़े काँप रहा था और अपने गुरु को मन ही मन में प्रणाम कर रहा था.
प्रद्युम्न के माता-पिता और बहन की आँखों से अश्रुधार बह रही थी, ख़ुशी के आंसू थे उनकी आँखों में. वे खुश थे कि प्रद्युम्न अपने जीवन को जिस दिशा में ले जाना चाहा, सफलतापूर्वक ले गया और वे सब उसकी इस अभूतपूर्व जीवन यात्रा में सहायक बने.
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