Wednesday, 15 July 2020

तेरी मेरी कहानी है : तीन : किस्सा बाप और बेटे का :

किस्सा बाप और बेटे का :

कामताप्रसाद सिन्हा नामी वकील हैं। फ़ौजदारी की वकालत में उनका नाम शहर ऊपर है। छोटे-मोटे प्रकरण वे छूते नहीं, किसी ने किसी का 'मर्डर' किया हो या धोखे से उससे हो गया हो तो कामताप्रसाद सिन्हा के रहते फिक्र करने की ज़रूरत नहीं है। फीस का इंतज़ाम होना चाहिए, जमानत और उसके दोषमुक्त होने का ठेका कामताप्रसाद सिन्हा को बेखटके दिया जा सकता है। उनके 'चैंबर' की आलमारियाँ कानून की किताबों से भरी हुई हैं जिसे देखकर मुवक्किल उनके कानूनी ज्ञान से अभिभूत सा हो जाता है किन्तु सच यह है कि वे किताबें वकील साहब के शोरूम की महज़ सजावट हैं, सिन्हा जी उन किताबों को यदाकदा ही छूते हैं क्योंकि उनका काम टेबल में रखी दस-बीस किताबों से ही निकल जाता है। इतने सालों से केस लड़ते-लड़ते फ़ौजदारी कानून की सभी ज़रूरी जानकारियाँ और पेंच उन्हें याद हैं।

वैसे तो थाने में शिकायत दर्ज़ होने के बाद पूछताछ में ही पुलिस को समझ में आ जाता है कि असल अपराधी कौन है लेकिन पुलिस को फैसला देने का अधिकार नहीं है। जब मामला वकील के पास जाता है तो उसे भी मालूम हो जाता है कि असली बात क्या है लेकिन उसका काम न्याय करना नहीं है, न्याय दिलाने में मदद करना है। अपराधी छूट जाए या कोई निर्दोष जेल की सलाखों के पीछे चला जाए, यह सिरदर्द वकील का नहीं होता, उसका काम है, अपने मुवक्किल की, जिससे फीस मिली है, उसके भले की बात सोचना।       
यद्यपि मुकदमे के दौरान ही जज मामले की तह तक पहुँच जाते हैं लेकिन असली हत्यारे को सज़ा नहीं दे पाते क्योंकि पुलिस की अपराधी से मिलीभगत, या चश्मदीद गवाहों की कमी' या पर्याप्त साक्ष्य का अभाव, या वकीलों की दलील के सामने उनकी कलम का दम उखड़ जाता है। अदालत में विराजमान न्यायाधीश के हाथ कानून से बंधे होते हैं। उनका काम किसी फोटो में लगे 'फ्रेम' की तरह होता है जो सीमा जानते हैं और निर्धारित कसौटी में कस कर निर्णय देते हैं। अपराधी बरी हो जाते हैं, फलस्वरूप कामताप्रसाद सिन्हा जैसे वकीलों के चेहरे की चमक और बढ़ जाती है, उसी अनुपात में उनकी फीस भी बढ़ जाती है।


कामताप्रसाद सिन्हा का एक बेटा है, अनुप्रास। सिन्हा जी का इकलौता वारिस। शादी के सोलह वर्ष बाद उसका जन्म हुआ और इकलौता रह गया। कामताप्रसाद गुलाबजामुनी रंग के हैं, उनकी पत्नी उषा सफ़ेद रसगुल्ला की तरह। अक्सर ऐसा होता है कि लड़के पिता के रंग पर जाते हैं लेकिन अनुप्रास अपनी माँ के रंग पर गया। गोरा-नारा, सबका प्यारा। अब सोलह साल का हो गया है, बिलासपुर के सबसे नामी भारतमाता स्कूल में ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ता है। पढ़ने में तेज है, खेलकूद में सक्रिय है इसलिए कामताप्रसाद को अनुप्रास के लिए कोई फिक्र न थी। वे उसके बड़े होने का इंतज़ार कर रहे थे क्योंकि वे जानते थे कानून की किताबों का बोझ अधिक समय तक नहीं ढो पाएंगे, समय आने पर अनुप्रास संभाल लेगा।

अभी अनुप्रास किशोरावस्था के दौर से गुजर रहा है। उसे दोस्ती-यारी करना और घूमना-फिरना अच्छा लगता था। पढ़ने में भी अच्छा था लेकिन काम चलाऊ। उसे भविष्य की फिक्र ही न थी, वह वर्तमान को जी रहा था। खर्च के लिए माँ से जब चाहे जितने पैसे मिल जाते थे इसलिए दोस्त-यार भी उसके पीछे लगे रहते। सिनेमा देखने का चस्का लग गया, जब भी दिल हुआ, किसी न किसी दोस्त से कहता, 'चल, पिक्चर देखने चलते हैं।' कोई भला क्यों मना करता। पिक्चर देखकर लौटने के बाद भी घर में कोई खास पूछताछ नहीं होती थी इसलिए कोई चिंता भी नहीं होती थी। सिनेमा से बढ़ रही उसकी दीवानगी का असर उसके दिमाग में पड़ने लगा था, वह 'किसी से' प्रेम करने के सपने देखने लगा था, ऐसा सपना जो निकट भविष्य में सच होने वाला था।

वकील साहब याने कामताप्रसाद सिन्हा को कानूनी फाइलों से फुर्सत न थी। उनके पास काम इतना ज़्यादा था कि वे नए केस भी माप-तौल कर लेते थे। उनके पास अधिकतर मुक़द्दमे हत्या या हत्या के प्रयास वाले होते थे। बलात्कार के केस लेना उनको पसंद नहीं था क्योंकि उसकी जिरह में अश्लीलता का पुट रहता था जो उन्हें नापसंद था। सुबह छः बजे उठ जाते थे, सुबह की सैर के बाद स्नान और भगवान की पूजा, उसके बाद नास्ता और नौ बजे के आसपास अपने चैंबर में आसीन हो जाते थे। उनका मुंशी उनके पहले आकर साफ-सफाई कर देता था क्योंकि वकील साहब को धूल और जाले बिल्कुल पसंद नहीं थे। किताबें सुव्यवस्थित हों, फाइल यथास्थान हों, पेन और पेंसिल अपनी निर्धारित जगह पर रखी हों, टेलीफोन चमकता हुआ हो। वे खुद भी जब ऑफिस में आते तो लक-दक करते हुए कपड़े पहन कर आते। उनके सिर पर बाल कम थे, फिर भी वे करीने से कंघी करके आते थे। उनके ऑफिस पहुँचने के पाँच-दस मिनट के अंदर दो जूनियर आकर उनके अगल-बगल बैठ जाते और फिर आज की तारीख के केस की तैयारी चलती, तैयारी क्या, यह तय होता कि कौन से केस में आज तारीख लेनी है, किसमें जिरह करना है और किसमें आज बहस होगी। उन फाइलों पर वकील साहब सरसरी निगाह डाल लेते जिन पर जिरह और बहस करनी होती, शेष फाइलें एक तरफ खिसक जाती। ठीक साढ़े दस बजे वे उठ जाते, कालर में 'बो' बांधते, काला कोट पहनते और अपनी मारुति800 में बैठकर अदालत के लिए निकल जाते। दिन भर अदालत की दौड़-भाग होती। शाम को 6 बजे के आसपास घर लौटते। भोजन करते और फिर से चैंबर में आसीन हो जाते। अब मुवक्किलों से मुलाक़ात का वक्त होता। रात को दस बजे तक अगले दिन के मुकद्दमों की तैयारी होती। कभी-कभी ग्यारह बज जाते। इस प्रकार उनका दिन भर का कार्यक्रम रहता। पत्नी और बेटे से बातचीत के लिए उनके पास समय नहीं होता था, व्यवसायिक व्यस्तता की कीमत तो देनी ही पड़ती है. अदालतें साल में 365 दिन तो चलती नहीं, बीच-बीच में छुट्टियाँ भी होती हैं लेकिन छुट्टियाँ भी आपसी बातचीत के लिए थोड़ा सा समय अपने साथ नहीं लाती। न जाने क्या हो गया है वकील साहब को, वे हर दिन, हर समय मुकद्दमों में ही व्यस्त रहते हैं। हत्यारों के बचाव में तर्क खोजते मनुष्य का दिमाग क्या इतना उलझ जाता है कि उसे अपने खुद के जीवन की सुधि नहीं रह जाती. वकील साहब के लिए उनकी पत्नी उनकी जरूरतें पूरी करने वाली जीती-जागती मशीन की तरह हो गयी थी और उनका बेटा उनके भावी राजपाट को संभालने वाला युवराज, बस।

आज अनुप्रास का जन्मदिन है. सोलह साल का हो गया, बचपन बीत गया है. युवावस्था जीवन में प्रविष्ट हो रही है. आज वह बहुत खुश है क्योंकि मम्मी ने जन्मदिन मनाने का कार्यक्रम घर में रखा है. ड्राइंग रूम को सजाया गया है. केक आया है. मिठाई आयी है. गरम समोसे आने वाले हैं. अनुप्रास के कुछ खास दोस्तों को भी खबर गयी है, वे भी जरूर आएँगे. मोहल्ले-पड़ोस के कुछ घरों में भी न्यौता भेजा गया है.
शाम को सात बजने वाले हैं. धीरे-धीरे मेहमानों का आना शुरू हो गया है. अनुप्रास की मम्मी इस बीच पापा के पास गयी, 'चलो, अनुप्रास का जन्मदिन है आज. कुछ कार्यक्रम रखा है.'
'अरे, आज अनुप्रास का जन्मदिन है? मुझे तो याद ही नहीं रहा.' वकील साहब बोले.
'तुमको तो बस अदालत की तारीखें याद रहती हैं, घर-द्वार का तुमको होश कहाँ रहता है?'
'उसकी देखरेख मैंने तुम्हारे जिम्मे छोड़ रखी है।'
'वो ठीक है लेकिन थोड़ा परिवार की तरफ भी ध्यान दिया करो.'
'पूरा ध्यान रखता हूँ. सुबह से रात तक परिवार के लिए ही तो मेहनत करता हूँ.'
'मैं मानती हूँ लेकिन यह भी देख रही हूँ कि तुम आजकल रूखे से हो गए हो.'
'किसलिए यह आरोप लग रहा है आज मुझ पर?'
'इतने नामी वकील पर मेरे लगाए आरोप कहाँ ठहरेंगे?'
'तुमसे वकालत करूँगा भला?'
'छोड़ो वो सब बात, आज अनुप्रास के जन्मदिन पर कुछ लोग आए हुए हैं, चलो, अभी चलो ड्राइंग रूम में.'
'अच्छा, तुम पहुंचो, मैं पांच मिनट में आता हूँ.' वकील साहब बोले।

सब लोग आ चुके हैं. अनुप्रास के पापा की कमी है. 'आ रहे हैं, थोड़ी में.' बताया मम्मी से सबको. धीमे-धीमे बातचीत चल रही थी. कुछ देर बाद वहां बैठे लोगों के चेहरों में बेचैनी के भाव दिखने लगे. आखिर कब तक बैठे रहें? मम्मी फिर से चैंबर गयी, वकील साहब के सामने दो लोग बैठे थे, उनकी आपस में कुछ बातचीत चल रही थी। वे चुपचाप वापस आ गयी और सबसे कहा, 'चलो हम सब मिलकर अब अनुप्रास का जन्मदिन मनाएँ।'
सब लोग केक के आसपास घेरा बनाकर खड़े हो गए, अनुप्रास ने जल रही मोमबत्ती बुझाई, केक काटा और स्वर उठ पड़ा, 'हेप्पी बर्थ डे टू यू, अनुप्रास हेप्पी बर्थ डे टू यू।'
पीछे से पापा भी आकर खड़े हो गए और सबके साथ वे भी तालियाँ बजाने में शामिल हो गए।

जन्मदिन की पार्टी खत्म हो रही थी, सब लोग जा रहे थे। पड़ोस की नीता भी आई थी, वह अनुप्रास के पास आई और मुस्कुराकर कहा, 'हेप्पी बर्थ डे अनुप्रास।'
'थैंक यू।'
'आज बड़े खुश हो और खूबसूरत भी दिख रहे हो।'
'ऐसा क्या?'
'हूँ।' नीता ने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा। अनुप्रास उसके स्पर्श से रोमांचित हो गया, कंपकंपी सी महसूस हुई उसे। अनुप्रास उसे देखकर मुस्कुराया, इसके बाद वह भी मुस्कुराते हुए चली गयी।

नीता की मुस्कुराहट का असर अनुप्रास के दिल में गहरे तक धंस गया। वह दिन-रात उसी मुस्कुराहट में तैरता-उतराता रहता, उसके स्पर्श को महसूस करता रहा। वह फिर से नीता को देखना चाहता था लेकिन आते-जाते वह दिखती ही न थी, जबकि उसका घर पड़ोस में ही था। उस दिन जाते-जाते उसका मुसकुराना, हाथ मिलाना अनुप्रास की यादों में बस गया था। वह बार-बार उस घटना को याद करता और उसे फिर-फिर जीना चाहता था, पर वह तो घट गया था, दोबारा कैसे हो, बार-बार कैसे हो?

किशोरावस्था बहुत नाज़ुक होती है, जरा सी बात मन में गहरे तक असर करती है। विपरीत लिंगी आकर्षण काम करने लगता है। मन में सागर जैसी पागल लहरें उठती हैं। मन का चैन बेचैनी में बदल जाता है, ऐसी बेचैनी होती है कि मन एक बिन्दु पर जाकर ठहर जाता है और उसी जगह घूमता रहता है।

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'चाय पियोगे क्या? बनाऊँ? उषा ने पूछा।
'चाय? हाँ बना दो।' कामता प्रसाद ने उत्तर दिया। 'थोड़ी अदरक डाल देना चाय में।'
'अभी बनाकर लाती हूँ।' कहती हुई उषा किचन की ओर चली गयी।
कामता प्रसाद अपने काम में बहुत व्यस्त रहते थे। दिन-रात मुवक्किलों की फाइल और कानून की किताबें पलटते रहते। कई बार जब थक जाते तो अपनी कुर्सी में पीठ टिका कर झपकी ले लेते। इस समय वैसी ही थकान चढ़ी थी। उषा ने ठीक समय पर आकर चाय के लिए पूछा।
उषा बहुत होशियार गृहणी है, बिना कहे सब समझ जाती है। किचन में दिन भर अकेले काम करती है और पूरे घर की देखभाल का जिम्मा भी उसी का है। वकील साहब को वकालत से फुर्सत हो तो घर की तरफ देखें, हर समय उनके सिर पर अदालती मामलों का भूत सवार रहता है। उनके लिए उनके मुकदमें पहली प्राथमिकता में रहते हैं, बाकी बातें बाद में। उनका ध्यान न उषा की ओर है, न अनुप्रास की ओर। ऐसी स्थिति में उषा के ऊपर तिहरी ज़िम्मेदारी रहती है, घर का रख-रखाव, वकील साहब की देखरेख और अनुप्रास की गतिविधियों पर नज़र रखना।
'लो, चाय।' उषा ने चाय का कप बढ़ाते हुए कहा।
'रख दो।' कामता प्रसाद ने कहा।
'रख नहीं दो, पियो, तुरंत पियो। चाय ठंडी कर दोगे और कहोगे, फिर से गर्म करके लाओ।'
'अच्छा दो, पी लेता हूँ।'
'अनुप्रास बड़ा हो रहा है, कुछ उसकी तरफ ध्यान दो, तुम तो उससे बात तक नहीं करते।'
'क्या बात करूँ उससे? पढ़ाई कर रहा है न? बस ठीक है।'
'सिर्फ पढ़ाई नहीं, इस उम्र में कुछ खेलना भी जरूरी है। अब उसकी खेलों में भी रुचि नहीं दिखती।'
'तो फिर किसमें है?'
'सिनेमा देखने में।'
'क्या कह रही हो?'
'सच कह रही हूँ।'
'ठीक है, मैं उससे बात करता हूँ।' कामता प्रसाद ने ठंडी आवाज़ में कहा।
'डांटना मत, समझा कर बात करना।'
'डांटूगा नहीं तो कैसे समझेगा? फिर तुम ही समझा दो उसे।' कामता प्रसाद ने कहा।
'मैंने समझाया था लेकिन मेरी बात का असर नहीं हुआ इसलिए तुमसे कह रही हूँ।' उषा ने बताया। कामता प्रसाद ने उषा को घूर कर देखा और चुप हो गये।

आम तौर पर घर में लड़कियों को तैयार करने में माँ की भूमिका होती है वहीं पर लड़कों की पिता पर। माँ अपनी लड़की को रोज कुछ न कुछ सिखाती है, उसे घर की व्यवस्था कैसे करना, सजावट कैसी हो, किचन का प्रबंधन और लोगों से बातचीत कैसे करना आदि। लड़कियां अधिकतर बातें माँ के कामकाज और व्यवहार को देखकर समझ जाती है, कुछ बातें माँ को बोलकर समझाना पड़ता है। माँ की नज़र में घर का काम प्रमुखता से होता है जबकि लड़की की प्राथमिकताएँ उसकी पढ़ाई, खेल और अन्य उपलब्ध मनोरंजन के साधन होते हैं, घर के काम उसके लिए मजबूरी जैसे होते हैं इसीलिए माँ-बेटी के रिश्ते में थोड़ा तनाव रहता है क्योंकि गृहकार्य में अनुभवसिद्ध माँ की तुलना में बेटी कमजोर पड़ती है। परिणामस्वरूप दोनों के बीच कहा-सुनी के कारण आपस में हल्की सी खटास पनपने लगती है। इसके बावजूद माँ अपनी बेटी को तैयार करने की ज़िम्मेदारी निभाते हुए उसे मनमाफिक तैयार करने में लगी रहती है। वहीं पर बेटे के लिए वह बेफिक्र रहती है क्योंकि बेटे को 'लाइन' पर लगाने की ज़िम्मेदारी पिता की मानी जाती है। पिता के रहते बेटे के मामले में माँ का दखल कम रहता है लेकिन वह समय-समय इशारा अवश्य करती है। यही स्थिति अनुप्रास को लेकर सामने आयी इसलिए उषा ने कामता प्रसाद को बताना उचित समझा।

कामता प्रसाद को घर या बेटे की चिंता से ज्यादा अपने मुवक्किलों की रहती है। क्यों न हो? उनकी प्रतिष्ठा का सवाल है। एक भी प्रकरण यदि उनकी पकड़ से बाहर हो जाता है तो घर में आकर अपना माथा पकड़ कर बैठ जाते हैं। उनकी इस मुद्रा को देखकर उषा समझ जाती है कि 'ये आज कोई केस हार गये हैं'। आम तौर पर वकीलों के साथ ऐसा नहीं होता, हार-जीत उनके लिए महत्व नहीं रखती जैसे किसी मरीज की उपचार के दौरान मृत्यु हो जाने पर डाक्टर बेअसर होते हैं। भई, हमने कोशिश की, जीत-हार तो जज की अक्ल और समझ पर निर्भर करती है परंतु कामता प्रसाद के साथ ऐसी बात नहीं थी। वे जीतने पर उतने खुश नहीं होते थे लेकिन हारने पर बहुत दुखी हो जाते थे। कई बार तो वे मुवक्किल के घर वालों को बुलाकर उसकी फीस वापस कर देते थे, कहते, 'तुमने मुझे केस जिताने के लिए फीस दी थी न? लो, अपना पैसा वापस।' वे भी विस्मित हो जाते और कहते, 'नहीं वकील साहब, आपने तो पूरी कोशिश की, इसे आप रखिए'। तो, ऐसे वकील थे कामता प्रसाद।

अदालती चक्कर में अनुप्रास का प्रकरण उनके दिमाग से उतर गया, वे अनुप्रास से चर्चा करना भूल गये। एक दिन अनुप्रास उनके सामने पड़ गया तब उनको उषा की कही बात याद आई। 'क्यों, आज कल तुम्हारा ध्यान किधर है?' कामता प्रसाद ने पूछा।
'मैं समझा नहीं।' अनुप्रास ने धीरे से कहा।
'हमने सुना कि तुम सिनेमा बहुत देखते हो।'
'नहीं पापा जी, ऐसी बात नहीं है।'
'तो, कितनी फिल्में देखते हो?'
'जब कोई नयी फिल्म आती है।'
'नयी फिल्म कब लगती है?
'हर हफ्ते लगती है।'
'इसका मतलब यह हुआ कि तुम हर हफ्ते फिल्म देखने जाते हो।'
'सभी फिल्में नहीं देखता, जो अच्छी होती है उसे देखता हूँ।'
'देखो, कभी-कभी फिल्म देखने में कोई हर्ज़ नहीं है लेकिन अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। अच्छी तरह पढ़ोगे तब मेरी कुर्सी पर बैठ पाओगे।'
'जी।' अनुप्रास ने कहा। कामता प्रसाद मुस्कुरा दिए। वे अपनी जवानी में खुद भी बड़े सिनेमची रहे हैं इसलिए अनुप्रास का सिनेमा के प्रति लगाव को भलीभाँति समझ पा रहे थे।

* * * * * * * *  

डिस्ट्रिक्ट जज की अदालत खचाखच भरी हुई थी. कुछ लोग दरवाजे पर खड़े होकर झांक रहे थे. कामता प्रसाद पूरी तैयारी से आए थे क्योंकि उस दिन शहर के एक बहुचर्चित मामले पर अंतिम बहस करनी थी. दैनिक अख़बारों में भी घटना के विवरण विस्तार से प्रकाशित हुए थे. झगड़ा ऑटो चालकों के बीच का था जिसमें ऑटो संघ के एक पदाधिकारी ने दिनदहाड़े अनेक लोगों की उपस्थिति में साथी ऑटो चालक की घातक हथियार से हत्या कर दी थी. जनमानस ऐसे हत्याकांड के विरुद्ध था और चाहता था कि ऐसी गतिविधियों को हतोत्साहित करने के लिए अपराधी को कड़ी सज़ा मिले.

सरकारी वकील ने विस्तार से हत्यारे के विरोध में तर्क प्रस्तुत किए. अब बचाव पक्ष के वकील कामता प्रसाद की बारी थी. 'मी लार्ड, अभियोजन पक्ष के तर्क आपने सुने. उन्होंने उस घटना का नाटकीय चित्रण आपके समक्ष प्रस्तुत किया. मुझे ऐसा लगा जैसे वकील साहब घटना स्थल पर स्वयं उपस्थित थे, क्या ऐसा है?' उन्होंने सरकारी वकील की और मुड़कर पूछा.
'मी लार्ड, यदि मैं वहां पर उपस्थित होता तो अदालत के समक्ष प्रत्यक्षदर्शी गवाह के रूप में उपस्थित होता। मैंने तो उस घटना का चित्र पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार माननीय अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया.' सरकारी वकील ने उत्तर दिया.
'तो, कोई तो होता वहां पर. दिन दहाड़े काम हुआ है ऐसा अभियोजन ने दावा किया है.'
'प्रत्यक्षदर्शी गवाह पेश किए गये थे लेकिन वे पुलिस को दिए अपने बयान से अदालत में पलट गये, क्या करें?'
'पुलिस अगर मारपीट के बल पर झूठे गवाह तैयार करेगी तो यही होगा.'
'आप ऐसा कह सकते हैं लेकिन यह भी हो सकता है कि मुल्जिम ने उन्हें धमकाया हो.'
'खैर, जो भी हुआ हो, यह तय है कि हत्या हुई है लेकिन किसी ने देखा नहीं है कि किसने मारा. ठीक है न?'
'यह बात तो है.' अभियोजन पक्ष के वकील ने स्वीकार किया.
'मी लार्ड, कोई भी गवाह सामने नहीं आया है और न ही कोई परिस्थितिजन्य साक्ष्य अदालत के समक्ष प्रस्तुत हुआ है इसलिए अभियोजन के निरर्थक हैं अतएव मुलजिम को रिहा करने के आदेश देने की कृपा करें.'  कामता प्रसाद ने जज की ओर मुड़ते हुए निवेदन प्रस्तुत किया. अदालत ने दोनों पक्षों के तर्क सुने और फैसला सुनाने के लिए अगली तारीख दे दी.

बार रूम में अच्छी गहमा-गहमी थी. कुछ वकील आपस में चर्चा कर रहे थे. कुछ पढ़ रहे थे तो कुछ ऊँघ रहे थे. कामता प्रसाद अपनी तय कुर्सी पर बैठे हुए कुछ विचार कर रहे थे तब ही उन्हें एक आवाज सुनाई दी, 'वकील साहब.'
कामता प्रसाद ने अपनी बायीं और देखा, सरकारी वकील खड़े थे. 'कहिए कैसे आना हुआ? आइए बैठिए.' कुर्सी की और इशारा करते हुए कहा.
'मैं आपके पास एक ऐसे मकसद से आया हूँ जिसमें मेरा कोई स्वार्थ नहीं है लेकिन हमारे समाज के लिए महत्त्व की बात है.' वे बोले.
'जी, कहिए.'
'देखिए, हम वकील लोग किसी भी केस से भावनात्मक रूप से नहीं जुड़ते. कोई जीते या हारे, हम पर उसका असर नहीं होता. हमें अपने काम से मतलब होता है. मैं सरकारी वकील हूँ, मुझे अपने पारिश्रमिक से मतलब है और आपको मुवक्किल से मिलने वाली फीस से.'
'सही बात है.'
'फिर भी ऑटो वाले की हत्या के केस में मैं स्वयं को जुड़ा हुआ सा महसूस कर रहा हूँ.'
'क्यों, ऐसा क्यों?'
'क्योंकि वह हत्याकांड दिनदहाड़े सैकड़ों लोगों के सामने हुआ था, हत्यारे ने सरेआम मृतक की छाती में चाकू घुसेड़ कर उसकी हत्या कर दी. अनेक लोग गवाही देने के लिए पुलिस के सामने आए और बाद में मुकर गए जैसे कुछ हुआ ही न हो.'
'हाँ, ऐसा तो हुआ है, आज मैंने अपनी बहस में यही बात जज के समक्ष रखी है.'
'जी, आपके तर्क अपनी जगह सही हैं. जिस ढंग से केस यहाँ तक आया है, मुझे लगता है कि अदालत मुलजिम को संदेहलाभ देकर छोड़ देगी लेकिन क्या यह न्याय होगा?'
'न्याय किस चिड़िया का नाम है वकील साहब?'
'उसी का जिसके लिए आप और मैं अदालत में आते हैं.'
'मैं नहीं आता. मैं अपने मुवक्किल का पक्ष रखने के लिए यहाँ आता हूँ, फैसला तो अदालत के हाथ में होता है. जो अदालत को ठीक लगेगा वही होगा.'
'मुझे अदालत का फैसला साफ़-साफ़ नज़र आ रहा है किन्तु मेरे मन में यह चल रहा है कि हम वकील इतने लाचार हो गए हैं कि एक हत्यारे को उसके द्वारा किए गए जघन्य अपराध की सज़ा नहीं दिलवा पा रहे हैं?'
'सजा दिलवाना आपका काम है, मेरा काम उसे छुड़वाना है. हम दोनों के दायित्व अलग हैं, एक दूसरे के विरुद्ध हैं वकील साहब.'
'मैं आपकी बात मानता हूँ लेकिन आज मैं आपसे जनहित की बात करने आया हूँ, न्याय की बात. आप सोचिए कि इस सजा मिलने या न मिलने का क्या असर होगा हमारी सोसायटी में?'
'क्या होगा?'
'यही कि किसी की भी हत्या कर दो, गवाहों को डरा-धमका कर पलटा लो, बड़ा वकील कर लो और बाइज्ज़त बरी हो जाओ.'
'यह कानून की खामी है. मैं इसमें कैसी मदद कर सकता हूँ आपकी. मैं अपने मुवक्किल के पक्ष में खड़ा होने के ले एक प्रकार से वचनबद्ध हूँ. आप क्या चाहते हैं कि मैं उसे जेल भिजवा दूं? हर्गिज नहीं.'
'मैं आपके मुवक्किल के बारे में बात नहीं कर रहा हूँ.'
'तो किसके बारे में बात कर रहें हैं ये सब?
'मैं जनसामान्य के मन में जो न्याय की प्रतिष्ठा है, उसके बारे में बात कर रहा हूँ.'
'यह सोचना जज का काम है, मेरा नहीं.'
'तो फिर ठीक है, मैं चलता हूँ.'
'सुनो, एक बात सुनिए जाने के पहले, मैं आपकी भावना की कद्र करता हूँ. आम तौर पर हमारे पेशे में भावना के लिए जगह नहीं होती, हम लोग निस्पृह होकर अपनी वकालत करते हैं, आप मेरे पास इस विषय पर बात करने आए, दिल से धन्यवाद देता हूँ लेकिन इस केस में मैं अब कुछ नहीं कर सकता. बहस हो चुकी है, अब कुछ बचा नहीं है करने को.'
'हाँ, यह बात तो है. मुझे इज़ाज़त दीजिए, आपका समय लिया मैंने.'
'ओके.' कामता प्रसाद ने कहा.

नियत तिथि पर अदालत ने फैसला सुनाया. जैसी उम्मीद थी, मुल्जिम मुजरिम साबित न हो सका, साक्ष्य के अभाव में बरी हो गया. छूटने के बाद मुल्जिम के चेहरे पर ख़ुशी के साथ-साथ जीत की घमंड का भाव देखकर कामताप्रसाद को बुरा लगा. वह कटघरे से बाहर आकर कामताप्रसाद के पैर छूने के लिए झुका, कामताप्रसाद एक कदम पीछे हट गये. उसके चेहरे में प्रश्नवाचक चिन्ह उभरा लेकिन कामताप्रसाद ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और मुड़कर बार रूम की और निकल पड़े. बार रूम पहुँचने में उन्हें मुश्किल से दो मिनट लगे होंगे लेकिन उतने समय में उस प्रकरण का पूरा चित्र जैसे उनके सामने घूम गया. वे चुपचाप अपनी कुर्सी पर बैठ गये और बार रूम की छत की ओर एकटक देखते रह गये. वे अपने आप से यह सवाल कर रहे थे कि कल के दिन कोई अगर इसी तरह सरेआम मेरी हत्या कर दे और कोई गवाह गवाही देने को तैयार न हो तो वह हत्यारा भी इसी तरह छूट जाएगा क्या? ये कैसा कानून है? कैसा न्याय है?

शाम के वक्त कामताप्रसाद अपने चेंबर में चुपचाप बैठे थे. एक दम उदास. चाय आई, पिया और खड़े होकर आलमारी में सजी कानून की किताबों को देखते रहे, जैसे, कभी देखा न हो. किताबें भी चुप थी जैसे उसे भी अपनी निरर्थकता का बोध हो गया हो. हजारों की कीमत देकर खरीदी गयी किताबें व्यर्थ लगने लगी, बिलकुल बेकार. अपनी कुर्सी में बैठकर सिगरेट जलाई और अपने होंठों से लगा लिया. ख़त्म हुई तो दूसरी जला लिया, फिर तीसरी, फिर चौथी. उसके बाद अधजली सिगरेट को फेंककर सहसा जैसे उन्होंने कोई निर्णय लिया और उषा को आवाज़ लगाई, 'उषा...उषा.'
उषा दौड़ती आई और पूछा, 'क्या बात है? इस तरह तो तुम कभी नहीं बुलाते.'
'अब मैं वकालत नहीं करूंगा.'
'क्या कह रहे हो? दिमाग घूम गया है क्या तुम्हारा?'
'दिमाग घूमा नहीं है, आज ठिकाने आया है.'
'क्या हुआ?'
'आज मुझे समझ आया कि मैं न्याय का नहीं अन्याय का साथ दे रहा था.'
'अन्याय का साथ? मेरे समझ में नहीं आया. तुम ये क्या कह रहे हो?' उषा ने सामने रखी कुर्सी पर बैठते हुए पूछा. 
'पर मुझे समझ में आ गया है.'
'वही तो पूछ रही हूँ कि क्या समझ आ गया.'
'तुम नहीं समझोगी, बस, इतना समझ लो कि कल से मैं कचहरी नहीं जाऊँगा.'
'मत जाना लेकिन कुछ बताओ तो.'
'यही कि अदालतों में फैसले होते हैं लेकिन न्याय नहीं होता. न्याय तक पहुँचने के रास्ते में इतने घुमाव-फिराव हैं कि इन्सान भटक जाता है और एक अंधी गुफा में फंस जाता है. अपराधी छूट जाते हैं और निरपराधी जेल में सजा भुगतते हैं. मैं इसी काम को अपनी होशियारी समझता था लेकिन अब यह बात साफ़-साफ़ समझ में आ गयी है कि मैं उस अन्याय में भागीदार था. जो गलती होनी थी, हो गयी, अब आगे और नहीं करूंगा.' कामताप्रसाद ने एक सांस में बताया. उषा ने पूछा, 'चाय बना कर लाऊं तुम्हारे लिए ?' कामताप्रसाद ने हाँ किया. उषा किचन की और चली गयी. 

चाय पीते-पीते कामता प्रसाद को सूझा कि सेशन जज हसन साहब से मिलकर उन्हें अपना निर्णय बता दिया जाए. कार को गैरेज से निकालकर सेशन जज के बंगले पहुँच गए. इसके पहले भी कामता प्रसाद इस बंगले में आए थे लेकिन इस बार कुछ अलग सा महसूस कर रहे थे. उन्होंने गौर किया कि बंगला छोटा सा है लेकिन बहुत बड़ी जमीन से घिरा हुआ है. चारों ओर बड़े-बड़े वृक्ष लगे हुए हैं, कुछ आम के, कुछ जामुन के और कुछ सागौन के. एक तरफ सब्जियां उगी हुई हैं तो दूसरी तरफ फूलों से भरी क्यारियाँ हैं जो पूरे माहौल में खुशबू बिखेर रही हैं. दोनों के बीच से लाल ईंटों को बिछा कर आने-जाने की राह बनाई गयी है. उस राह पर चलकर वे बंगले के गेट तक पहुंचे. घंटी बजाई और उत्तर की इंतज़ार करने लगे. चपरासी ने दरवाजा खोला, परिचय पूछा और अन्दर चला गया. कुछ ही क्षणों में हसन साहब बाहर आए और कामता प्रसाद का सहज स्वागत किया तथा अन्दर आने का आग्रह किया. 

मोहम्मद हसन सीनियर जज थे, सात महीने बाद रिटायरमेंट होने वाला थे. बातचीत में वे बेहद सलीकेदार और मृदुभाषी थे. सलाम दुआ के बाद उन्होंने पूछा, 'कैसे तकलीफ की वकील साहब आपने ?'
'अब मुझे वकील न कहें, मैंने वकालत छोड़ दी सर.' कामता प्रसाद ने उत्तर दिया.
'अरे, आज ही मैंने आपको कचहरी में काम करते देखा और आप ये बोल रहे हैं कि आपने वकालत छोड़ दी! क्या हो गया?'
'आज मुझे समझ आया कि मैं न्याय के हित में नहीं, अन्याय के लिए में वकालत कर रहा था.'
'बहुत देर कर दी आपने यह समझने में. हमारा ज्युडिशियल सिस्टम ही ऐसा है.'
'मतलब आप मेरी सोच से सहमत हैं?'
'हाँ जी, लेकिन इस सिस्टम में न्याय भी तो होता है. दोषी को दंड मिलता है, निर्दोष छूटते हैं.'
'आपकी बात सही है लेकिन दंड मिलना या न मिलना तो गवाही-साखी पर निर्भर होता है. 
'सही बात है आपकी.'
'फिर कैसा न्याय? मेरी वकालत का अनुभव यह है कि गवाहों को पहले फुसला कर या प्रति-परीक्षण करते समय उसे बहका कर हम दोषी को बचा लेते हैं. कम से कम फौजदारी मुक़दमों में मैंने ये देखा है, ऐसा किया भी है.' 
'ठीक.'
'तो फिर न्याय कैसा?'
'आपके ऊपर महात्मा गाँधी का असर हो गया दिखता है.'
'गाँधी जी को मैंने ज्यादा जाना या पढ़ा नहीं है लेकिन आज एक मुकदमे के फैसले से मैं बेहद परेशान हो गया हूँ.' 
'क्या हुआ?'
'शहर में ऑटो चालक की हत्या की बहुत चर्चा थी. आज उस केस का फैसला हुआ. आरोपी छूट गया.'
'तो?'
'वह हत्यारा था, हत्या उसी ने की थी.' 
'हूँ, आप बचाव के पक्ष में वकील थे?'
'जी.'
'तो आपका मुवक्किल जीत गया, आपको तो खुश होना चाहिए. फिर आपको परेशानी कैसी? '
'मुझे मालूम है कि गवाह क्यों और कैसे पलटे.'
'कैसे पलटे?'
'धमकी देकर डराया गया उन्हें.'
'ये तो होता है, क्या करोगे?'
'यही तो परेशानी का सबब है मेरे लिए. कल के दिन कोई मेरी हत्या कर दे और गवाह को डरा-धमका कर चुप करवा दिया गया तो मेरे हत्यारे को सज़ा कैसे मिलेगी?'
'अच्छा तो ये कारण है आपकी परेशानी का?'
'जी, यह सच है कि यह केस मैं जीत गया, ऐसे सैकड़ों केस जीते हैं मैंने लेकिन इस तरह का विचार पहली बार मुझे आया. मैं खुद को इन अपराधों में शामिल मान रहा हूँ सर.'
'इसका मतलब यह हुआ कि आपका ज़मीर जाग गया.'
'जी.'
'तो फिर एक काम कीजिए आप.'
'आदेश करें.'
'वकालत चालू रखिए.'
'ये आप क्या कह रहे हैं?'
'मैं आपके इस फैसले में एक नयी उम्मीद देख रहा हूँ. देखिए, जब कोई केस आपके पास आता है तब शुरूआती बातचीत से यह मालूम हो जाता है कि मुवक्किल ने दरअसल अपराध किया है या नहीं।'
'हाँ, ये तो है.'
'यदि वह अपराधी है तो उसका केस मत लीजिए और अगर वह निरपराध है तो उसके लिए अदालत में पैरवी कीजिए. ऐसा करके आप न्याय की मदद करेंगे और जब जज साहबान की जानकारी में आपकी वकालत की खासियत की खबर पहुंचेगी तो उनका रुख आपके लिए मददगार होता जाएगा.'
'यह तो आपने गज़ब की सलाह दी है लेकिन एडवोकेट एक्ट के मुताबिक किसी मुवक्किल को मना करने की इजाज़त नहीं है.'
'बहाना बनाने की मनाही तो नहीं है, कह दीजिएगा कि अभी बहुत बिज़ी चल रहा हूँ.' हसन साहब ने मुस्कुराते हुए कहा. 
'बहुत बहुत शुक्रिया आपका सर, आपने मेरा दिमागी बोझ कम कर दिया.' कामता प्रसाद ने आदर पूर्वक कहा और उनसे विदा ली.   

घर आकर उन्होंने उषा को बताया कि वे वकालत नहीं छोड़ रहे हैं. उषा यह सुनकर चकित हो गयी कि थोड़ी देर पहले वकालत छोड़ने की बात कह रहे थे, अब बोल रहे हैं कि नहीं छोड़ेंगे, पर कुछ पूछा नहीं क्योंकि वह जानती थी कि वकील साहब बिना वकालत के रह नहीं सकते. 

**********

अनुप्रास बहुत दिनों तक इधर-उधर ताक-झांक करता रहा लेकिन उसे नीता नहीं दिखाई पड़ी. किसी से पूछने की हिम्मत भी न थी. उसे देखे बिना दिल को चैन नहीं था लेकिन वह दिख नहीं रही थी. बड़ी बेचैनी हो रही थी मन में लेकिन क्या करे? अचानक एक दिन वह नज़र आयी. देखकर मुस्कुराई. अनुप्रास भी मुस्कुराया. बस. दोनों अपने-अपने रास्ते की और बढ़ गये. 

दिन बीते, माह बीते, साल बीते और दूर-दूर से मुस्कराहट का सिलसिला चलता रहा. अब दोनों कालेज में पढ़ने लगे हैं. अब यदाकदा अनुप्रास नीता के घर जाने लगा. नीता की मां अनुप्रास को बहुत चाहती थी. वह घर आता तो अधिकतर बातचीत इन्हीं दोनों के बीच होती थी. एक दिन नीता की मां ने कहा, 'अनुप्रास, तू कायस्थ है, अगर ब्राह्मण होता तो नीता का ब्याह तुझसे ही करती.'
'अच्छा हुआ जो मैं ब्राह्मण न हुआ अन्यथा आपकी ये मुसीबत मेरे गले पड़ जाती.'
'हट रे, मेरी लड़की में क्या अवगुण दिखाई पड़ा तुझे?'
'एक हो तो बताऊँ.'
'आंय, तुम्हारा मतलब है कि मेरी लड़की अवगुणों की खान है?'
'नहीं, मेरा कहने का मतलब यह नहीं है था, परन्तु मैंने सुना है कि शादी के बाद  लड़कियां बदल जाती हैं, सारे गुण अवगुण में बदल जाते हैं. 
'ये तो सारी औरत जाति के ऊपर आरोप लगा दिया तुमने.'
'नहीं, अकसर ऐसा देखा गया है. अब आपका ही उदाहरण लीजिए, आप तो अच्छी-भली हैं लेकिन नीता को लेकर मैं सशंकित हूँ.'
'ऐ, मुंह संभाल कर बात करना मेरे बारे में.' पास में बैठी नीता भड़क उठी.
'तेरे से कौन बात कर रहा है जो बीच में कूद पड़ी?'
'बात तो मेरे बारे में हो रही है न?'
'तो क्या हुआ? बड़ों की बातचीत में बीच में नहीं बोलना चाहिए.'
'अच्छा, तो तुम बड़े कब से हो गए?'
'मैं नहीं तो मम्मी तो है, जब वो कोई बात कर रही हों तो तुम्हें नहीं बोलना चाहिए.'
'मेरे बारे में बात चल रही हो तो भी नहीं बोलना चाहिए?'
'हाँ.'
'तो फिर मेरा यहाँ क्या काम है, आप दोनों बैठकर बातें करो, मैं चली.' नीता गुस्से में उठ खड़ी हुई. मम्मी और  अनुप्रास एक दूसरे को देखकर हंस रहे थे.

दोनों एक ही कालेज में पढ़ते थे. दोनों के विषय अलग-अलग थे, अनुप्रास आर्ट्स में तो नीता साइंस में ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे थे. कभी ऐसा होता कि दोनों के पीरियड खाली होते तो कालेज में कन्हैया मिश्रा की केन्टीन में जाकर बैठ जाते और चाय के साथ बातों का दौर चलता. आज बातचीत की शुरुआत कल घर में हुई बातचीत से शुरू हुई. नीता ने पूछा, 'कल तुमने घर में वैसा क्यों कहा था मेरे बारे में?'
'अरे, हंसी-मज़ाक था, तुमने सीरियसली ले लिया.' अनुप्रास ने उत्तर दिया. 
'मुझे ऐसा मज़ाक पसंद नहीं है.'
'क्या मतलब?'
'वही जो तुमने मेरे बारे में कहा था.'
'ठीक है, आगे से ध्यान रखूँगा.'
'शादी-ब्याह कोई मज़ाक का विषय नहीं होता, यह गंभीर किस्म का निर्णय होता है.'
'ऐसा क्या?'
'तुम फिर मज़ाक करने पर उतारू हो गए?' 
'नहीं, मैं सीरियस हूँ. लेकिन आज तुमसे एक बात कह रहा हूँ, इसे गौर से सुनो, मेरी तुमसे शादी नहीं हो सकती.'
'क्यों? क्यों नहीं हो सकती?'
'क्योंकि मेरे घर के लोग इस सम्बन्ध के लिए राजी नहीं होंगे.'
'यानी कायस्थ-ब्राह्मण वाला लफड़ा आएगा?'
'हूँ.'
'तो?'
'मैं अपने घरवालों की इच्छा के विरुद्ध नहीं जा सकता.' 
'और मेरे विरोध में जा सकते हो?'
'तुम्हें समझा सकता हूँ, अपने मम्मी-पापा को नहीं.'
'तो, मुझे समझाओ.'
'यहाँ केन्टीन में? यहाँ नहीं, किसी और दिन, किसी और जगह में अपन बात करेंगे.' अनुप्रास ने धीरे से कहा.
'ठीक है.' नीता ने और धीरे से कहा. 

दो विपरीतलिंगी युवा जब एक-दूसरे से पहली बार मिलते हैं तो अत्यंत संक्षिप्त वार्तालाप शुरू होता है, फिर धीरे-धीरे आपसी समझ विकसित होती है तब बातचीत का समय और दायरा बढ़ते जाता है. आम तौर पर पढ़ाई पर बातें होती हैं लेकिन अन्य विषय भी अपनी जगह बनाने लगते हैं. दोनों को आपस में बातें करना अच्छा लगता है. यह 'अच्छा लगता है' कैसा मोड़ लेगा यह अलग-अलग युग्मों में अलग-अलग ढंग से निर्धारित होता है. कुछ 'अपने काम से मतलब' होता है, कुछ केवल बतरस का आनंद लेते हैं, तो कुछ गहरी दोस्ती में तब्दील हो जाते हैं. जब दोस्ती गहरी हो जाती है तब बिना मिले, बिना बात किए दिल नहीं मानता. इसी दौरान युवावस्था में होने वाले शारीरिक रसायनिक परिवर्तन अपना कार्य आरम्भ कर देते हैं. आपस में सामीप्य का भाव जागृत होने लगता है. समस्या यह होती है कि पहल कौन करे, कैसे करें? 

अनुप्रास और नीता का विवाह न हो सकने की अधूरी बात कभी पूरी न हो सकी लेकिन वह अधूरी बात एक तरह से उस दिन पूरी हो चुकी थी. यह स्पष्ट हो गया था कि जीवन भर के लिए दोनों का साथ नहीं बनने की कोई सम्भावना नहीं है. इस बात से दोनों के मध्य तनाव उत्पन्न हो सकता था लेकिन आपसी समझदारी ने इस बात को होने न दिया. पति-पत्नी न बन सके तो कोई बात नहीं, दोस्त बन कर तो रह सकते हैं, जब तक समय हाथ में है. दोस्ती परवान चढ़ती रही और निकटता बढ़ती रही. एक दिन अनुप्रास नीता के घर गया, उस दिन नीता की मम्मी बाज़ार गयी हुई थी. घर में नीता अकेली थी. अनुप्रास ने कहा, 'मैं चलता हूँ, फिर आऊंगा.'
'बैठो न, मैं तो हूँ घर में.' नीता ने अनुप्रास का हाथ पकड़ कर उसे रोका. उसके मजबूत आग्रह के कारण अनुप्रास को रुकना पड़ा. वह सोफे पर बैठ गया, सामने के सोफे पर नीता बैठ गयी. अनायास नीता का दुपट्टा उसके सीने से खिसक कर उसकी गोद में आ गया. अनुप्रास ने जो देखा, वह विचलित हुआ. उसने प्रश्नवाचक नज़रों से नीता को देखा. नीता ने खामोश निगाहों से उसे देखा किन्तु अपना दुपट्टा व्यवस्थित नहीं किया. एक दूसरे के मध्य मौन संभाषण सा हुआ, कुछ देर तक अजीब सी स्थिति बनी रही. अचानक नीता अनुप्रास की गोद में आकर बैठ गयी और उसके बाद दोनों एक दूसरे की गर्म बाहों में थे. 

= = = = = = =

कामता प्रसाद ने वकालत का तरीका बदल लिया. अब वे देख-समझ कर मामले लेने लगे फलस्वरूप उनकी प्रैक्टिस कम हो गयी. जीवन भर उनका साबका हत्यारों से पड़ा था, वे ही उनके पास मदद के लिए आते थे, अब भी आते थे लेकिन निराश और नाराज़ होकर वापस लौट जाते थे. अब वे केवल निरपराध व्यक्ति की पैरवी के लिए अदालत के सामने खड़े होते थे. वकील साहब दोहरे नुक्सान में चल रहे थे, एक, तो निरपराध आसामी अपराधी की तुलना में फीस कम देते थे और दो, वे खुद ही मामले कम लेते थे, वापस अधिक करते थे लेकिन लेकिन वे संतुष्ट थे. वे घर-गृहस्थी पर अधिक ध्यान देते थे, अब उनके पास अपनी पत्नी और पुत्र से बात करने का पर्याप्त समय रहता है. एक शाम वकील साहब अपने चैंबर में बैठे कोई कागज़ पलट रहे थे तब ही अनुप्रास का आना हुआ. 
'कहो, क्या हाल है तुम्हारी पढ़ाई का?' कामता प्रसाद ने पूछा.
'ठीक चल रही है.' अनुप्रास ने उत्तर दिया.
'यह तुम्हारा फायनल इयर है न?'
'जी.'
'अब आगे क्या करना चाहते हो?'
'आप बताइये क्या करूं? एल एल.बी. कर लूँ क्या?'
'जैसा तुम ठीक समझो.'
'खैर, अभी तो समय है, देखता हूँ, कैसा मन बनता है.'
'और, सिनेमा कुछ कम हुआ या बदस्तूर चालू है?'
'कम हो गया है पापा.' अनुप्रास ने बताया लेकिन यह छुपा ले गया कि उसकी ज़िन्दगी में सिनेमा में होने वाली घटनाएं चल रही हैं, भला अपने पापा से कैसे बताता?

इतने में एक मुवक्किल आया, आकर उसने कामता प्रसाद के पैर छुए. कामता प्रसाद ने उसके कंधे में हाथ रखा और उसे पहचानने की कोशिश की, 'तुमको देखा है कहीं.'
'मैं मोहित, बिरकोना का हूँ, मोहितराम यादव.'
'हाँ, नाम तो जाना-पहचाना है.'
'वकील साहब, आपने मुझे एक मर्डर केस में बचाया था, याद कीजिए.'
'हूँ, अब कैसे आए? फिर कोई मर्डर हो गया क्या तुमसे?'
'नहीं साहब, पर मेरे लड़के को पुलिस ने मर्डर के केस में नामजद कर दिया है.'
'पर मैं तो मर्डर केस अब नहीं लेता, कोई दूसरा वकील कर लो.'
'नहीं हुजूर, आप ही मेरे लड़के का केस लड़ेंगे.'
'लेकिन मैं मजबूर हूँ, क्या करूं?'
'मेरा बेटा निरपराध है, वह उसमे शामिल नहीं था.'
'पक्का?'
'जी, पक्का.'
'कहाँ है तुम्हारा लड़का?'
'जेल में.'
'ठीक है, तुम वकालतनामे में अपना दस्तखत कर दो, कल मैं जेल में जाकर उससे मिलता हूँ, फिर बताऊंगा.' कामता प्रसाद बोले. मोहित ने फिर से वकील साहब के पैर छुए और चला गया. 

अगले दिन कामता प्रसाद जेल पहुंचे, मोहित के लड़के से मिले, उससे बातचीत की. शुरुआत में तो ऐसा लगा कि लड़का निर्दोष है लेकिन वकील साहब को उसकी बातों में शक होना शुरू हो गया. उन्होंने घुमा-फिराकर प्रश्न करना शुरू किया तब एक जगह आकर वह फंस गया और उसने स्वीकार कर लिया कि वह हत्या में नहीं लेकिन हत्या की योजना में शामिल था. कामता प्रसाद वापस आ गए. 
शाम को मोहित फिर आया, वकील साहब ने अपनी बातचीत का निष्कर्ष उसे बताया और केस लेने से साफ़ इन्कार कर दिया. मोहित ने उनके पैर पकड़ लिए, 'वकील साहब, मेरे बेटे को बचा लीजिए, मैं और कहीं नहीं जाउंगा, आप ही उसे बचाएंगे.'
'नहीं, मैं तुम्हारे बेटे की पैरवी नहीं करूंगा.'
'आप जितनी फीस कहेंगे, मैं दूंगा पर मेरे बेटे को बचाइए.'
'चाहे जितना पैसा दो, मैं नहीं करूँगा.' 
'उसने मर्डर नहीं किया है, उसको तो बचाना चाहिए आपको.'
'पर वह मर्डर की योजना में शामिल तो था.'
'उससे गलती हो गयी साहब, माफ़ करो उसे.'
'मैं माफ़ करने वाला कौन होता हूँ? अदालत सोचेगी.'
'आप अदालत से कहेंगे तो आपकी बात का असर होगा, आपकी बात अलग है.'
'तुम चाहे जितना कहो, मैं इस मामले की पैरवी नहीं करूंगा, नहीं मतलब नहीं'. कामता प्रसाद ने साफ़ जवाब दिया, मोहित निराश होकर चला गया. 

मोहित के जाने के बाद कामता प्रसाद को इस बात की उन्हें ख़ुशी थी कि वे अपने द्वारा लिए गए निर्णय पर कायम रहे. पैसा किसे नहीं ललचाता लेकिन कामता प्रसाद ने उसे ठुकरा कर अपने न्यायप्रिय वकील होने का संकल्प दोहराया. 

* * * * * * * 

नीता अब बड़ी हो गयी है, शादी लायक. उसके मम्मी-पापा चाहते हैं कि कोई अच्छा लड़का मिल जाए तो उसके हाथ पीले कर दें. एक जगह बात चलाई लेकिन जब नीता को मालूम पड़ा तो उसने शादी करने से साफ़ इंकार कर दिया, कारण कुछ नहीं, बस, 'शादी नहीं करूंगी.'
नीता की मम्मी ने सोचा कि अनुप्रास की मदद ली जाए, 'नीता तो शादी के लिए मना कर रही है, कारण कुछ नहीं बताती, क्या करें?'
'तो, मैं क्या कर सकता हूँ?'
'तुम पूछो उससे, क्या है उसके मन में?' 
'ठीक है, बात करता हूँ.' अनुप्रास ने कहा. 

'क्यों शादी करने का इरादा नहीं है क्या?' अनुप्रास ने नीता से पूछा.'
'है.' नीता ने उत्तर दिया.
'पर मम्मी तो बोल रही थी कि तुम मना कर रही हो.'
'सही है.'
'सही है? तुम्हारी बात मेरी समझ में नहीं आ रही है.'
'इसमें न समझने की क्या बात है? जहाँ वो मेरी शादी कर रहे हैं, वहां मैं नहीं करना चाहती.'
'तो कहाँ करना चाहती हो, कोई लड़का देख रखा है क्या?'
'हाँ.'
'कौन है वह?'
'तुम हो.'
'मैं?'
'हाँ, तुम.'
'मैं, मैं तो तुम्हे पहले समझा चुका हूँ कि मेरा ब्याह तुमसे नहीं हो सकता.'
'लेकिन मैं तुम्हारे बिना रह नहीं सकती, जी नहीं सकती.'
'यह तुम्हारा भ्रम है. यह इस उम्र की कमजोरी है कि जिससे मन मिल जाता है उसके बिना रहा नहीं जाता.'
'तुम मुझे मनोविज्ञान मत समझाओ.'
'तो कैसे समझाऊं कि तुम्हें मेरे बिना जीना होगा. हमारे प्यार को इसी मोड़ पर छोड़ना होगा. इसे जीवन भर का साथ नहीं बनाया जा सकता.'
'क्यों नहीं बनाया जा सकता? तुम मेरे लिए अपने घर में लड़ नहीं सकते?'
'नहीं.'
'क्यों नहीं?'
'नहीं मतलब नहीं. यह बात मैंने पहले ही स्पष्ट कर दी थी.'
'एक बात बताओ, तुम मेरे बिना रह सकते हो क्या?' नीता ने भरे गले से पूछा. अनुप्रास रो पड़ा. दोनों बहुत देर तक लिपट कर रोते रहे. 
आंसू थमे तब अनुप्रास ने कहा, 'तुम ठीक कह रही हो, तुम्हारे बिना मैं क्या करूँगा लेकिन मैं क्या करूं? मजबूर हूँ.'
'ऐसी कैसी मजबूरी?'
'मजबूरी है. मैं बचपन से ही पापा के सामने खड़े होने से डरता रहा हूँ, बोलना तो दूर की बात है. मेरी हिम्मत नहीं है कि मैं उनसे अपनी शादी की बात करूं, वह भी तुम्हारे साथ. मेरे प्राण ले लेंगे वे.'
'तो अपन भाग चलते हैं.'
'मैं उनकी अकेली संतान हूँ, भाग जाऊं उन्हें छोड़कर? अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़कर?' 
'फिर कैसा होगा?'
'जो मैं समझा रहा हूँ, तुम समझो.'
'क्या समझूँ?'
'यही कि तुम अपने मम्मी-पापा के द्वारा तय किए रिश्ते को स्वीकार कर लो.'
'यह नहीं हो सकता.'
'हो सकता है. देखो, तुम मुझसे प्यार करती हो न?'
'हूँ.'
'तो मेरा कहा मानो, इस प्यार को प्यार बने रहने दो. हम जब तक पति-पत्नी के रिश्ते में नहीं बंधे हैं, तब ही तक प्यार है, तुमको मालून है, शादी के बाद प्यार भसकने लगता है?'
'क्या मतलब? क्या शादी के बाद प्यार कम हो जाता है?'
'नहीं, वह पारिवारिक जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाता है. प्यार कम हो जाता है और आपसी तालमेल का रूप ले लेता है. तुम अगर चाहती हो कि हमारा प्यार आजीवन रहे तो तुम मुझसे शादी करने का इरादा छोड़ दो.'
'जब मेरी शादी कहीं और हो जाएगी तो तुमसे दूर रह कर यह प्यार जीवन भर कैसे चलेगा?'
'चलेगा, जरूर चलेगा. ये हमारी बातें, ये सुहानी मुलाकातें, ये गर्मजोशी की यादें जीवन भर हमारे साथ चलेंगी. इन्हें रिश्ते से मत जोड़ो, यूँ ही स्वतंत्र रहने दो जैसे पक्षी खुले आकाश में उड़ते हैं, बिना किसी बंधन के.'
'इस तरह से समझाने में तुम्हें शर्म नहीं आ रही है?'
'मैं तुम्हें जिन्दगी की असलियत बता रहा हूँ. ठन्डे दिमाग से मेरी बात को समझो और अपने दिमाग से उतार कर मुझे अपने दिल में रखो, इस तरह हमेशा मुझे याद रख सकोगी.' अनुप्रास ने समझाया. नीता चुप हो गयी और उठ कर वहां से चली गयी.

नीता का विवाह तय हो गया, विवाह की तारीख तय हो गयी. अनुप्रास घर आया तो नीता ने उससे कहा, 'तुम्हारा कहना मैंने मान लिया, अब एक कहना मेरा तुम मान लो.'
'कहो.' अनुप्रास ने दबी आवाज़ में कहा'
'विवाह मंडप में पूरे समय मेरे सामने बैठे रहना. तुम सामने रहोगे तो मुझे शक्ति मिलती रहेगी.' 
'ठीक है, ऐसा ही होगा.' अनुप्रास ने आश्वासन दिया.

मंडप सजा. वैवाहिक कार्यक्रम हुए. अनुप्रास पूरे समय नीता के सामने बैठा रहा. अनुष्ठान संपन्न होने के बाद दूल्हा-दुल्हन मंडप से उठ गए. दुल्हन की आँखें अनुप्रास को खोज रही थी. अनुप्रास एक कोने में चुपचाप खड़ा था, दिख गया. वह जाकर अनुप्रास से लिपट गयी और उसकी आँखों से आंसुओं की धार बह चली. दुल्हन का काजल बह निकला और अनुप्रास की सफ़ेद कमीज में फ़ैल गया और साथ में माथे का सिंदूर भी. 

* * * * * * * *