Friday, 5 March 2021

तेरी मेरी कहानी है : पांच : अपनी राम कहानी :

अपनी राम कहानी :


दस वर्ष की उम्र में दुकान में बैठना शुरू किया था, जी हाँ, दस वर्ष की उम्र से. व्यापारियों के यहाँ यही रिवाज़ रहा है कि छोटी उम्र में ही दुकान में बैठाओ ताकि उसे दुकानदारी का प्रशिक्षण बचपन से ही मिलना शुरू हो जाए. वही मेरे साथ हुआ. 

बचपन था लेकिन बचपना दूर होने लगा. सुबह पांच बजे उठकर, तैयार होकर दूकान खोलने जाना पड़ता था. गर्मी हो, बारिश हो या ठण्ड, हर मौसम में बब्बा जी (मेरे दादा जी) मुझे सुबह-सुबह आवाज़ देते, 'लड़के ओ लड़के.' अगर नहीं जागता तो अपने गमछे से मेरे चेहरे पर हलके से वार करते ताकि मैं बिस्तर छोड़ दूं. कई बार नींद इतनी अधिक होती थी कि मैं संडास में ही सो जाता था, वे समझ जाते थे, बाहर से आवाज़ लगाते, 'लड़के, सो गया क्या?' उस गंधाते खुले संडास में भी उकडू बैठे-बैठे सो जाना कमाल की बात थी. बाहर निकल कर दातुन करता, कपड़े पहन कर दूकान की चाबी लेकर घर से निकल पड़ता. 

दुकान पहुँच कर पल्ले खोलना, उसके बाद नौकरों (कार्य सहायकों) को आसपास जगाना, भट्ठी जलवाना, जलेबी का शीरा भट्ठी पर चढ़ाना, जलेबी की मैदानी का घोल तैयार करना, कारीगर के आने का इंतज़ार करना. कारीगर जिसे हम लोग उस्ताद कहते थे, के आने बाद जलेबी बनाने के लिए तई में देशी घी डालकर कपड़े की लतनी में मैदे का बना हुआ घोल डालकर उसे गर्म घी में हाथ से घुमा कर फंदे डालना और तली हुई जलेबी को शीरे में डुबा कर कुछ देर रखना और फिर झारे से परत में निकालना. जलेबी तैयार. इस बीच रात को मसाला भरे समोसा को घी गरम करके तलना मेरा काम था. इधर जलेबी और समोसा तैयार हुआ, उधर ग्राहकों का आगमन शुरू हो जाता. डंडी वाली तराजू से तौल कर एक छटांक या आधा पाव जलेबी मोहलाइन के पत्तों से बने दोने पर रख कर देता और समोसा भी. ग्राहकों को नल से पानी निकाल कर देना, ग्राहक के जाने के बाद उसके जूठे दोने को उठाकर नाली में फेंकना. यह सब नौ बजे तक चलता, उसके बाद एक दोने में कुछ जलेबी और समोसा निकाल कर खाने की इजाज़त मिलती. इस तरह दुकान की सुबह की ड्यूटी पूरी हो जाती. 

ड्यूटी पूरी होने पर बब्बा जी पैसे के डब्बे से एक पैसा निकाल कर मुझे देते थे जो स्कूल में मुर्रा खाने के काम आता था. कभी अम्मा अधन्नी दे देती थी तो मुर्रा के साथ चना और मीठी पपड़ी भी खा लेता था लेकिन उसमें भी एक पेंच था, मेरा एक सहपाठी था, मातादीन सोनी, बहुत बदमाश लड़का था, मुझसे पैसे छीन लेता था और मैं जोजवा जैसा उसे देखता रह जाता था, गुस्सा तो खूब आता था लेकिन उससे लड़ने की हिम्मत नहीं होती थी. अर्थात आधी छुट्टी में मेरा चना-मुर्रा खाना मातादीन की दुष्टदृष्टि पर निर्भर रहता था.  

शाम को छः बजे फिर से ड्यूटी लगती. उस समय कांसे के बड़े से कटोरे में रबड़ी तैयार होकर आती थी. बिलासपुर में अकेली दूकान पेंड्रावाले की थी जहाँ रबड़ी बनती थी. एक बड़े से कढ़ाह में दूध औंटने के लिए रख दिया जाता था, दूध उबलता रहता और उसमें मलाई पड़ती रहती. कांटेदार छुरी से मलाई को उतार कर कढ़ाह की खाली जगह में चिपकाते जाते हैं. जब दूध गाढ़ा और लाल हो जाता था तो उसे भट्ठी से उतार कर ठंडा होने के लिए रख देते थे. दो-तीन घंटे बाद चाकू से सूखी मलाई को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर गाढ़े दूध में मिलाने के बाद बूरा शक्कर और पिसी हुई इलायची डाली जाती थी, रबड़ी तैयार. उस रबड़ी का सोंधा स्वाद आज भी याद है, अब तो उस रबड़ी की कल्पना भर की जा सकती है. 

रबड़ी के अलावा पेड़ा, कलाकंद, बूंदी और बेसन के लड्डू, मैसूर पाक मुख्य मिठाई थी जो हमारी दूकान में बनती  थी. नमकीन में देशी घी से बना सेव और चने की दाल. इसके अतिरिक्त आगरा का पेठा, मारवाड़ी रिलीफ सोसायटी कलकत्ता का पापड़ और देशी घी भी बेचा जाता था. हमारे यहाँ की पूरी-सब्जी भी बहुत लोकप्रिय थी.

शाम के समय बब्बा जी गद्दी पर नहीं बैठते थे, बाहर कुर्सी लगाकर बैठते थे. उनके पास नियमित रूप से उनके कुछ साथी बैठने आते थे, मास्टर साहब, चौधरी राम और वैद्यराज जी रोजाना वाले थे, उनके अतिरिक्त कुछ साहित्यकार भी आया करते थे. दुनिया-जहान की चर्चा होती थी, सबके लिए अलग-अलग चाय बनती थी, ढाई-तीन घंटे की बैठक के पश्चात महफ़िल अगली शाम तक के लिए मुल्तवी हो जाती थी. बाकी लोग ठीक थे लेकिन मास्टर साहब रोज शिकायत करते थे कि चाय ठंडी मिली उनको. चूँकि चाय मैं बनाता था इसलिए बब्बा जी मुझ पर गुस्सा होते थे. एक दिन की बात है, मैंने मास्टर साहब की चाय बनाते वक्त कप को भट्ठी पर मस्त गर्म कर दिया और उसमें चाय भर कर उन्हें दे दिया. मास्टर साहब ने जैसे ही कप में मुंह लगाया, वे चिल्लाए, 'अरे बाप रे.' बब्बा जी ने पूछा, 'क्या हो गया मास्टर साहब?' मास्टर साहब बोले, 'आज चाय बहुत गर्म है.' उस दिन के बाद से मास्टर साहब ने फिर कभी चाय के ठंडी होने की शिकायत नहीं की. 

ये सारी बातें १९५७-५८-५९ की हैं. १९५९ में बब्बा जी के गले में कैंसर हो गया, उन्होंने दुकान आना बंद कर दिया, घर में ही रहते थे. दुकान की ज़िम्मेदारी मेरे बड़े भैया रूपनारायण के जिम्मे हो गयी, मैं उनका सहायक. 

बब्बा जी के गले में कैंसर ने उन्हें तीन साल तक बहुत सताया. टाटा मेमोरियल कैंसर हॉस्पिटल बम्बई तीन बार गए, रेडियो थेरेपी कराई, होम्योपेथिक और आयुर्वेदिक उपचार कराया लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ. १ फरवरी १९६२ की सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली. अपने संघर्ष शील जीवन में उन्होंने सज्जनता का दामन कभी नहीं छोड़ा. ३० वर्ष की आयु में विधुर होने के बाद दूसरा विवाह इसलिए नहीं किया कि उनके दोनों बच्चों के साथ सौतेला व्यवहार न हो. रामचरित मानस उन्हें जैसे कंठस्थ थी. हर समस्या का निदान उन्हें इसकी चौपाइयों में मिल जाता था. कोई भी संकटग्रस्त व्यक्ति उनके पास मदद के लिए आता था, वह खाली हाथ वापस नहीं गया. भगवान की व्यवस्था में पूर्ण विश्वास रखने वाले उस सज्जन मनुष्य को जितना कष्ट मृत्युपूर्व सहना पड़ा, इस बात ने भगवान के होने या न होने पर मेरे किशोरमन में स्थायी प्रश्न स्थापित कर दिया. 

बड़े भैया नये जमाने के व्यक्ति थे, उन्होंने दुकान को आधुनिक रूप देना शुरू किया. बिना साइन बोर्ड के प्रसिद्ध 'पेंड्रावाला' को बोर्ड लगाकर आगे बढ़ाया. गद्दी को पक्का किया गया, मिठाई व नमकीन को रखने के लिए नयी आलमारियाँ बनवाई, ग्राहकों को बैठने के लिए नये कुर्सी-टेबल बनवाए. छेने से बनी मिठाइयों को सुरक्षित रखने के लिए एक रेफ्रिजरेटर खरीदा गया, इस प्रकार उन मिठाइयों की वेरायटी बढ़ गयी. दुकान में ग्राहकों की भीड़ बढ़ने लगी. मेरी ड्यूटी सुबह पांच से साढ़े दस बजे और शाम को छः बजे से रात को नौ बजे तक लगने लगी. हम दोनों भाइयों ने दुकान को बढ़ाने के लिए जी-तोड़ मेहनत की, उसके सार्थक परिणाम सामने आये.

उन दिनों घरों में चटनी पीसने के लिए सिल-लोढ़ा हुआ करता था जो पत्थर का होता था. आम तौर पर कच्चे आम को पोदीना और नमक-मसाले के साथ पीस कर स्वादिष्ट चटनी तैयार की जाती थी. उसी प्रकार पके आम का पना बना करता था, दूध और शक्कर मिलाकर जिसे हाथों की उँगलियों से मिला लिया जाता था या मथानी चलाकर घोला जाता था. सन १९६५ में बड़े भैया बम्बई गये और वहां से एक जर्मनी से आयातित एक मशीन लेकर आये जिसे आज हम मिक्सी मशीन या मिक्सर कहते हैं. शहर में पहली बार आयी इस मशीन को नागरिकों ने कौतुहल के साथ देखा. इस मशीन से पके आम का ऐसा पेय बनाकर ग्राहकों के समक्ष प्रस्तुत किया गया जिसका नाम रखा गया, 'मेंगोला'.

मेंगोला तैयार करने के लिए बैगनपल्ली आम सबसे अच्छा होता है क्योंकि उसमें गूदा अधिक होता है, वैसे, सिन्धूरा, लंगड़ा, दशेरी, हापुस से भी अत्यंत स्वादिष्ट बनता है लेकिन इनमें गूदा कम होता है. सबसे पहले आम को काटकर चम्मच की मदद से उसका गूदा एक बर्तन में निकाल लिया जाए. लगभग आधा किलो आम का गूदा मशीन में डालकर उसमें २०० मिलीलिटर दूध, २५० ग्राम शक्कर और लगभग आधा किलो बर्फ का चूरा भी डालकर मशीन को चालू कर दें और बर्फ और शक्कर के पूरी तरह से घुलने तक चलने दें. जाएं. इसमें ध्यान देने वाली बात यह होती है कि शक्कर की मात्रा आम के खट्टे होने पर बढ़ानी होगी और मीठे होने पर ज़रा घटानी होगी. लीजिए, स्वादिष्ट मेंगोला तैयार.  

वैसे तो दिन भर मेंगोला पीने वाले ग्राहक आते रहते थे लेकिन शाम छः बजे से रात नौ बजे तक ग्राहकों का जमघट लगा रहता था. मेंगोला बनाते-बनाते हाथों की उंगलियाँ थक जाती थी और खड़े-खड़े पैरों की पिंडलियों में दर्द होने लगता था. मेंगोला पीने वाले ग्राहक मीठा और नमकीन भी खरीदते थे, इस प्रकार हमारी दूकानदारी और बेहतर हो गयी. 

 सन १९६० के आसपास तक हिन्दुओं के घरों में त्यौहारों के समय जोरदार तैयारियां होती थी, खास तौर से दिवाली के समय. घरों की साफ़-सफाई के अलावा बड़ी मात्रा में पकवान बनाए जाते थे. त्यौहार के दिन दिन भर चूल्हे या सिगड़ी जलती रहती, औरतें उसकी आंच में तपती रहती और किस्म-किस्म की मिठाई और नमकीन बनाए जाते थे. गुलाब जामुन, खोवा-बेसन की बर्फी, बालूशाही, मीठी सलोनी, नमकीन सेव, सलोनी और खस्ता. वह युग पुरानी कामकाजी महिलाओं का था जिन्होंने तकलीफ सह कर भी मज़े के साथ यह दायित्व निभाया. उनके हाथ से बने उन स्वादिष्ट पकवान का स्वाद अब कहाँ? उसके बाद आयी बहुएं पढ़ी-लिखी थी लेकिन गृह कार्य में उतनी निपुण नहीं थी जितनी उनकी सासें. उनके लिए त्यौहार के दिन दिनभर आग से सिंकना असहनीय था इसलिए बाजार से मिठाई लाने का आग्रह बढ़ना शुरू हुआ परन्तु सासों ने मोर्चा संभाले रखा. धीरे-धीरे उनका धीरज भी टूटने लगा और बाजार से मिठाई आने की शुरुआत होने लगी. 

१९६५ में बड़े भैया ने कलकत्ता से ग्राहकों को दीवाली में गिफ्ट देने के लिए टिन से बने सुनहरे पीले रंग के गोल डब्बे मंगवाए जिनके ढक्कन में अंग्रेजी में लिखा हुआ था, PENDRAWALA. इन डब्बों के आकर्षण में ग्राहक खिंचे चले आए और दिवाली की मिठाई की बिक्री में अभूतपूर्व वृद्धि हुई. इस तरह घर में महिलाओं पर काम का बोझ कम हुआ और हमारा काम बढ़ने लगा.

सन १९६८ में मैंने एल एल. बी. कर लिया और मेरा मन अदालत की ओर खिंचने लगा. मैंने जबलपुर बार काउंसिल में वकालत करने का लायसेंस माँगा तो उन्होंने मना कर दिया, कारण बताया, 'आपकी उम्र अभी २१ वर्ष नहीं हुई है.' छः माह बाद जब मुझे अनुमति मिल गयी तो मैंने अदालती वेशभूषा तैयार करवाई और अपनी सायकल से कचहरी जाने लगा. ला कालेज में न्यायशास्त्र पढ़ाने वाले अमर प्रसाद रे का जूनियर बन कर वहां का काम समझने लगा.

कचहरी के बार रूम, जहाँ वकील साहेबान बैठा करते थे, में पहले दिन जब मैंने प्रवेश किया तो मेरा मन ख़ुशी से सराबोर हो गया. सभी दरवाजों और खिडकियों में खस की टट्टियाँ लगी हुई थी जिसमें एक व्यक्ति लगातार पानी सींच रहा था. उपस्थित वकील गप-शप और हंसी-मज़ाक में लगे हुए थे. अचानक कोई मुवक्किल आता, कहता, 'पुकार हो गयी है' तो वकील साहब आधी चर्चा छोड़कर उसके साथ चले जाते. उस एलीट क्लास के बीच जाकर बैठना मुझे अच्छा लगा, मैं मिठाई दुकान में बैठता जरूर था लेकिन वहां मेरे मन में 'कमतर' होने का भाव बना रहता था, वहां पढ़े-लिखे सम्माननीय लोगों के साथ उठने-बैठने का उच्च-भाव मुझे भला लगा. 

सबसे पहले 'इन्डियन पीनल कोड', इन्डियन प्रोसीजर कोड' और 'सिविल ला' पढ़ना शुरू किया. वे सारी किताबें अंग्रेजी में थी और मेरी दोस्ती अंग्रेजी से नहीं थी इसलिए कुछ समझ में आता और बहुत कुछ समझ में नहीं आता था परन्तु मैं उन पुस्तकों में रमा रहता था. अदालतों में चल रहे मुकदमों को सुनाने के लिए वहां जाकर बैठ जाता था ताकि वकीलों द्वारा किए जा रहे परीक्षण, प्रति-परीक्षण व बहस के तौर तरीके समझ सकूं.    

मेरी रूचि फौजदारी मुकदमों में अधिक थी इसलिए उन दिनों के मशहूर फौजदारी वकील, मणिशंकरधर शर्मा, हनुमान प्रसाद पाण्डेय, एल.एन. चित्तावर, जिस अदालत में दिख जाते, मैं चुपचाप पीछे की बेंच में बैठकर बड़े ध्यान से उन्हें सुनता और उनके मैनेरिज्म पर गौर करता. उस समय अदालत में सभी जज अच्छे थे, एक को छोड़कर, पारस चन्द्र जैन, निहायत बदतमीज जज थे वे. हर समय उनके सर में गुस्सा सवार रहता था. सामान्यजन को तो कुत्ते की तरह दुत्कार देते थे और वकीलों को ऐसी डांट पिलाते थे कि वकील सहम जाते थे लेकिन चुपचाप सह लेते थे क्योंकि उसी अदालत में उनका रोज का काम पड़ता था. डांट खाकर भी 'यस सर, नो सर' कहते सर झुकाए अपने मुवक्किल की पैरवी करते. 

उस समय के जज में मुझे दो जज की याद आ रही है, श्यामसुंदर सराफ और सुरेन्द्र कुमार तिवारी. ये दोनों नए-नए नियुक्त जज थे, निहायत भले और शालीन व्यक्ति थे. श्यामसुंदर सराफ कालांतर में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति बनकर अवकाशप्राप्त किये और सुरेन्द्र कुमार तिवारी जिला एवं सत्र न्यायाधीश बने. इन दोनों जज की कार्यशैली, वादी-प्रतिवादी, गवाहों, पुलिस तथा वकीलों के साथ बेहद भलमनसाहत से पेश आते थे. काश, मैं ऐसी अच्छी बातें पारस चन्द्र जैन के लिए लिख पाता!

मेरे सीनियर अमर प्रसाद रे आमतौर पर दीवानी मामले लिया करते थे, सीधे और सरल होने के कारण उनकी प्रैक्टिस कमजोर थी इस वज़ह से उनसे कानूनी बातें मैंने कम सीखी, सज्जनता अधिक सीखी. उनका सदैव मुस्कुराता हुआ चेहरा मुझे अभी भी याद आता है. जिला न्यायालय के अतिरिक्त कलेक्ट्रेट और तहसील कार्यालयों के भी चक्कर रोज लगते थे क्योंकि उनके पास भूमि सम्बन्धी विवाद के मामले भी थे. इन दोनों जगहों में जाना बहुत अखरता था क्योंकि इन अदालतों में मामले आगे बढ़ते ही न थे, बस, पेशी और पेशी. दूर-सुदूर से आये ग्रामवासियों को निरर्थक परेशान होते देखना मुझे बहुत खराब लगता था. मैंने अपने मन की बात रे साहब से कही तो वे बोले, 'यही तो हमारे सिस्टम की खामी है, क्या करोगे, सब चलता है?' इस उत्तर से भी उनके चेहरे की मुस्कान ओझल नहीं हुई.

नए वकीलों के पास मामले बड़ी मुश्किल से आते हैं. एक तो उसका नाम नहीं होता, दूसरा उसका काम भी नहीं दिखता. छोटे से छोटे मामले भी नामी वकील के पास जाते हैं. मुझे ऐसा लगा कि नामी वकील बनने के लिए कम से कम दस-बारह साल इस क्षेत्र में खपाने पड़ेंगे, मैंने स्वयं को इसके लिए मानसिक रूप से तैयार करना शुरू कर दिया. शुरूआती वकालत में अपराधी को जमानत दिलाने के लिए कचहरी में कुछ सक्रिय दलाल मेरे पास आये और कहा, 'वकील साहब जमानत की एप्लीकेशन लगा दीजिए, मुवक्किल से एक सौ रूपए फीस तय हुई है, आधा आपका आधा मेरा.' जमानत करवाने वाला काम सरल होता होता है. एक निश्चित प्रारूप होता है जिसमें अदालत का नाम, वादी का नाम और पता, केस का ज़िक्र, अदालत से जमानत देने हेतु निवेदन, आज की तारीख और वकील के हस्ताक्षर. जमानत मिले या न मिले, फीस पक्की होती है क्योंकि आवेदन दायर करने के पूर्व ही वसूल कर ली जाती है. उस जमाने में पचास रूपए बहुत होते थे, खास तौर से नए वकील के लिए, जिसने अभी तक वकालत के पेशे में 'बोहनी' तक न की हो लेकिन मैं उन्हें हाथ जोड़कर मना कर देता. मैं सोचता था कि क्या फायदा हुआ, क़ानून की पढ़ाई करने से? इससे अच्छा तो बाहर बैठकर दलाली करता. 

अदालत में प्रवेश के लगभग एक माह बाद एक फौजदारी मुकदमा मेरे पास आया, अपराध क्या था यह तो याद नहीं रहा, लेकिन बिलासपुर से ५0 किलोमीटर दूर स्थित मुंगेली से आया था. मैं ख़ुशी-ख़ुशी उस पुलिस नोटिस को दिखाने के लिए सीनियर के पास गया, सीनियर ने उसे अपने पास रख लिया, मैं आश्चर्यचकित होकर उन्हें देखता रह गया, कुछ कह न सका. यह बात और है कि एक सप्ताह बाद वह मुवक्किल उस नोटिस को वापस ले गया. कारण, वही, नया वकील होने की समस्या. 

सीनियर के साथ मैं रोज लगा रहता था, पेशी की तारीख लेने में, वादी-प्रतिवादी से लिए जा रहे बयान सुनने में, मुवक्किलों से बातचीत सुनने में, मतलब पूरी तन्मयता के साथ उनके पीछे लगा रहता था. एक दिन मैंने सीनियर से कहा, 'सर, प्रतिवादी का बयान मैं ले लेता हूँ.' तो सीनियर ने कहा, 'नहीं, तुमसे नहीं बनेगा, यदि मामला बिगड़ गया तो मुश्किल हो जाएगी.' वहीं पर मेरे दो सहपाठी न केवल वादी-प्रतिवादी के बयान ले रहे थे, बल्कि मामले की बहस भी कर रहे थे. कारण यह था कि उनके सीनियर उनके पिता या ससुर थे. अब मेरे पिता तो वकील थे नहीं, मेरी शादी नहीं हुई थी इसलिए ससुर भी नहीं थे, तो मुझे आगे बढ़ने का मौक़ा कौन देता?  

इसी प्रकार छः माह बीत गए, न काम मिला, न एक पैसा मिला, फिर भी मेरे उत्साह में कोई कमी न आयी. पुरानी कहावत है, 'खाया पिया कुछ नहीं, गिलास फोड़ा बारह आना'. मैं अच्छी तरह से जानता था कि यह मेरे समय का विनियोजन है. मेरी पर्सनालिटी अच्छी थी, वाक्चातुर्य भी था, तर्कशक्ति भी ठीक-ठाक थी, एक दिन ऐसा आएगा जब मेरा नाम होगा, मेरी वकालत चलेगी क्योंकि मुझमें सीखने का जुनून था.

मेरा बचपन का एक साथी था, गिरीश बाजपेयी. कक्षा पहली से साथ बना था, एल एल.बी. तक चला. उसके पिता पुलिस प्रासीक्यूटर थे. गिरीश का प्रति दिन मेरी दुकान में आना होता था. घंटों गप-शप हुआ करती थी. एल एल.बी. पास करने के बाद उसने सिविल जज के लिए आवेदन किया और मुझसे भी इस पद पर आवेदन करने के लिए कहा. मैंने असमर्थता ज़ाहिर की तो उसने मुझे समझाया, 'कर दे यार, इज्ज़त की नौकरी है, तेरा सिलेक्शन हो जाएगा क्योंकि एल एल.बी. में तेरे मार्क्स अच्छे हैं.' मैंने उसे बताया, 'मेरे पिता मुझे नौकरी करने की इजाज़त नहीं देंगे. आईएएस की तैयारी के लिए जब उन्होंने अनुमति नहीं दी तो मैं समझ गया कि मेरा भविष्य पारिवारिक व्यापार में ही है, नौकरी में नहीं.' वह सिविल जज बन गया , मैं मिठाई बेचता रह गया. सिविल जज बनने के बाद भी उसने दोस्ती निभाई, जब भी बिलासपुर आता तो मिलने आता, जब बिलासपुर में ही पोस्टिंग मिली तब भी वह पहले की ही तरह आता-जाता रहा. एक दिन मैंने उससे पूछा, 'तुम जज हो, तुम्हारे सामने तुम्हारा क्लर्क खुले आम रिश्वत लेता है, जो गैर कानूनी है, तुमने एक्शन लिया कभी?' इस प्रश्न का उसने कोई जवाब नहीं दिया, बस मुस्कुरा के रह गया.    बिलासपुर से बाहर की पोस्टिंग के दिनों मेरा उससे पत्रव्यवहार चलता था. एक पत्र में मैंने देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के बारे में चिंता ज़ाहिर की तो उसने उत्तर दिया, 'समुद्रमंथन में जब विष निकला तो सारे देवता और राक्षस उसे ग्रहण करने से पीछे हट गये थे तब शिव ने उस विष को अपने कंठ में उतारा था. आज भ्रष्टाचार उसी विष की तरह है जिसे हर व्यक्ति को शिव बनकर अपने हिस्से का विष पीना होगा.' उसके सेवाकाल में कई बार मेरी इच्छा हुई कि उससे पूछूं, 'तुमने अपने हिस्से का विष पिया या नहीं?' लेकिन आज की व्यवहारिक दुनिया में ऐसा प्रश्न करना मुझे उचित नहीं लगा, इसलिए बिना पूछे रह गया. 

उपरोक्त बात मुझे क्यों याद आयी? अपनी वकालत के दौरान मैंने हर क्लर्क को जज के सामने पेशी देते समय वकील से रुपए लेते हुए देखा लेकिन किसी जज को वह कभी दिखाई नहीं दिया. न्याय के मंदिर में, जहाँ अपराध करने में सजा दी जाती है, वहां इस सार्वजनिक अपराध पर अदालतें चुप क्यों रह जाती हैं? यह मुझे समझ में नहीं आया.  

बार रूम के बाहर के बरामदे में टायपिस्ट बैठते थे. उनके टायपराइटर से खटर-खटर आवाज़ का कान फोडू संगीत हर समय सुनाई पड़ता था. एक पुराने टाइपिस्ट थे जिनका नाम था हंटर, ईसाई थे, सीनियर उन्हीं से टाइप करवाया करते थे. अदालत में दी जाने वाले सभी आवेदन उन्हें मालूम थे, केवल अदालत का नाम, प्रकरण क्रमांक और प्रार्थी का नाम उनको बता दो, बाकी सब काम उनका. इसी बरामदे में मुवक्किल भटकते रहते थे, दलाल अपने ग्राहक खोजते रहते थे और सब मिलजुलकर बीड़ी-सिगरेट की मिलीजुली गंध का आनंद लेते रहते थे. 

अदालत के भीतर तो कुर्सी-टेबल थी लेकिन बाहर कुछ नहीं. मुवक्किल खड़े-खड़े अपने नाम की पुकार का इंतज़ार करते. बहुत देर तक तो जज साहब अपनी कुर्सी पर विराजमान ही नहीं होते थे, लोग झांक-झांक कर देवता के आगमन को देखते रहते, जब बहुत देर हो जाती तो धीरे से बाबू से पूछते, 'क्यों साहब कब आएँगे?' तो बाबू घुड़क कर जवाब देता, 'जब आएंगे तो तुमको भी दिखेंगे और मुझे भी.' 

कुछ और देर में जज साहब अवतरित हुए, उन्होंने अपने क्लर्क को बुलाया, आज के केस की फाइलें बुलवाई. उन्हें देखे बिना पास बैठे अपने टाइपिस्ट को इशारे में कुछ कहा. टाइपिस्ट ने टायपराइटर में कार्बन लगाकर पेपर चढ़ाया और साहब एक फैसला टाइप कराने लगे. बेचारे वादी-प्रतिवादी झांक-झांक कर दुखी हो जाते और इतने में लंच टाइम हो जाता. लंच के बाद पुकार शुरू होती, दो-तीन पुकार के पश्चात एक प्रकरण में गवाही शुरू हो जाती, पूरा दिन उसमें बीत जाता. बाकी प्रकरणों में अगली तारीख लग जाती, किसी की एक महीने बाद, किसी की दो महीने बाद. दूर गाँवों से आए लोग बिना काम हुए अगली तारीख की पर्ची हाथ में सँभालते हुए वापस चले जाते हैं.  हथकड़ी लगाए हुए बैठा कैदी अपराध सिद्ध हुए बिना अभी और कैद के लिए अभिशप्त हो जाता है. क्या करें? खामोश...अदालत ज़ारी है.  

न्याय का तात्पर्य क्या है? यही न, सच को सच और झूठ को झूठ, सही को सही और गलत को गलत. अदालतों में फिर तो न्याय होता ही नहीं है. अदालत साक्ष्य को प्रमाणिक मानती है. गवाह की बात पर भरोसा करती है. यह तो बात आम है कि साक्ष्य और गवाह बदले जा सकते हैं, या, कृत्रिम रूप से बनाए जा सकते हैं. ऐसी हालत में अदालत के पास कौन सा सूत्र बचता है जिसमें वह किसी मामले की तह में जाकर सच का संधान कर सके या सही कौन है इसका पता लगा सके? 

झूठ को सच साबित करने का काम वकील करते हैं, यह उनका पेशा है. किसी भी वकील का यह उत्तरदायित्व होता है कि वह अपने पक्षकार का पक्ष लेकर अदालत के सामने प्रस्तुत हो, वह ऐसा ही करता भी है, भले ही उसका पक्षकार गलत हो. वकील की काबिलियत से मामले बनते-बिगड़ते हैं. वादी-प्रतिवादी के बयानों के परीक्षण-प्रतिपरीक्षण में मामले की असल पृष्ठभूमि तैयार होती है, उसके बाद गवाहों के साथ की गयी जिरह और अंत में बहस, ये सब वकील की योग्यता पर निर्भर करता है. मैंने यह गौर किया है कि मुवक्किल की बात को वकील साहबान गौर से सुनते तक नहीं हैं, उनका सही पक्ष कैसे प्रस्तुत करेंगे? अब तो दीवानी और पारिवारिक मामलों में वकीलों के 'दलबदल' की शिकायतें इतनी अधिक हो गयी हैं कि मुवक्किल यह तय नहीं कर पाता कि किसको अपना समझे, किसको अपना मामला सौंपे? 

अदालत में मैंने न्याय की आस में भटकते लोग देखे. यह आस निराशा में विलम्ब के कारण बदलती है. न्यायशास्त्र में स्पष्ट उल्लेख है, Justice delayed, justice denied, न्याय में विलम्ब न्याय से इंकार है. क्या न्यायालयों में आमजन को शीघ्र न्याय उपलब्ध है? न्याय की आस में खड़ा व्यक्ति स्वयं के साथ हो रहे अन्याय को सिर्फ इसलिए सहता है कि वह अदालती कार्यवाई के चंगुल में फंस गया है, क्या करे बेचारा?

जैसा कि मैंने आपको बताया कि वकालत करते छः माह बीत गये थे लेकिन लक्ष्मी माता के दर्शन नहीं हुए थे फिर भी मैं मुस्तैदी से लगा रहा. 'कभी तो मिलेगी, कहीं तो मिलेगी, बहारों की मंज़िल, राही.' 

मैं मिठाई दुकान में रोजाना सात-आठ घंटे की ड्यूटी देता था, उसके बाद कचहरी जाता था तथापि मेरे बड़े भाई साहब को मेरा वकालत करना पसंद नहीं था, वे मुझसे नाराज रहा करते थे, यदाकदा अपनी नाराज़गी व्यक्त भी करते थे. वैसे, मुझे पहले 'द्वारिका' कहकर पुकारते थे, मेरी वकालत करने के बाद वे मुझे 'वकील साहब' कहने लगे. मुझे वकालत छोड़े पचास साल से अधिक हो रहे हैं, वे मुझे आज भी 'वकील साहब' ही कहते हैं. अरे, मैंने ये क्या किया? वकालत छोड़ने की बात आपको बता दी! खैर, अब मैं आपको यह बताने जा रहा हूँ कि मैंने वकालत का पेशा क्यों त्याग दिया. 

उसी समय मेरे सीनियर को एक Pauper case (दरिद्र प्रकरण) मिला. बेहद गरीब लोगों की मदद के लिए सरकार के खर्च पर ऐसे मुकदमे वकील को दिए जाते हैं. बिलासपुर से लगभग 100 किलोमीटर दूर कोरबा के समीप कोरवी गाँव के एक साठ वर्षीय व्यक्ति पर यह आरोप था कि उसने अपनी बहू के साथ बलात्कार किया. बहू हल्ला न मचा दे, इस कारण उसका गला घोंट कर उसे मार डाला और उसकी लाश घर के बाहर कुँए में फेंक दी. 

मैं सीनियर के साथ उस मुलजिम से मिलने के लिए जेल गया. उसने बताया कि वह निर्दोष है,गाँव के सरपंच से उसकी दुश्मनी है, उसने उसकी पत्नी और बेटे को बरगला दिया और झूठी रिपोर्ट लिखवा दी. उसने हमसे पूछा, 'ये मेरी उम्र है क्या ऐसा गलत काम करने की?'

मैंने उस मामले को बड़े ध्यान से अध्ययन किया, गौर से पूरी कार्यवाई सुनी और देखी क्योंकि मैं फौजदारी मामलों में ही रूचि रखता था. मुझे ख़ुशी हो रही थी कि हम लोग एक निरपराध व्यक्ति को बचाने की कोशिश कर रहे थे. यह मामला एडीजे मुंशी साहब की अदालत में चल रहा था. मुंशी साहब में एक खास बात थी कि वे चाहे बयान हो रहे हों या बहस, आँखें बंद करके सुनते थे. मुझे तो ऐसा लगता था जैसे वे सो गए हों. मुलजिम की पत्नी और लड़के ने उसके खिलाफ बयान दिया और अदालत को बताया कि उसकी नीयत में खोट था और पहले भी वह बहू के साथ ऐसी कोशिश कर चुका है. जज साहब ने चाहे जैसा मामले को सुना हो, इस मामले में कोई चश्मदीद गवाह नहीं था इसलिए मुलजिम को संदेह लाभ देते हुए बरी कर दिया गया. मुलजिम के हाथों से हथकड़ी खोल दी गयी, वह रिहा हो गया. उसके बाद वह आदमी सीनियर के पास आया और बोला, 'आपने मुझे बचा लिया.' सीनियर ने उससे कहा, 'गाँव में सबसे प्रेम से रहा करो, देखो, सरपंच से झगड़े के कारण तुमको इतनी परेशानी झेलनी पड़ी.' तो उसने कहा, 'आप ठीक कहते हैं वकील साहब लेकिन एक बात कहे बिना मुझे चैन नहीं पड़ेगा.' सीनियर ने कहा, 'कहो.' उसने बताया, 'वकील साहब, मुझसे भूल हो गयी थी, मैंने ही वह गलत काम किया था.' और, वह वकील साहब के पैरों में गिर कर रोने लगा. 

उसकी बात सुनकर मैं अवाक रह गया. मुझे ऐसा लगा जैसे उसकी बहू के साथ हुए बलात्कार और हत्या करने में मैं भी शामिल हो गया हूँ. मुझे अपने ऊपर बहुत घिन आयी. वापस अपने घर आया और वकालत की पोषाक को घूरे के ढेर में फेंक दिया और उसके बाद वकालत हमेशा के लिए छोड़ दी. 

एक बोध कथा है, एक साधु ने देखा कि एक बिल्ली चूहे को खदेड़ रही है तो साधु ने अपनी अलौकिक शक्तियों से उस चूहे को बिल्ली बना दिया और उसकी जान बच गई. एक दिन उस बिल्ली के पीछे एक कुत्ता दौड़ पड़ा तो साधु ने उसे कुत्ता बना दिया. फिर उस कुत्ते पर शेर ने हमला कर दिया, साधु ने तुरंत उस कुत्ते को शेर बना दिया. जो गाँव वाले इस शेर का रहस्य जानते थे, वे उसका मजाक उड़ाते थे, उनके लिए वह एक पिद्दी-सा चूहा ही था, जो शेर बना फिरता था! अब इस शेर ने सोचा कि जब तक यह साधु जीवित रहेगा, तब तक ये सब लोग उसका ऐसा ही मजाक उड़ाते रहेंगे. साधु ने जब इस शेर को अपनी ओर आते देखा, तो उसके इरादे समझ गया तब साधु बोला, 'पुनः मूषको भव', तुम फिर से चूहा बन जाओ, और, इस प्रकार वह फिर से चूहा बन गया. मैं इसी चूहे की तरह फिर से पूर्णकालिक हलवाई बन गया. विगत ११-१२ वर्षों से इस व्यापार को कर रहा था, अगले १५ वर्षों तक पुनः इसे करता रहा लेकिन उत्तरार्द्ध के यह वर्ष मेरे जीवन का यादगार काल सिद्ध हुआ.

सन १९७०-७१-७२ में बड़े भैया का बिलासपुर से मन उचटने सा लगा, वे दूसरे शहर में कारोबार शुरू करना चाहते थे. कुछ बड़ा करने की चाहत और वर्तमान संयुक्त परिवार की परेशानियों से दूरी बनाना उनके दिमाग में घर कर गयी. उन्होंने नजदीकी शहर रायपुर का सर्वेक्षण किया, वहां उनको मिठाई का काम शुरू करने की असीम संभावनाएं नज़र आई. बस स्टेंड के सामने एक दूकान भी मिल गयी, १५ अगस्त १९७२ को वहां पर एक आधुनिक दूकान की शुरुआत हुई जिसका नाम रखा गया, 'मधु स्वीट्स'. बिलासपुर की 'पेंड्रावाला' का भार मुझ पर छोड़ दिया गया. 

मधु स्वीट्स की आधुनिक साजसज्जा को देखकर मेरा भी मन मचलने लगा और मैंने अपनी दुकान के गेटअप को बदलने का निर्णय लिया. सन १९७३-७४ में बहुत तोड़-फोड़ हुई, लगभग चार महीने तक दुकान बंद रही. दुकान के सामने की भट्ठी ऊपर चली गयी, नीचे फर्श पर लगे पत्थर की जगह मोजाइक लग गया, ग्राहकों के बैठने के लिए दोगुनी जगह हो गयी. नये कुर्सी-टेबल बने और साथ ही नया काउंटर बन गया, दुकान ने आधुनिक स्वरुप ले लिया. जब नये परिवेश में दुकान खुली तो आकर्षण बढ़ गया और लक्ष्मी जी प्रसन्न होने लगी. 

इस आधुनिक दुकान से मुझे एक जबरदस्त फायदा हुआ, मेरी रुकी हुई शादी हो गई. हुआ ये था कि मैं २८ वर्ष का हो गया था लेकिन अविवाहित था. कारण? हलवाई होना. दो-तीन साल में बड़ी मुश्किल से कोई एक रिश्ता आता, और कोई-न-कोई अड़चन आ जाती और बात टूट जाती थी. ज्यादातर लड़कियां या उनके माता-पिता मेरे हलवाई होने से बिदक जाते थे इसलिए दर्शन ही नहीं देते थे. हम लड़के वाले थे इसलिए मेरे पिता घमंड में थे कि हम किसी लड़की वाले के घर प्रस्ताव लेकर कैसे जाएंगे. इस प्रकार मेरी शादी अटकी हुई थी जबकि उन दिनों लड़कों की शादी की प्रचलित उम्र २०-२१ साल थी. मैं 'एक्सपायरी डेट' वाला लड़का हो चुका था. इस बीच जबलपुर से एक सज्जन मुझे देखने बिलासपुर आये, उन्होंने मुझे देखा, मेरी दुकान को देखा, मैं तो सांवला था लेकिन मेरी दुकान हसीन थी, शायद इसलिए वे अपनी सुन्दर बिटिया मुझे ब्याहने के लिए तैयार हो गए, ऐसा मेरा अनुमान है. 

काउंटर नया था, बड़ा था इसलिए मिठाई की वेरायटी बढ़ गयी. मेरे यहाँ सर्वाधिक बिक्री खोवे से बने पेड़े की थी. वैसे तो रोज उसके ग्राहक आते थे लेकिन शनिवार और मंगलवार की शाम को हनुमान जी को प्रसाद चढ़ाने के लिए ग्राहकों की भीड़ हो जाती थी. अधिकतर लोग सवा रुपए का, तो कुछ लोग सवा पाव तो एक-आध ग्राहक सवा सेर पेड़ा खरीदते थे. पेड़ा लेने के लिए मेरे पास छोटे-छोटे बच्चे भी आया करते थे. एक पेड़े की कीमत २५ पैसे होती थी लेकिन यदि कोई बच्चा पांच या दस पैसे लेकर आया तो भी उसे एक पेड़ा उसी कीमत में उसे अवश्य दिया जाता. मेरा मानना था कि उस बच्चे ने कितनी मुश्किल से उन्होंने इतने पैसे का जुगाड़ किया होगा, उनकी मेहनत का सम्मान होना चाहिए. वैसे, भी वे मेरे भविष्य के संभावित ग्राहक जो थे. ग्राहकों के साथ जो बच्चे आते थे उनको अनिवार्य रूप से पेड़ा खिलाया जाता था इसलिए वे लोग मुझे 'पेड़ा अंकल' कहते थे. बिलासपुर का गोलबाजार उन दिनों घरेलू सभी वस्तुओं की खरीद-बिक्री का केंद्र था, हर एक शहरवासी को गोलबाजार का चक्कर लगाना अनिवार्य था. उनके साथ जब उनके बच्चे आते तो तो वे अपने अभिभावकों का हाथ खींच कर मेरी दुकान में लाते थे क्योंकि उनको 'पेड़ा अंकल' से पेड़ा जो मिलता था, बेचारे माता-पिता मजबूरी में कुछ मीठा या नमकीन खरीदते भी थे.   

हमारे यहाँ की रसमलाई ग्राहकों में बहुत लोकप्रिय थी. रोज दो ट्रे बनती और रात तक बिक जाती थी. रसमलाई बनाना बहुत आसान है, छेने के रसगुल्ले का शीरा निचो कर उसे थोड़े से दूध में डाल दो, फिर मीडियम गाढ़ा दूध में इलायची और शक्कर मिला लें, उसके बाद निचोये हुए रसगुल्ले को इस गाढ़े दूध में डाल दें, रसमलाई तैयार. हाँ, खाने के पहले इसे फ्रिज में भलीभांति ठंडा कर लें तो स्वाद और बढ़ जाएगा. पता नहीं कैसे, हमारी रसमलाई को लेकर एक भ्रान्ति ग्राहकों के बीच फ़ैल गयी थी, 'गर्भवती महिलाएं यदि पेंड्रावाले की रसमलाई खाएं तो उनको अनिवार्य रूप से लड़का होगा', इस चर्चा के बाद हमारी दुकान में गर्भवती महिलाओं की उपस्थिति बढ़ने लगी. मेरी एक भाभी (भाभी मतलब मेरे सभी पुरुष ग्राहकों की पत्नियां) ने मुझसे पूछा, 'भैया, हमने आपकी रसमलाई के बारे में कुछ सुना है, वह सच है क्या?' मैंने कहा, 'सुना तो मैंने भी है लेकिन सच क्या है, मुझे नहीं मालूम. वैसे, हम रसमलाई में कोई दवा वगैरह तो नहीं डालते.' तो, वे बोली, 'यानी पक्का नहीं है? चलो, फिर भी मैं भी खा ही लेती हूँ, शायद सच हो जाए.' कहकर उन्होंने दो रसमलाई, प्रणाम करके खा लिया. भ्रान्ति और आस्था में कितना कम अंतर होता है! 

सन १९७५ से १९८० के मध्य बिलासपुर आधुनिकता के दौर में प्रवेश कर रहा था. इससे पहले बाज़ार में केवल पुरुष ही दिखाई पड़ते थे, लेकिन इस दौर में महिलाएं भी खरीददारी के लिए घर से बाहर निकलने लगी थी. हमारी दुकान शाम के समय 'मीटिंग पॉइंट' हो जाती थी. लोग अपनी पत्नी के साथ आया करते थे, गरम समोसा और रसमलाई खाते थे और काउंटर के बाहर खड़े होकर लोगों से गपशप करते या अन्य लोगों का इंतज़ार करते थे. बीच-बीच में व्यस्तता के बावजूद मैं भी उनके वार्तालाप में शामिल हो जाता था. यह सिलसिला शाम को छः बजे शुरू होकर रात साढ़े आठ बजे तक चलते रहता. 

होली के त्यौहार में गोलबाजार के सुधीर खंडेलवाल एक टाइटल प्रकाशित किया करते थे जिसमें मेरे नाम की आगे स्थायी रूप से लिखा होता था, 'भाभियों का प्यारा देवर'. मेरी ही एक ऐसी भाभी ने एक दिन ऐसी बात कही कि मेरा मन भर आया, 'भैया, आपको देखती हूँ तो मुझे अपने भाई की याद आती है.'

अपनी दुकान की पुरानी मशहूर रबड़ी तो बनती ही थी जिसे फ्रिज में ठंडी करके ग्राहकों को देते थे. इसके अतिरिक्त गाजर का हलवा जिसे हम लोग गजरेला कहते थे और लौकी का हलवा जिसे कपूरकंद कहते थे, ये दोनों भी मौसम में उपलब्धता के अनुकूल बनते थे लेकिन इन्हें फ्रिज में नहीं रखा जाता था, बाहर काउंटर पर रखते थे, खूब खपत होती थी. दूध की दानेदार बर्फी बनती थी जिसका अनुपम स्वाद आज भी मुंह में मिठास घोल देता है. खोवा की कलाकंद तो अब कहीं दिखाई नहीं पड़ती, इसे खोवा को हल्का भूंज कर, ठंडा करके इसमें शक्कर का बूरा और गुलाब का एसेंस मिला कर ट्रे में हाथ से थाप देते थे और फिर चौकोर टुकड़े काटकर खूबसूरती से सजाकर काउंटर में रखते थे. बिलासपुर में बंगाली ग्राहकों को यह बहुत पसंद थी, वे लोग जब कभी अपने घर यानी बंगाल जाते थे तो किलो-दो किलो पैक करवा कर अवश्य लेकर जाते थे. 

जैसा कि मैंने आपको पहले बताया था कि बब्बा जी के ज़माने से हमारे यहाँ शुद्ध घी भी बेचा जाता था. शहर में सबसे अधिक घी बेचने का गौरव हमें प्राप्त था. लोगों को शुद्धता का इतना विश्वास था कि आँख मूंदकर ले जाते थे और उसका उपयोग करते थे. शुद्ध घी की बात निकली तो एक घटना याद आयी, मेरे एक मित्र थे महेश भट्ट, उम्र में मुझसे दस साल बड़े थे लेकिन उनसे मन मिल गया तो दोस्ती जैसी हो गई. वे प्रत्येक शाम को हमारी दूकान में आया करते थे, एक घंटे तक बैठते थे और बहुत मजेदार बातें करते थे. तो, हुआ ये कि एक दिन वे हमारे यहाँ से एक किलो घी अपने घर ले गये. घी भाभी जी को पसंद नहीं आया तो वे उनके ऊपर भड़की, 'कहाँ से लेकर आये हो ये घी?' महेश जी ने कहा, 'पेंड्रा वाले से, और कहाँ से?' भाभी जी ने तेज आवाज में कहा, 'हो ही नहीं सकता, वहां का सामान एकदम शुद्ध रहता है तुम और किसी दूसरी दुकान से लाए हो, सच-सच बताओ.' महेश जी समझाते रहे लेकिन वे नहीं मानी, घी का डब्बा दिया और कहा, 'इसे वापस करो और वहीं से ले कर आना.' बेचारे शाम को जब वे मेरी दूकान आये तो उन्होंने अपनी व्यथा-कथा बतायी और मुझसे बोले, 'कैसा घी दे दिए, मेरे घर में झगड़ा हो गया.' मैंने कहा, ' मैं दूसरे टिन से दूसरा घी निकाल कर देता हूँ.' तो वे बोले 'घी तो तुम बदल दोगे लेकिन उनको कैसे समझाऊं कि घी तुम्हारी दुकान का था?' मैंने कहा, 'उनसे बोल देना कि पिछली बार जल्दी-जल्दी में दूसरी जगह से ले लिया था, इस बार वहीं से लाया हूँ.' तो, इसे कहते हैं दुकान की 'गुडविल'.

हमारी दुकान की पूरी-सब्जी ग्राहकों में बहुत लोकप्रिय थी. गरम पूरियां और रसेदार आलू की सब्जी, यदाकदा कुम्हड़ा या तरोई की सब्जी बना करती थी, सुबह आठ बजे से जो घी की कड़ाही भठ्टी पर चढ़ती थी तो दोपहर तीन बजे तक और शाम सात बजे से रात दस बजे तक जो चढ़ती थी तो उतरती ही नहीं थी. पूरी-सब्जी के साथ ताज़ा दही और रबड़ी का काम्बिनेशन भी कुछ ग्राहकों की पसंद में था. इसके अतिरिक्त आलू के समोसे सुबह सात बजे से रात नौ बजे तक अनवरत बनते रहते थे. समोसा के साथ खट्टी-मीठी चटनी ग्राहकों के लिए विशेष आकर्षण था. इन सामानों की गुणवत्ता का दारोमदार इन्हें बनाने वाले कारीगर पर होता है, वे ही इस धंधे की जान होते हैं. इस सन्दर्भ में मेरी लिखित कहानी 'बिच्छू का दंश' का एक उद्धरण पढने लायक है : 

'उस्तादी एक विशिष्टता है जिसका अर्थ है होशियारी। उस्ताद का मतलब है, जो अपने कार्य में निपुण हो। उस्ताद शब्द का प्रयोग अनेक क्षेत्रों में होता है, खास तौर से संगीत में, पहलवानी में, दादागिरी में। हलवाई की दूकान में जिस व्यक्ति को मीठा और नमकीन बनाने में महारत होती है, उसे भी उस्ताद कहते हैं। इसका काम होता है, होटल में बनने वाले सामान का तालमेल बैठाना, कच्चा माल खराब न हो इसका ध्यान रखना, भट्ठी की आंच पर नज़र रखना, समय पर माल तैयार होने के बाद उसे खूबसूरती से सजाकर काउंटर पर भेजना, ग्राहक की ज़रूरत और उसके स्वाद का आकलन करना, निर्माण के दौरान सामान की गुणवत्ता का ख्याल रखना, कारखाने में हो रहे नुकसान को कम करना, मातहतों से काम लेना और मालिक तथा अन्य कामगारों के मध्य पुल का काम करना।होटल में उस्ताद का जलवा मालिक से अधिक होता है। इसके दो कारण होते हैं, पहला, सभी कामगार उसके 'डायरेक्ट कंट्रोल' में रहते हैं और दूसरा, होटल के चलने या न चलने का पूरा दारोमदार उस्ताद के हुनर पर रहता है। उस्ताद बढ़िया तो माल बढ़िया बनता है, माल अच्छा तो ग्राहक खुश रहते हैं, ग्राहक खुश तो दूकान चलती है, दूकान चलती है तो मालिक की तिजोरी भरती है, मालिक मालदार होता है तो उसकी बीवी गहनों से लदी रहती है, गहने पहन कर बीवी अपने पति से खुश रहती है, बीवी खुश रहती है तो मालिक के घर में शांति रहती है। समझने की बात यह है कि मालिक के घर में शांति का सूत्र इसी उस्ताद के हाथ में है।'

कंधई के साथ मुझे अर्जुन, चन्द्रिका महाराज, कल्लू और कैलाश की याद आ रही है. अर्जुन शतरंज का बहुत बढ़िया खिलाड़ी था, कविता और उपन्यासों का शौक़ीन भी. उसने मुझे गोपालसिंह नेपाली और गोपालदास नीरज की कविताएँ पढ़वाई और मेरे जीवन का पहला उपन्यास भगवतीचरण वर्मा का उपन्यास 'चित्रलेखा' भी. साहित्य के प्रति मेरे मन में रुझान उत्पन्न करने का श्रेय इन्हीं अर्जुन उस्ताद को है. चन्द्रिका महाराज उम्र में वरिष्ठ थे, शरीर मोटा था इसलिए सक्रिय कम रहते थे लेकिन जलेबी और पूरी बनाने में सिद्धहस्त थे. कल्लू उस्ताद का जैसा नाम था,वैसे ही काले रंग के थे. सर में बाल नहीं रखते थे, हर समय चिकनी मुंडी, सर में चमकता तेल, हंसमुख स्वभाव वाले व्यक्ति थे. उनके आने से हमारी दुकान में मिठाई की वेरायटी और बढ़ गयी, केसरिया पेड़ा तो लाजवाब बनाते थे. कैलाश गोरा-नारा था, बालूसाही और सोनपपड़ी बनाने वाला उसके जैसा कारीगर मैंने नहीं देखा. 

सन १९७७ की बात है, बड़े भैया बम्बई जा रहे थे, मैंने उनसे अनुरोध किया कि एक आइसक्रीम की मशीन वहां से मेरी दुकान के लिए ला दें. उन्होंने वहां आर्डर दे दिया, मशीन ट्रक में आ गयी, उस जमाने में बीस हजार में मिली. मशीन दुकान के सामने फिट हो गयी और उसकी धूम मच गयी. शहर वालों को पहली बार 'साफ्टी' खाने को मिली जिसके बारे में हमें ग्राहकों को समझाना पड़ता था कि उसमें समाहित आइसक्रीम को 'कोन' सहित खाना है. हमारी दुकान में शाम होते ही ग्राहकों का मेला लगने लगा. मैं और मेरे मित्र रामकिशन खंडेलवाल रात को एक बजे तक खड़े-खड़े आइसक्रीम तैयार करते ताकि अगले १२ घंटों में वह जम कर 'हार्ड' हो जाए तो दूसरे दिन ग्राहकों को दी जा सके. वे दिन 'पेंड्रावाला' के स्वर्णिम दिन थे. 

मेरा दिल कुछ और करने का हो रहा था. इस बीच सन १९८२ में खबर आयी कि बिलासपुर में टेलीविजन का रिले-सेंटर खुलने वाला है, मैंने टेलीविजन बेचने का निर्णय लिया. भिलाई के हिन्दुस्तान टीवी सेंटर से 'कोणार्क' के ४ टेलीविजन ले आया और दुकान के एक ओर एक आलमारी में रख दिया. बिक्री शुरू भी गयी. उत्साह बढ़ा तो काम भी बढ़ता गया. धीरे से दुकान का एक तिहाई हिस्से में मेरी टेलीविजन का शोरुम बन गया जिसका नाम रखा गया, 'मधु छाया केंद्र. दोनों दुकानों का काम साथ-साथ चलता रहा. 

शुरू में रायपुर से २४ एलिमेंट का एंटीना और बूस्टर की मदद से हम लोग वेब पकड़ते रहे, फिर जब बिलासपुर का केंद्र खुला तो केवल ५ एलिमेंट के एंटीना से पकड़ने लगा. एक मात्र चैनल था 'दूरदर्शन' किसका दर्शन करने के लिए घर-घर के लोग लालायित थे. शुरुआत श्वेत-श्याम टीवी से हुई, बाद में रंगीन टीवी आए. उस समय के माहौल को समझने के लिए मेरी आत्मकथा 'पल पल ये पल' का यह उद्धरण पठनीय है :

"भारत में टेलीविजन का आगमन भारतवासियों के लिए एक चमत्कारिक घटना थी. संपूर्ण देश की धड़कन जैसे उसमें प्रसारित होनेवाले कार्यक्रमों से जुड़ गई थी. आधे घंटे के फ़िल्मी गीतों के कार्यक्रम 'चित्रहार’ और 'रंगोली’; धारावाहिक 'हम लोग’, 'बुनियाद’, 'ये जो है ज़िदगी’; रविवार की शाम को हिंदी फ़ीचर फ़िल्म; हिन्दी तथा अंग्रेजी में समाचार आदि के आकर्षण ने हर भारतवासी को अपने समीप बुलाकर बैठा लिया. घर-घर सिनेमा आ गया, नाटक आ गया, गीत-संगीत आ गया, देश-विदेश की आंखों-देखी घटनाओं के समाचार, 'लाइव क्रिकेट मैच’ आदि बहुत कुछ आ गया और सबसे बड़ी बात- बहुत बड़ी आबादी के हाथ में 'जेन्युइन टाइम पास’ आ गया जो कालांतर में 'टाइम किलर’ बन गया. आज यह बात समझ में शायद ही आए कि वह कैसा पागलपन था लेकिन जिन्होंने उस युग को देखा है, उनसे पता कीजिए कि पूरा देश किस कदर टीवी-मय था, सब ओर एक ही चर्चा- टीवी का यह कार्यक्रम, वह कार्यक्रम; सीरियल का यह पात्र, वह पात्र. निर्माता रामानंद सागर ने भारतवर्ष के अत्यन्त लोकप्रिय ग्रन्थ पर एक 'सीरियल’ बनाया- 'रामायण’ जिसके प्रदर्शन ने प्रत्येक रविवार की सुबह 9 से 10 बजे तक का समय देश की बहुत बड़ी आबादी का अपने लिए आरक्षित कर लिया. उस एक घन्टे के लिए जैसे पूरे देश का रक्तप्रवाह थम सा जाता, समस्त गतिविधियां और आवागमन स्थगित हो जाते, टीवी के सामने असंख्य दर्शक तल्लीन होकर उस प्रदर्शन में खो जाते. 'तल्लीन' शब्द का असली अर्थ मैंने उस दर्शक समूह को देखकर जाना,"
प्रत्येक रविवार को प्रसारण के समय मैं एक रंगीन टीवी जरा उंचाई पर रख कर चला देता था, सामने दो-तीन सौ लोगों की भीड़ बड़े मनोयोग से रामायण देखती और अत्यंत प्रसन्न होकर जाती.

बहुत कम लोगों के घर में टेलीविजन हुआ करते थे इसलिए जिनके घर टीवी थे, उनके घर 'मिनी थियेटर’ जैसे हो गए थे. मोहल्ले-पड़ोस के स्त्री-पुरुष, बड़े-बूढ़े और बच्चे नियत समय पर पहुंच जाते, सबके बैठने की व्यवस्था बनाई जाती, कई बार भीड़ इतनी बढ़ जाती कि टीवी मालिक के परिवारजन खड़े-खड़े कार्यक्रम देखते क्योंकि उनके बैठने की जगह ही न बचती! शुरुआती दिनों में तो शिष्टाचार चला फ़िर टालना शुरू हुआ और फ़िर भगाना। जिसे भगाया गया वह अपमानित हुआ और किसी प्रकार टीवी खरीदने की जुगत बिठाने लगा. उन दिनों ब्लेक-व्हाइट टीवी ही उपलब्ध थे जो तीन से चार हजार के बीच आ जाते थे लेकिन निम्न मध्यम वर्ग के लिए उतने पैसे की व्यवस्था आसान बात नहीं थी इसलिए बच्चों की ज़िद के आगे मां-बाप येन-केन-प्रकारेण घर में टीवी लाने के प्रयास करते जिनमें घरखर्च में कटौती, रिश्तेदारों से उधार लेना और घर के जेवर बेचने जैसे उपाय शामिल थे. गरीब तो उस समय टीवी से कोसों दूर था. शुरुआत ब्लेक-व्हाइट टीवी से हुई, रंगीन बहुत बाद में आया, आया भी तो लगभग १५ हजार का आता था जो आम आदमी की पहुँच से बाहर था. फ़िर, 14'' के  ब्लेक-व्हाइट 'पोर्टेबल’ बाज़ार में आए, वे दो हजार के अन्दर आ जाते थे तब अनेक परिवारों का शौक सध गया. पोर्टेबल टीवी खरीदने वालों का समूह घरों से निकल पड़ा. 

उस समय के टीवी बिगड़ते भी बहुत थे. हम लोग जब टीवी बेचते थे तो एक वेरेंटी कार्ड ग्राहक को देते थे जिसमें एक साल तक टीवी बिगड़ने पर सुधार कर देने का वचन होता था लेकिन टीवी बदलकर देने का नहीं था. किसी भी कंपनी के टीवी-सुधारक हमारे पास या देश में किसी भी टीवी डीलर के पास नहीं थे, स्थानीय टीवी-सुधारकों के बूते से काम चलाया जाता था. शहर में कुल दो दक्ष सुधारक थे, एक-दो नौसिखिया थे, वे लोग इतना भाव खाते थे कि उस जमाने की लड़कियां भी लड़कों से उतना भाव नहीं खाती रही होंगी. उनके पास इतना काम होता था कि वे अपनी दुकान में ही टीवी मंगवाकर सुधारते थे जबकि ग्राहक यह चाहते थे कि टीवी कोई उनके घर में आकर सुधार जाए. ग्राहक को समझाना बहुत मुश्किल होता था इसलिए ग्राहक की तसल्ली के लिए मैं स्वयं उनके घर जाकर टीवी खोलता, कुछ जांच करता, फ्यूज उड़ा होता तो बदल देता, यदि उससे आगे की समस्या होती तो फिर टीवी दुकान पहुँचाने के लिए कहता तो ग्राहक सौजन्यतावश मान जाते थे. तो, टीवी बेचने में समस्या कम थी, उन्हें सुधारकर देने में बहुत थी. 

टीवी बिगड़ने की बात पर एक घटना याद आ गयी, कोरबा में स्थापित मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल के एक कार्यपालन यंत्री हमारे यहाँ से कोणार्क का एक रंगीन टीवी ले गए. तीन-चार महीने बाद वह बिगड़ कर बंद हो गया. वे अपनी जीप में रखकर उसे हमारी दुकान में ले आए, साथ में उनकी युवा पत्नी भी थी. उन्होंने अपनी समस्या बताई तो मैंने उनसे कहा, 'आप टीवी को बनवाने के लिए दो-तीन घंटे का समय दीजिए.' लेकिन उनकी पत्नी ने कहा, 'टीवी बदलकर दूसरा दीजिए, नया टीवी ख़राब हो गया, अब हम इस सेट को अपने घर में नहीं रखेंगे.'
मैंने उनको बहुत समझाने की कोशिश की कि सेट बदलना संभव नहीं है लेकिन वे टस-से-मस नहीं हुई. उन्होंने दूसरे सेट की जिद पकड़ ली. मेरे पास उस समय कोई रंगीन टीवी था भी नहीं लेकिन मैं जितना भी समझाता, वे उतना अड़ जाती थी. उनके श्रीमानजी ने पूरे समय चुप्पी साध रखी थी और मोर्चा उनकी पत्नी ने संभाला हुआ था. अंत में वे बोली, 'रख लो. टीवी अपना, हमको नहीं चाहिए.' ऐसा कहकर वे गुस्से में उठी और अपने पति के साथ जीप में बैठकर चली गयी. 
उस टीवी को सुधरने के लिए भेजा, छोटी सी फाल्ट थी, टीवी बनकर आ गया, मैं उस दिन उनके लौटने का इंतज़ार करता रहा लेकिन वे नहीं आए. एक दिन बीत गया, दो दिन बीत गया, एक सप्ताह बीत गया, वे नहीं आये. मैंने वह टीवी अपने घर भेज दिया और उन ग्राहक को एक पोस्टकार्ड लिखा, 'महोदय, आपके द्वारा प्रदत्त टीवी सुधर गया है. हम लोग अपने घर में सपरिवार उसका आनंद ले रहे हैं, आप दोनों को धन्यवाद.'

चार-पांच दिन बाद वे सज्जन अपनी जीप में पुनः पधारे, इस बार अकेले थे वे. उन्होंने अपना टीवी माँगा, मैंने उसे घर से मंगवा कर, उनके सामने टेस्ट करवाकर उनकी गाड़ी में रखवा दिया. चाय पीने के बाद उन्होंने मुझे धन्यवाद दिया और बोले, 'आपने देखा मेरी पत्नी का स्वभाव? बड़ी मुश्किल होती है गृहस्थी चलाने में.' मैं मुस्कुरा दिया.    

व्यापार में उधारी बहुत बड़ी समस्या होती है. यदि सीमित व्यापार करना है तब तो नगद में हो सकता है लेकिन आगे बढ़ कर करना हो तो उधार देना ज़रूरी होता है. मैं सीमित व्यापार करना पसंद करता हूँ इसलिए उधार देने से बचता रहा किन्तु कई बार ऐसे लोग सामने होते हैं कि उनको मना करना मुश्किल हो जाता है. ऐसे लोगों में कुछ लोग ईमानदार निकले लेकिन कुछ ऐसे भी निकले जिन्होंने बेशर्मी ओढ़ ली, कई बार याद दिलाने के बावजूद उधार पटाया ही नहीं. आज आपको मैं मैं एक ऐसे उधार के बारे में बता रहा हूँ जो मेरे द्वारा दिया गया उधार कम था, बेवकूफी अधिक थी. 

मुझसे अपरिचित लेकिन मेरे छोटे भाई के परिचित जयकुमार जैन मेरी दूकान में एक सज्जन को साथ लेकर आए और उन्होंने एक वाशिंग मशीन की मांग की. मैंने उन्हें बताया कि मैं वाशिंग मशीन नहीं बेचता लेकिन वे बोले, 'जीजा जी, कहीं से मंगवा कर दे दीजिए, मैं कहाँ जाउंगा, आपको छोड़ कर मैं किसी को जानता नहीं.' जीजा जी वे इसलिए बोले कि वे भाई साहब के साले के दोस्त थे. मैंने रानी सती इंटरप्राइजेज में फोन किया, वहां से मशीन आ गयी. मैंने उनसे पूछा कि बिल किस नाम से बनेगा तो उन्होंने साथ में आए व्यक्ति का नाम बताया, अशोक तिवारी, ग्राम नवापारा (चकरभाठा), मैंने बिना मुनाफ़ा लिए चौदह हजार पांच सौ का उसके नाम से बिल बना दिया और मशीन और बिल उसे दे दिया. उसके बाद जयकुमार जैन ने कहा कि वह बैंक से पैसा निकालकर शाम को पहुंचा जाएगा. वह शाम कभी नहीं आई. इससे को कहते हैं 'होम करते हाथ जलना.'

जब पैसा नहीं आया तो तो मैं दो-चार दिन इंतज़ार करता रहा, उसके बाद उसका पता किया तो मालूम पड़ा कि वह बिलासपुर छोड़कर बिहार भाग गया. जब मुझे जैन के लापता होने की खबर मिली तो मैंने अपने आदमी को अशोक तिवारी के पास तगादा भिजवाया तो उसने कहा कि उसने पैसा जयकुमार जैन को दे दिया है. गाँव वालों से पूछताछ में मालूम पड़ा कि अशोक तिवारी धाकड़ किस्म का आदमी है और उसके पिता पुलिस इन्स्पेक्टर हैं, इस प्रकार उस पर दबाव बनाना असंभव था जबकि जयकुमार जैन नाम की चिड़िया फुर्र से उड़ चुकी थी. बाद में पता करने पर मालूम पड़ा कि रायपुर रोड में अशोक तिवारी के खाली प्लाट पर जयकुमार ने कोयला स्टाक करने के लिए किराए पर लिया था. उसका किराया अदा न कर पाने पर अशोक तिवारी ने उस पर पैसा देने का दबाव बनाया तब वाशिंग मशीन दिलवाने की योजना का तानाबाना बुना गया जिसका मैं शिकार हुआ. 

यह घटना १९९५ की है. उसी वक्त मित्रविहार में मेरा घर निर्मित हुआ था. पैसे की बहुत किल्लत थी. सिर पर क़र्ज़ का बोझ चढ़ गया था. टीवी का व्यापार भी बहुत कम हो गया था इसलिए मैंने स्टील का फर्नीचर भी साथ में बेचना शुरू कर दिया था. साढ़े चौदह हजार का बोझ मेरे लिए असहनीय था लेकिन मैं क्या कर सकता था, मैं तो अड़धप में फंस चुका था? मुझे इस बात की चिढ़ छूटती थी कि मेरी घरवाली अपने हाथ से कपड़े धोती है क्योंकि मैं अपने घर के लिए वाशिंग मशीन खरीद पाने में असमर्थ था, जबकि अशोक तिवारी के घर में मेरे पैसे की आटोमेटिक वाशिंग मशीन चल रही थी. मैंने अशोक तिवारी पर अदालत में दीवानी मुकदमा दायर कर दिया हलांकि मैं यह जानता था कि बिल उसके पास है, मैं मुकदमा हार जाऊँगा लेकिन मेरा मन अब उसे परेशान करने का हो गया था, सिर्फ सताने का. संयोग से उसका वकील वह हुआ जो मेरा ला कालेज में सहपाठी था. अशोक तिवारी के पिता जो पुलिस में थे, वे मेरे अभिन्न मित्र भागवत दुबे की जान-पहचान के थे. उन्होंने मेरी शिकायत की कि मैंने उनके लड़के के ऊपर झूठा मुकदमा दायर कर दिया है जबकि उनके लड़के ने भुगतान कर दिया है. जब भागवत दुबे ने मुझसे चर्चा की तो मैंने पूरी बात बताई और प्रस्ताव किया कि उनका लड़का गायत्रीमाता के मंदिर में आकर यह कह दे कि उसने मुझे पैसे दिये हैं तो मैं मुकदमा वापस ले लूँगा. अशोक तिवारी नहीं आया. तीन साल तक मुकदमा चला, जैसा कि अपेक्षित था मैं  मुकदमा हार गया लेकिन मैंने उसका दस-पंद्रह हजार रूपए खर्च करवाने में सफल रहा, भले ही वह पैसा मेरे पास नहीं आया, मेरे सहपाठी वकील के पास पहुँच गया. तो, यह था एक मूर्ख व्यापारी का किस्सा.

जूनियर चेंबर इंटरनेशनल के सौजन्य से मैं सन १९९१ में राष्ट्रीय प्रशिक्षक बन गया और १९९३ में अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षक बन गया. यद्यपि मैं १९८३ से प्रशिक्षक के रूप में कार्य कर रहा था लेकिन उससे कोई आर्थिक लाभ नहीं होता था, बस, तालियाँ और प्रशंसा हाथ आती थी किन्तु अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षक बनने के बाद मुझे ऐसे अवसर मिलना शुरू हो गए जिनसे पैसा भी मिलने लग गया. सबसे पहला पारिश्रमिक मुझे शिवपुरी-गुना ग्रामीण बैंक के अधिकारियों को व्यवहार विज्ञान का प्रशिक्षण देने के बदले मिला, बारह हजार रुपये. 

हुआ ऐसा, कि बिलासपुर में ग्रामीण बैंक का प्रशिक्षण केंद्र हुआ करता था जिसमें बैंक के अधिकारियों को प्रशिक्षण के लिए बुलवाया जाता था. ऐसे ही कार्यक्रम में 'सम्प्रेषण' विषय पर प्रशिक्षण देने के लिए मुझे आमंत्रित किया गया. मैंने प्रशिक्षण दिया, एक हजार रुपए मानदेय के रूप में मिले और बात ख़त्म. लेकिन बात ख़त्म नहीं हुई थी, शिवपुरी-गुना ग्रामीण बैंक से आए दो अधिकारियों ने जब बिलासपुर में हुए कार्यक्रम की रिपोर्ट चेयरमेन को दी तो उन दोनों ने मेरी  प्रशिक्षण शैली की कुछ अधिक ही तारीफ कर दी. चेयरमेन ने मुझे पत्र लिखा और शिवपुरी-गुना आकर उनके समस्त अधिकारियों को प्रशिक्षण देने का अनुरोध किया. उन्होंने मुझसे पारिश्रमिक के बारे में पूछा तो मैंने उनको लिखा, 'प्रशिक्षण कार्यक्रम हो जाने दीजिए, उसके बाद जो उचित लगे, दे दीजिएगा.' 

'दो दिवसीय अधिकारी  प्रशिक्षण कार्यक्रम' के लिए मैं शिवपुरी पहुंचा, मुझे वहां के शानदार रिसोर्ट में ठहराया गया. कार्यक्रम के पहले चेयरमेन ने मुझे बताया, 'हमारा बैंक घाटे में चल रहा है. हमारे पास स्टाफ को केवल दो महीने की सैलरी देने लायक फंड बचा है. इस संस्था के प्रमुख होने के नाते मेरा फ़र्ज़ है कि मैं बैंक को इस हालत से निकालूँ. इसके लिए मुझे लगा कि यदि अधिकारियों को प्रोत्साहित किया जाए तो बात बन सकती है. मेरा ट्रेनिंग पर बहुत भरोसा है, इसीलिए आपको यहाँ बुलाया है.' मैंने कहा, 'मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूँगा.'

उस प्रशिक्षण कार्यक्रम का विवरण मेरी आत्मकथा 'पल पल ये पल' में वर्णित है, उसे आप यहाँ पढ़िए : 

"शिवपुरी में ग्रामीण बैंक के अधिकारियों का प्रशिक्षण दो दिनों तक नगरपालिका के सभागार में चला जिसमें उन्हें उत्साहित करने के लिए नेतृत्व क्षमता विकास, संप्रेषण, समूह में मिल-जुल कर कार्य करने के रहस्य और उत्प्रेरणा जैसे विषयों पर गहन चर्चा हुई. पहले ग्रामीण बैंक ‘कमर्शियल’ लेन-देन के लिए अधिकृत नहीं थे, उन्हें केवल ग्रामीणों को बैंक से जुड़ने, नकद जमा करने और ॠण लेने के लिए प्रोत्साहित करने का कार्य करना था लिहाज़ा लाभप्रद लेन-देन के अभाव में वे घाटे से उबर नहीं पा रहे थे. इसके अतिरिक्त बैंक के अधिकारियों और उनके अधीनस्थों की निष्क्रियता भी बड़ी समस्या थी.

दूसरे दिन की एक घटना यादगार बन गई, हुआ यह, ‘लंच’ के बाद शिवपुरी के कलेक्टर श्री सार्खेल समूह को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किए गए थे. दरअस्ल ग्रामीण बैंक की गतिविधियां राज्य शासन की देखरेख में संचालित होती हैं इसलिए उस क्षेत्र के कलेक्टर की निगाह-ए-करम जरूरी हुआ करती है. भाषण आदि औपचारिकताओं के पश्चात जब कलेक्टर वापस जाने लगे तो मैंने उनसे अनुरोध किया- ‘दस-पन्द्रह मिनट रुकिए और प्रशिक्षण देख लीजिए.’ वे हिचकिचाए और कहा- ‘दस मिनट के लिए रुक जाता हूं.’ उनकी उपस्थिति में ‘अभिप्रेरणा’ विषय पर प्रशिक्षण शुरू हुआ.
         
मैं अभिप्रेरणा के आन्तरिक स्रोत के बारे में प्रतिभागियों को समझा रहा था- ‘ यह सच है कि आप लोग अत्यन्त प्रतिकूल परिस्थितियों में काम कर रहे हैं. अशिक्षित ग्रामीणों को समझाना और उन्हें बैंक तक लाना मुश्किल काम है, आपके पास तरीके का आफ़िस नहीं है, बिजली नहीं है, गांव की कीचड़ भरी सड़कों और खेतों पर आपको भटकना पड़ता है पर आपके पास ऐसे ‘पावर’ हैं जो कलेक्टर साहब के पास भी नहीं है.’ इसे सुनकर समूह उत्सुक सा हो गया. मैंने कलेक्टर की ओर देखा और उनसे पूछा- ‘सर, एक बात बताइए, आप यदि किसी व्यक्ति की पांच हजार रुपए की मदद करना चाहते हैं तो आपके पास कोई ‘डायरेक्ट पावर’ है क्या?’
‘नहीं, डायरेक्ट तो नहीं है.’ तनिक असहज होकर उन्होंने उत्तर दिया.
‘परन्तु सर, इस सभागार में जो लोग बैठे हुए हैं वे किसी भी ग्रामीण को पांच हजार से लेकर बीस लाख रुपए की मदद ॠण के माध्यम से तुरन्त देकर उनकी ज़िन्दगी में बदलाव ला सकते हैं, अब आप बताइए, आप ज़्यादा ‘पावरफ़ुल’ हैं या ये लोग?’  प्रश्न सुनकर कलेक्टर मुस्कुराए और दोनों हाथ समूह की ओर बढ़ाते हुए कहा- ‘ये लोग.’ सभागार में एक विद्युत शक्ति सी चमकी जो सबके मन-मष्तिस्क में प्रवेश कर गई, सबके चेहरे एक अनोखी ज्योति से दैदीप्यमान हो उठे. हमारे दो दिनों का परिश्रम जैसे एक उदाहरण में समाहित हो गया. 

सत्र डेढ़ घंटे चला, पूरे समय कलेक्टर उत्सुकता से देखते-सुनते रहे. जाते समय उन्होंने मुझसे कहा- ‘किसी दिन हमारे अधिकारियों के लिए भी एक प्रशिक्षण कर दीजिए.’
‘जब आप बुलाएंगे, आ जाऊंगा.’ मैंने उन्हें आश्वस्त किया.
          
कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद मुझे बतौर पारिश्रमिक एक लिफ़ाफ़ा मिला, साथ में अध्यक्ष की ओर से आभार और खेद प्रकटन भी- ‘सर, आपने हमारे लिए जो किया, हम उसका यथोचित मूल्य नहीं दे पा रहे हैं, कृपया इसे ही हमारी ओर से भेंट मानकर स्वीकार करिए.’ मैंने सहज भाव से उसे रख लिया और उनसे विदा ली.

अक्टूबर १९९३ में गुना के आस-पास पदस्थ अधिकारियों और कार्मिकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम गुना में आयोजित हुआ. उसके बाद उनके लिए स्थाई प्रशिक्षक तैयार करने हेतु जनवरी १९९४ में भी एक कार्यक्रम हुआ जिसमें मेरे मित्र प्रशिक्षक श्री राजेश दुआ भी साथ में गए. यानी, पांच माह में तीन कार्यक्रम, बल्ले-बल्ले !          

अप्रैल १९९४ में भोपाल में मध्यप्रदेश के सभी ग्रामीण बैंकों के अध्यक्षों का सम्मेलन हुआ जिसमें वर्ष भर की गतिविधियां और स्थिति-विवरण प्रस्तुत हुए. शिवपुरी-गुना ग्रामीण बैंक के अध्यक्ष ने वहां बताया- ‘इस वित्त वर्ष में हमें दो करोड़ से अधिक लाभ हुआ है.’ शेष अध्यक्षों के चेहरे आश्चर्य से भर गए, एक ने प्रश्न किया- ‘मि. बडवेलकर, अगस्त-सितम्बर में अफ़वाह थी कि आप स्टाफ़ को सेलरी नहीं दे पा रहे हैं, अभी आप दो करोड़ की प्राफ़िट बता रहे हैं, कोई जादू किया क्या?’
‘जादूगर बिलासपुर में रहता है.’ चेयरमेन श्री बडवेलकर ने बताया."

उसके कुछ दिनों बाद की बात है, मुझे कोरबा जेसीज़ में प्रशिक्षण देने का निमन्त्रण मिला. कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री आर॰के॰जायसवाल थे जो एन.टी.पी.सी. जमनीपाली (कोरबा) में मानव संसाधन विभाग के उपमहाप्रबन्धक थे. दो घंटे तक चले उस प्रशिक्षण कार्यक्रम का विषय था ‘मना करने की कला’ जिसे उन्होंने पूरे समय बड़े ध्यान से देखा-सुना और कार्यक्रम समाप्त होने के बाद मुझसे पूछा- ‘हमारे यहां प्रशिक्षण देंगे?’


‘अवश्य.’ मैंने कहा.

‘किन-किन विषयों में करते हैं?’

‘व्यवहार विज्ञान, प्रबन्धन और व्यक्तित्व विकास पर.’

‘क्या लेंगे?’

‘एक दिन के कार्यक्रम का दो हजार, ’

‘आपको छः दिन तक लगातार प्रशिक्षण देना होगा, प्रतिदिन सात घंटे.’

‘ठीक है, मंजूर.’

‘एक 'प्रपोजल' मुझे भेज दीजिए, मैं आपको ‘शिड्यूल’ भेजता हूं.’

‘जी.’ मैंने कहा.

यह छोटा सा वार्तालाप कालान्तर में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ. मुझे जमनीपाली (कोरबा) के इस संस्थान में तेरह वर्षों तक प्रशिक्षण देने का अवसर मिलता रहा. प्रशिक्षण शुल्क दो हजार से अढ़ाई हुआ फ़िर तीन और फ़िर पांच हजार प्रतिदिन. मैंने वहां लगभग दो सौ दिनों तक कार्यक्रम किए होंगे, कोई पचास-साठ विषयों पर प्रशिक्षण दिया और मज़े की बात- मैं वहीं एक नए विषय में पारंगत प्रशिक्षक बन गया- स्वास्थ्य प्रबन्धन!



प्रशिक्षण शुल्क तो भरपूर मिला वहां से लेकिन कुछ ऐसी उपलब्धियां भी मिली जो पैसे से ऊपर थी, एक उदाहरण बताता हूँ. वहां के किसी एक छः दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में एक ऐसे सज्जन प्रतिभागी थे जो वहां की यूनियन के पदाधिकारी थे. पहले दिन नेतृत्व और सम्प्रेषण पर प्रशिक्षण दिया, दूसरे दिन कार्य संस्कृति पर. कार्य संस्कृति विषय पर बात करते हुए मैंने काम करने वालों की तीन वर्गीकरण बताए थे, सक्रिय लोग. अर्ध सक्रिय लोग और असक्रिय लोग. वे सज्जन चूँकि यूनियन वाले थे इसलिए काम करने या न करने की छूट थी उन्हें. वे रोज सुबह दस बजे ड्यूटी पर जाते, अपनी उपस्थिति दर्ज करते, थोड़ी देर गपशप करते और फिर अपने घर वापस चले जाते थे. मेरे प्रशिक्षण के हिसाब से वे असक्रिय कर्मचारी की श्रेणी के थे. खैर, उस दिन का कार्यक्रम समाप्त होने के पश्चात् शेष प्रतिभागी चले गये. वे प्रशिक्षण कक्ष में ही रुक गये, मुझसे बोले, 'सर, आज रात को मेरे घर में खाना खाएंगे?' मैंने कहा, 'क्यों नहीं, आपका घर कहाँ है? वे बोले, 'आप उसकी चिंता न करें, आप समय बताएं, मैं आपको लेने मोटरसायकिल से आ जाऊंगा.' नियत समय पर वे आये और मुझे अपने घर ले गये.

घर पहुँच कर उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चे से मेरा आत्मीय परिचय कराया. उसके बाद मेरा जन्मदिन और जन्म समय पूछा. मैंने उन्हें बता दिया. वे एक डायरी निकाले और उसमें नोट कर लिया. कुछ देर गुणा-भाग करते रहे उसके बाद बोले, 'तो ये बात है.'

'क्या बात है?' मैंने पूछा.

'आपकी कुंडली में ऐसे योग हैं जो सामने वाले के मन को समझ जाता है और उसके मन को बदलने की शक्ति रखता है.'

'अच्छा, और?'

'आपके ऊपर लक्ष्मी और सरस्वती की अपार कृपा है.'

'इन दिनों तो लक्ष्मी जी मुझसे नाराज चल रही हैं, आर्थिक असुविधा से जूझ रहा हूँ.'

'ऐसा क्या?'

'जी हाँ.'

'कुछ समय की बात है, शनि की दशा ऐसी है कि आपको कष्ट है, कुछ समय बाद सब ठीक हो जाएगा.'

'फिर ठीक है.' मैंने कहा.

'आपके मन में यह प्रश्न उठ रहा होगा कि मैंने आपको भोजन पर घर क्यों बुलाया?' उन्होंने पूछा.

'नहीं तो, आपने बुलाया, मैं सहज भाव से चला आया, फिर भी, बता दीजिए.'

'मैंने आपको अपना एक अपराध को स्वीकार करने के लिए यहाँ बुलाया, सबके सामने बोलने की हिम्मत नहीं हो रही थी.'

'कैसा अपराध?'

'यही कि मैं अपनी सर्विस के साथ खिलवाड़ कर रहा था और यूनियन का सेक्रेटरी होने के कारण उसका अनुचित लाभ उठा रहा था. आज जब आपको सुना तब मुझे समझ में आया कि मैं ईमानदारी से ड्यूटी न करके अपना खुद का नुक्सान कर रहा था.'

'फिर क्या सोचा?'

'यही कि कल से मैं अपनी ड्यूटी पूरी करूंगा, मेरी आँखें खोलने के लिए आपका धन्यवाद.' यह कहते हुए वे झुके और मेरे पैर छू लिए. मैं बड़े संकोच में पड़ गया, मैंने उन्हें रोका, उन्हें उठाया तो देखा, उनकी आँखों में आंसू थे.



मुझे मेरे परिश्रम का मूल्य मिल चुका था.



मैंने शिवपुरी-गुना ग्रामीण बैंक और एनटीपीसी के अतिरिक्त स्टेट बैंक, दुर्ग-राजनादगांव ग्रामीण बैंक, दक्षिण-पूर्व रेलवे, कोल इण्डिया, एल एंड टी सीमेंट, रेमंड सीमेंट. एसोचेम नागपुर, हिंदुस्तान एयरोनाटिक्स लिमिटेड, नेहरू युवा केंद्र, उद्यमिता विकास केंद्र, छत्तीसगढ़ प्रशासनिक अकादमी जैसे अनेक संस्थानों में उनके अधिकारियों, कार्मिकों तथा अन्य प्रतिभागियों को लगभग पंद्रह वर्षों तक प्रबंधन, मानव व्यवहार विज्ञान तथा व्यक्तित्व विकास का सशुल्क प्रशिक्षण दिया. इनके अलावा जेसीज, कालेज, स्कूल और विभिन्न समाजसेवी संस्थाओं में अनेक कार्यक्रम निःशुल्क किए. इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों की अनेक घटनाएं याद आ रही हैं लेकिन उन घटनाओं को लिपिबद्ध करने के लिए एक नया अध्याय खोलना पड़ेगा इसलिए प्रशिक्षण की उन यादों को यहीं रोकता हूँ.



मधुछाया केंद्र और प्रशिक्षण का काम साथ-साथ चलता रहा, लगभग १७ वर्ष तक और उसके बाद श्री जगदीश लाज खुलने के बाद १३-१४ वर्ष तक. हजारों युवाओं, अधिकारियों और कार्मिकों को मार्गदर्शन देने का सौभाग्य मुझे इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों की वज़ह से मिला. इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने मुझे प्रशिक्षित किया क्योंकि किसी भी विषय पर कार्यक्रम प्रस्तुत करने के पहले जबर्दस्त पूर्व तैयारी करनी होती थी, पहले उस विषय से सम्बंधित पुस्तकों की खोज, उसके बाद उसे पढ़ना, फिर संक्षिप्त नोट्स तैयार करना, उसके 'गेम' खोजना या उसकी कल्पना करना, फिर उपस्थित समूह को देख-समझकर यह तय करना कि इन्हें किस तरीके, कौन सी बातें बताई जाएं ताकि विषय इनके मस्तिष्क में जैसा मैं चाहता हूँ, उतर जाए. इस सिखाने के चक्कर में मैं बहुत कुछ सीखता रहा जिसने मेरे व्यक्तित्व में नए ढंग का निखार पैदा किया. ऐसे-ऐसे लोगों से मिलने, उनसे बातचीत करने का अवसर दिया जिनसे मुलाक़ात की बात मैंने सपने में भी नहीं सोची थी. अद्भुत अनुभव था यह मेरे जीवन का. 

इसके पहले कि मैं आपको मधुछाया केंद्र के काम को समेटने और एक नया व्यवसाय आरंभ करने के बारे में बताऊँ, मैं उन दो व्यवसायों का जिक्र करना चाहता हूँ जिन्हें शुरू करने के लिए मैंने अपनी युवावस्था में अनथक प्रयास किए, लेकिन वे नहीं हो पाए।

सन १९६६ में मैंने कामर्स से ग्रेजुएशन किया, उसके बाद मैं हलवाई के धंधे से मुक्त होना चाहता था. मैं आई,ए.एस. करना चाहता था लेकिन पिता जी ने रोक लगा दी. उसके बाद मुझे यह समझ आया कि बिलासपुर में रहकर ही कोई व्यापार करना पड़ेगा इसलिए मैंने खोजबीन शुरू की. उन दिनों हमारे शहर में मेडिसिन की होलसेल के केवल दो संस्थान थे, एक, भावे रजब अली और दूसरा, एम.अकबर अली. मुझे इस क्षेत्र में अच्छी व्यापारिक संभावना नज़र आई इसलिए सबसे पहले ड्रग लायसेंस हासिल करने का काम करना था. उस समय आज जैसा नहीं होता था कि ड्रग-इन्स्पेक्टर की जेब गर्म करो, लायसेंस घर पहुँच जाएगा, बल्कि ड्रग-इन्स्पेक्टर की बहुत खुशामद और दौड़-धूप के बाद मिलता था. तीन-चार महीने के मेरे प्रयास सफल हुए और मुझे 'जगदीश मेडिको' के नाम से लायसेंस मिल गया. अब व्यापार शुरू करने के लिए पूँजी की ज़रुरत थी, मैंने पिताजी से दस हजार रुपयों के लिए कहा, वे राईस मिल चलाते थे, नगर सेठ कहलाते थे, लेकिन उन्होंने कहा, 'मेरे पास पैसा नहीं है.' अब मैं कहाँ से पैसा लाता? इस प्रकार वह प्रयास निष्फल सिद्ध हुआ.

सन १९८० की बात है, मेरे मन में आइसक्रीम का आटोमेटिक प्लांट शुरू करने की बात आई. चूँकि मेरी दुकान में आइसक्रीम की भरपूर बिक्री हो रही थी, मुझे उस व्यवसाय की सभी भीतरी बातें ज्ञात हो रही थी. बस, एक छोटे व्यापर को बड़ा रूप देने की जरूरत थी. आटोमेटिक प्लांट में उत्पादन अधिक मात्रा में होता इसलिए बिलासपुर के आसपास स्थित स्टील बेल्ट अर्थात टाटानगर से भिलाई तक आइसक्रीम के पार्लर खोलने की योजना मेरे दिमाग में थी. बिलासपुर उद्योग केंद्र में 'मधु मधुर उद्योग' के नाम से पंजीयन हो गया, तिफरा औद्योगिक प्रक्षेत्र में ५००० वर्गफुट का प्लाट आबंटित हो गया, केनेरा बैंक से १५ लाख का ऋण के लिए पेपर्स आगे बढ़ गए, मेरे एक मित्र इस ऋण के लिए गेरेंटी देने के लिए तैयार हो गये. इस बीच मैंने बम्बई, नागपुर और इंदौर जाकर वहां की आइसक्रीम फेक्ट्री देखी, उनसे व्यापार की बारीकी समझी, आइसक्रीम बनाने की आधुनिक तकनीक सीखी. काफी आगे बढ़ गया था मैं उस प्रोजेक्ट में लेकिन बैंक ने एक तकनीकी कमी निकाल दी, पूँजी की लागत में मैंने सारा पैसा दोस्तों और रिश्तेदारों से लिया हुआ बताया जबकि बैंक का कहना था कि आपकी अपनी खुद की पूँजी होनी चाहिए. मेरी पूँजी थी लेकिन वह पिताजी के कब्जे में थी, हिसाब-किताब उनके पास रहता था. मैंने उनसे पूँजी की एंट्री माँगी, उन्होंने देने से इंकार कर दिया इस प्रकार उस 'मधु मधुर उद्योग' की असमय भ्रूण हत्या हो गयी. आप सोचिए, आज आप शहरों में जो आइसक्रीम के पार्लर देख रहे हैं, उसकी कल्पना मैंने सन १९८० में की थी. वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है, मेरे खुदा मेरे पिताजी जो थे, क्या करें, जो करना था उन्होंने किया.

१९९९ में पिताजी ने बंटवारा किया, उसमें मुझे लॉज मिली, श्री जगदीश लॉज. ४० कमरों का बड़ा लॉज था, शहर के मुख्य मार्ग सदरबाजार में. १ नवंबर १९९९ को आरम्भ हुआ. होटल व्यवसाय उन दिनों मंदी के दौर से गुजर रहा था, बिलासपुर जिला छोटा हो गया था इसलिए आसपास के जिले के जो लोग बिलासपुर आते थे, उनका यहाँ आना-जाना कम हो गया था. शुरुआती समय तो सन्नाटा रहा, मुश्किल एक-दो कमरे लगते थे, लेकिन पूरी तरह से खाली कभी नहीं रहा. इस बीच, जब मैं एनटीपीसी जमनीपाली (कोरबा) में प्रशिक्षण देने गया था, एक ग्राहक आये, जोसेफ नाम था उनका, पेट्रोल पम्प की स्थापना का काम करते थे. उन्होंने एक ट्रिपल रूम लिया जिसका किराया १५०/- प्रतिदिन था. वे लगभग दो साल तक हमारी लॉज में नियमित रूप से रहे, उनके अकेले के कारण हमारी लॉज का बिजली बिल आराम से पटता रहा. बाकी कमरों से हमें मिलने वाले किराए से स्टाफ का खर्च और हमारे परिवार का खर्च चलता रहा. माधुरी जी भी लॉज आती थी, एक दिन उन्होंने मुझसे पूछा, 'शहर के बीचो-बीच मेन रोड में अपना लॉज है, लोगों को दिखाई नहीं देता क्या?' मैंने उन्हें समझाया, 'चीन में बांस की एक प्रजाति होती है, जिसका कंद जमीन में बोने के बाद, दो साल के इंतज़ार के बाद एक फुट का पौधा होता है. तीसरे साल वह बढ़ना शुरू करता है और चौथे साल वह चालीस से पचास फुट का हो जाता है, अभी धैर्य धारण करो, एक दिन आएगा जब यह वृक्ष भी उसी तरह बढ़ेगा.' और, वैसा हुआ भी, धीरे-धीरे हमारे लॉज की ख्याति बढ़ी और वह बढ़िया चलने लगा. इन पंक्तियों के लिखे जाने के समय लॉज का बाईसवां वर्ष चल रहा है. मेरे पिताजी ने मुझे मेरे परिवार की सेवा के पुरस्कार स्वरुप लॉज के रूप में बेहतर संपत्ति प्रदान की जो मेरी उम्र और स्वभाव के अनुरूप है, परिश्रम कम, आय अधिक. मेरी दाल-रोटी अच्छी चल रही है, साथ में एक चम्मच घी की भी व्यवस्था हो जाती है.

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