तेरी मेरी कहानी है
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आखिर क्यों ?
जो आया है यहाँ, वह एक संभावना लेकर आया है। संभावना का बीज उसकी भावना से जुड़ा हुआ है। भावना उसकी शिक्षा-दीक्षा और संग-साथ से जुड़ी हुई है। भावना उसे संभावनाओं के शिखर तक ले जाती है या फिर किसी गहरी खाई में धकेल देती है। कुछ ऐसे होते हैं जिनमें कोई संभावना नहीं होती लेकिन वे बहुत कुछ कर गुजरते हैं, वहीं पर कुछ ऐसे होते हैं जिनसे उम्मीद होती है लेकिन वे भटक जाते हैं और अवसाद में घिर कर खुद को नष्ट कर लेते हैं।
समाज सबको एक जैसा सिखाता है, परिवार में सबको सकारात्मक प्रेरणा मिलती है लेकिन युवावस्था में होने वाली घटनाओं का मनुष्य के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह सर्वमान्य है कि सही दिशा में किया गया प्रयास सुफल देता है लेकिन उस दिशा को पहचानना और लक्ष्य की ओर चल पड़ना, सबको नसीब नहीं होता। सब ओर कड़ी प्रतिस्पर्धा से सामना है, अनेक पारिवारिक, आर्थिक और सामाजिक अवरोध होते हैं राह पर। किसी का दिमाग तेज है तो शरीर सुस्त, किसी का शरीर चुस्त है तो दिमाग सुस्त लेकिन तरक्की तो सब को चाहिए क्योंकि यही जीवन का आधार है। कोई हारना नहीं चाहता लेकिन हार जाता है, जीतना चाहता है लेकिन जीत नहीं पाता। हालत ऐसी होती है जैसे किसी के हाथ-पैरों को रस्सी से बांधकर उसे विशाल समुद्र की लहरों में तैरने के लिए फेंक दिया गया हो।
यह कथा संग्रह 'तेरी मेरी कहानी है' उन्हीं चुनौतियों की गाथा है जो अपने जीवन में हारते-हारते जीत गए।
समाज सबको एक जैसा सिखाता है, परिवार में सबको सकारात्मक प्रेरणा मिलती है लेकिन युवावस्था में होने वाली घटनाओं का मनुष्य के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह सर्वमान्य है कि सही दिशा में किया गया प्रयास सुफल देता है लेकिन उस दिशा को पहचानना और लक्ष्य की ओर चल पड़ना, सबको नसीब नहीं होता। सब ओर कड़ी प्रतिस्पर्धा से सामना है, अनेक पारिवारिक, आर्थिक और सामाजिक अवरोध होते हैं राह पर। किसी का दिमाग तेज है तो शरीर सुस्त, किसी का शरीर चुस्त है तो दिमाग सुस्त लेकिन तरक्की तो सब को चाहिए क्योंकि यही जीवन का आधार है। कोई हारना नहीं चाहता लेकिन हार जाता है, जीतना चाहता है लेकिन जीत नहीं पाता। हालत ऐसी होती है जैसे किसी के हाथ-पैरों को रस्सी से बांधकर उसे विशाल समुद्र की लहरों में तैरने के लिए फेंक दिया गया हो।
यह कथा संग्रह 'तेरी मेरी कहानी है' उन्हीं चुनौतियों की गाथा है जो अपने जीवन में हारते-हारते जीत गए।
बिलासपुर (छत्तीसगढ़) द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
०१. ०६. २०२१
जीवन की उजाले और अँधेरे पर उठती डुबती नैया को पार लगाने की जद्दोजहद जैसे विषय पर उद्धृत् कहानी का रोचक प्लॉट को पढ़ते हुए पाठक मंत्रमुग्ध हो जाएँगे
ReplyDeleteशुक्रिया मित्रवर।
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