किस्सा सुखनंदन का :
छत पर बारिश की बूंदे झमाझम बरस रही हैं। पानी ढलान की ओर बहता हुआ अपने गंतव्य की ओर जा रहा है। पहले नाली, फिर नाला, फिर नदी और फिर न जाने कहाँ। कुछ हवा सोख लेती है तो कुछ जमीन पी लेती है, उसमें से कुछ अपने आँचल में छुपा कर रख लेती है ताकि बाद में जरूरतन काम आए। धरती में पानी के संग्रहण का अपना विज्ञान है जो लंबे समय तक तल में सुरक्षित रहता है और जरूरतमंद को सहर्ष देते रहता है।
छत्तीसगढ़ में वर्षाऋतु का अलग रंग होता है। रह-रहकर बरसता है और भरपूर बरसता है। बारिश के दिनों में हरियाए धान के खेत ऐसे लगते हैं जैसे धरती पर मखमली कालीन बिछी हो। जब हवा चलती है तो धान के पौधे ऐसे झूमते हैं जैसे योगाभ्यास कर रहे हों। खेत खेत नहीं, नन्हें-नन्हें तालाब बन जाते हैं जो पौधों की तीव्र प्यास को अनवरत बुझाते हैं। हफ्ते-दो हफ्ते अगर पानी न गिरा तो भी कोई फिक्र नहीं, मेघ जब बरसेंगे तब बरसेंगे, तब तक धरती के पास अपने नवजात शिशु को नवप्रसूता माँ की तरह दुग्ध-पान कराने का अजस्र भंडार सुरक्षित रहता है। धान के पौधों को जितना पानी चाहिए, उतनी धूप भी। सूर्य भी बादलों को भेदकर धरती में पसर जाता है और पौधे मुस्कुराने लगते है, किसान का मन-मयूर नाचने लगता है। हर सुबह वह अपने खेत को उस तरह देखने जाता है जैसे नव-ब्याहता के मुखड़े को उसका अति-आतुर पति झाँकता है। लगभग सौ दिनों की घूँघट दिखाई के बाद जब फसल तैयार होती है तो श्रम की बूंदें ता-थई-थई करती हुई नृत्य करती हैं और किसान अपने घर के साल भर का अनाज, अगली फसल के लिए बीज, घरवाली का इलाज, बच्चों की शादी, दीवाली और एकादशी के लिए कपड़े और ऋण पटाने या ऋण का ब्याज पटाने का गणित हल करने की कोशिश करता है। कुछ दिनों में उसे समझ आ जाता है कि उसे गणित नहीं आता, केवल परिश्रम करना आता है। जो उसे आता है, उसे उसने कर दिया; जो नहीं आता उसका वह क्या करे?
हमारी हर सांस गिनती की है, हर क्रिया का निश्चित परिणाम है। सब जोड़-घटाना है लेकिन जीवन के गणित में अंक गणित जैसे निश्चित परिणाम नहीं आते और जब कुछ का कुछ हो जाता है तो दिमाग घूमने लगता है। बहुत से होशियार गणित करने में खुद को सिद्ध समझते हैं लेकिन जब समय अपना आदेश-चक्र चलाता है तो वे धूल चाटते नज़र आते हैं। बहस हो सकती है कि सफलता-असफलता समय के हाथ में है लेकिन कुछ हमारे हाथ में भी है।
एक शिशु जब इस धरती में अवतरित होता है तो जयघोष करते हुए आता है। रुदन वह जयघोष है जो विश्व को बताता है कि एक नयी संभावना ने पृथ्वी में जन्म ले लिया है। रोने की आवाज़ शिशु की माँ के कानों से होती हुई स्तन तक पहुँचती है और उष्ण दुग्ध के माध्यम से शिशु के रक्तकणों में प्रविष्ट हो जाती है जिसका प्रभाव आजीवन रहता है। सवाल यह है कि यह जयघोष जीवन भर जय-पराजय के बीच क्यों झूलता है?
झामुलाल की बात बताता हूँ, कृषक परिवार है। पारिवारिक बँटवारे में तीन एकड़ जमीन मिली। घर खाने के लिए अनाज मिल जाता है लेकिन कुछ खास बचत नहीं होती। घर में बूढ़े माँ-बाप हैं। पत्नी है शांति, पाँच बच्चे हैं, चार लड़कियां, एक लड़का। जब बच्चे थे तब बच्चे थे, अब बढ़ रहे हैं तो उन्हें बच्चे कहने में संकोच होता है लेकिन उन्हें बच्चे न कहें तो क्या कहें? चारों बेटियाँ बड़ी हैं, गाँव की स्कूल में आठवी तक पढ़ ली, आगे पढ़ने का स्कूल नहीं है इसलिए उनका विवाह झामुलाल की चिन्ता का कारण बन गया। कुछ पैसा जुड़ जाए इसके लिए उसने घर के बाहर परछी में कपड़े सिलने वाली मशीन लगा ली, छिट-पुट काम मिलने लगा। शांति भी सिलाई सीख गयी, थोड़ी मदद हो गयी।
एक दिन की बात है, शांति कपड़े की कटिंग कर रही थी, झामुलाल सिलाई कर रहा था, शांति ने कहा, "शादी की बात कहीं चला रहे हो?"
"अभी तो मशीन चला रहा हूँ।"
"वो तो मुझे भी दिख रहा है लेकिन शादी की बात चलाते नहीं दिख रहे हो।"
"क्या करूँ? हाथ में कुछ पैसा हो तो हिम्मत आए।"
"चार-चार लड़कियां हैं, बस, बैठो रहो और पैसे का रास्ता देखो।"
"अरे, मैं बैठा हूँ क्या? खेत का काम करता हूँ, घर में मशीन चला रहा हूँ, तुमको दिखता नहीं?'
"मैंने कब कहा कि तुम कुछ नहीं कर रहे हो? मैं देख रही हूँ तुमको, दिन-रात मेहनत करते हो लेकिन मैं लड़कियों की माँ हूँ, मुझे चिंता होती है। सरिता सोलह साल की हो गयी, उसके पीछे तीन और हैं जो मुनगा के पेड़ की तरह बढ़ रही हैं। एक-एक करके विदा करना पड़ेगा न?"
"बात तुम्हारी ठीक है। इस साल पानी अच्छा गिरा है। धान अच्छा होगा तो कुछ बचत हो सकती है। इस ठंड में सरिता को निपटाते हैं।"
"कहीं बात चलाए हो?"
"एक लड़के का पता चला है, सक्ती में है। जाकर देखता हूँ, कैसा है, फिर उसके बाप से बात करूंगा।"
"कब जाओगे?"
"पाँच-सात दिन में।"
"कल क्यों नहीं जाते?"
"कल क्यों?"
"कल अच्छा दिन है। शुभ काम शुरु करने के लिए बृहस्पत का दिन अच्छा होता है।" शांति ने बताया।
"ठीक है, कल सुबह निकल जाता हूँ। सिलाई का बचा हुआ काम तुम निबटा लेना। कल शाम को कपड़ा सिलकर देना जरूरी है, मैं झूठा न बन जाऊँ।" झामुलाल ने चेताया।
अगली सुबह बस में बैठा हुआ झामुलाल अपने अतीत में खो गया जब उसे पुलिस विभाग में नौकरी मिल गयी थी और वह पुस्तैनी खेती-बाड़ी का काम छोड़कर एक नयी ज़िंदगी की शुरुआत करने वाला था। पुलिस की खाकी ड्रेस, रुवाबदार कड़क आवाज उसे बहुत लुभाती थी। उसका सुहाना सपना सच होने जा रहा था।
अपना नियुक्तिपत्र लेकर वह अपने जिगरी दोस्त लखनलाल के पास पहुंचा, "लखन, मेरा पुलिस में हो गया।"
"सच?" लखनलाल ने पूछा।
"ये लेटर देख।"
"वाह, बधाई हो। कब जाएगा, कहाँ जाना है?"
"परसों निकलूँगा, बिलासपुर आफिस में रिपोर्ट करना है। फिर वो जहां तैनात करें।"
"भाभी और बच्चे?"
"वहाँ जाकर देखता हूँ, क्वार्टर मिल गया तो ले जाऊंगा, नहीं तो ये लोग यहीं रहेंगे, मैं छुट्टी लेकर बीच-बीच में आया करूंगा।"
"अकेले रह लेगा वहाँ?"
"रहना पड़ेगा, नौकरी में सब सहना पड़ता है। यहाँ परिवार के साथ हूँ तो कौन सा तीर मार रहा हूँ?"
"तीनों भाई नौकरी करेंगे तो यहाँ का क्या होगा?"
"दोनों मज़े में हैं, नौकरी में चले गए, अपना परिवार भी ले गए। मैं यहाँ अकेला खट रहा हूँ। इधर दाई-ददा को देखो, उधर खेती देखो। सुबह से रात तक चैन नहीं रहता, फिर गुजारा भी ठीक से नहीं होता।"
"ये बता, तू गाँव छोड़ देगा तो तेरे दाई-ददा को कौन देखेगा?"
"जब भाई लोग नहीं सोच रहे हैं तो मैं अपना दिमाग क्यों लगाऊँ?"
''चलो मान लिया कि वो ज़िम्मेदारी नहीं समझते लेकिन तुझे तो सोचना चाहिए।"
"तू क्या चाहता है कि मैं नौकरी में न जाऊँ, यहीं रहूँ ?"
"ये मैंने कब कहा? मैं यह पूछ रहा हूँ कि जो यहाँ हैं, उनका क्या होगा? उनकी इस उम्र में कोई तो देखने वाला होना चाहिए। तुम सब यहाँ से चले जाओगे तो खेती की जमीन भी हाथ से निकल जाएगी। आसपास वाले हर समय जमीन हथियाने के ताक में रहते हैं।"
"जाए तो जाए, अकेली मेरी तो नहीं जाएगी, सब भाइयों की जाएगी।"
"क्या हो गया है तेरे दिमाग को? धरती हमारी माँ है, हमारा पेट भरती है। पुलिस में जाने के लिए तू अपनी माँ और परिवार को बेसहारा छोड़ कर जा रहा है?"
"तो क्या करूँ?"
"अपनी ज़िम्मेदारी को समझ और यहीं गाँव में रह।"
"और, पुलिस की नौकरी?"
"तेरे लिए नहीं है, छोड़ उसको। यहाँ तेरा अपना काम है, तू खुद मालिक है। वहाँ क्या साहबों की जी-हुज़ूरी हो पाएगी तुझसे?"
"पर पुलिस का काम अच्छा है, रुआब रहता है?"
"क्या करेगा पुलिस में जाकर? थाना मिलेगा तब न पब्लिक पर रौब गांठेगा। कहीं किसी बड़े साहब के घर में ड्यूटी लग गयी तो उसके बच्चे की टट्टी वाली चड्डी धोना, साहबिन की डांट खाना, बंगले में झाड़ू लगाना, किचन में खाना बनाना या बगीचे में पौधे खोंसना। कर लेगा तू? कोई पुलिस कप्तान बनकर नहीं जा रहा है, सिपाही बन कर जा रहा है। साहबों का रौब सहते तेरी ज़िंदगी गुजर जाएगी तब कहीं जाकर मुश्किल से हवलदार बन पाएगा।"
"तू डरा रहा है यार मुझे।"
"मैं तुझे सही बात समझा रहा हूँ, मेरी बात मान, छोड़ पुलिस की नौकरी का चक्कर और यहीं रह। लखनलाल ने समझाया। झामुलाल सोच में पड़ गया। बोला, "तेरी बात में दम है, शांति से बात करता हूँ, वो क्या कहती है।"
"लखन भैया सही कह रहे हैं। मैं कहती तो तुमको समझ नहीं आता। यहीं घर में रहो, जो भगवान देगा, हमें मंजूर है।" शांति ने कहा।
"तुम भी लखन की तरफ हो गयी।" झामुलाल भन्नाया।
"तरफदारी की बात नहीं है, समझदारी की बात है। दो बूढ़े हैं घर में, उनके तीन-तीन लड़के हैं, तीन बहुएँ हैं और वे अकेले रहेंगे?"
"बाकी दो की भी तो कोई ज़िम्मेदारी है कि नहीं?"
"उनकी छोड़ो, ये बताओ कि तुम्हारी ज़िम्मेदारी क्या है?"
"मैं पूछता हूँ, उनकी ज़िम्मेदारी क्या है?"
"मैं पूछती हूँ, तुम्हारी ज़िम्मेदारी क्या है?"
"मेरे जिम्मदारी तुम हो, बच्चे हैं।"
"माँ-बाप नहीं हैं तुम्हारी ज़िम्मेदारी?"
"हैं।"
"तो फिर निभाओ न।"
"मतलब तुम लखन की तरफ हो गयी?"
"लखन भैया बीच में कहाँ से आ गए? घर की, खेत-खार की और बाल-बच्चों की ज़िम्मेदारी हम दोनों की है, इसको निभाना चाहिए। फिर मैं हूँ न तुम्हारा साथ देने के लिए।" शांति ने समझाया।
झामुलाल चुप होकर सोचने लगा। वह धर्मसंकट में फंस गया, हाथ में आयी नौकरी हाथ से जा रही थी, अगर नौकरी में चला गया तो ज़िम्मेदारी जा रही थी। झल्लाकर बोला, "ले न भात राँध, अउ पताल के चटनी मां बने मिरचा पीस देबे, मोर रोये के मन होवत हे।"
"टिकट?" बस कंडक्टर की आवाज़ सुनकर झामुलाल चौंका। जेब से पैसे निकालकर दिये। टिकट में कुछ गोदा-गादी थी जिसे कंडक्टर ही समझ सकता था, उसे जेब में रख लिया और चलती बस के बाहर देखने लगा। बस थोड़ी दूर आगे बढ़ती, फिर रुक जाती, रास्ते में मिल रही सवारी को बस में लेने के लिए। सामने वाली सीट पर एक बूढ़ा आदमी बीड़ी पी रहा था और खाँसते जा रहा था। मन हुआ कि उसे डांट पिलाई जाए लेकिन 'क्या फायदा' सोचकर चुप रहा गया और उसकी बीड़ी बुझने का इंतज़ार करता रहा.
बाबू भी बहुत बीड़ी पीता है। एक दिन बाबू की बीड़ी चुराकर मैंने भी एक सुट्टा मारा था, इतनी ज़ोर की खांसी आयी, लगा, सांस उखड़ जाएगी, उस दिन से कान पकड़ लिया। अब तो उसके धुएँ की गंध से भी नफरत हो गयी। कोई पीता है तो चिढ़ होती है लेकिन क्या करोगे? जब बाबू को मना नहीं कर पाता तो दूसरे को कैसे मना करेगा?
शांति कहती है, "बाबू का ख्याल रखा करो, उनसे मेहनत का काम मत लो, आराम करने दो। ज़िंदगी भर काम किया है, अब तुमको संभालना चाहिए, है कि नहीं?" बात तो ठीक कहती है लेकिन बाबू की आदत है, बिना काम किए रह नहीं सकता। सूरज उगने के पहले खेत चला जाता है और वहाँ बैठकर धान के पौधों के साथ खुसुर-फुसुर बात करते रहता है। पौधे क्या बाबू की भाषा समझते होंगे? हो नहीं सकता लेकिन जब तक फसल पककर तैयार नहीं होती, तब तक कुछ तो उनके बीच बात होती है। एक दिन बाबू से हिम्मत करके पूछा, "का गोठियाथस ओखर लंग ?" बाबू मुस्कुरा के चुप हो गया।
जरूर कोई बात है जो मुझे अभी समझ में नहीं आ रही है पर कभी तो आएगी। मेरे से ज्यादा समझदार शांति है, कह रही थी कि पौधे मन की भाषा समझते हैं, उनको प्यार से देखो तो वे खिल उठते हैं, हरे-भरे हो जाते हैं। यहाँ, आदमी आदमी की बात नहीं समझता, पौधे कैसे समझ जाएंगे? दोनों भाइयों को कितना समझाता हूँ कि अच्छी नौकरी में लगे हो, कुछ यहाँ घर में मदद किया करो लेकिन उनका रोना ही खत्म नहीं होता। कहते हैं, शहर में खर्चा ज्यादा है, हमको नहीं पूरता, घर कैसे भेजें? स्वार्थी हैं, अपना-अपना घर भर रहे हैं और हमारे सामने टेसुवा बहाते हैं। जमीन का बंटवारा हुआ तो यहाँ जमकर बैठ गए और जब तक जमीन उनके नाम नहीं चढ़ी, तब तक पटवारी के पीछे लगे रहे। उनका नाम चढ़ा और घर-द्वार, बाबू-दाई सब बेगाने हो गये।
इधर अपनी खेती मैं देखूँ, उधर उनके खेत को भी ताकूँ। चार लड़कियां हैं, उनको ब्याहना है, उनको भी सोचना चाहिए तो उनके रंग-ढंग ऐसे हैं जैसे हम लोग एक मां की संतान नहीं हैं। मुझे लगता है कि शांति को दुनियादारी समझ में नहीं आती और मुझे भी कुछ करने नहीं देती। बढ़िया पुलिस की नौकरी में जा रहा था, उल्टा-सीधा समझा दिया मुझे, हाथ से नौकरी निकल गयी और यह बेगारी आ गयी, करो सबकी सेवा। शांति की बात मानने से कोई फायदा नहीं है, अब उसकी बात नहीं मानूँगा, खुद निर्णय लूँगा लेकिन मुश्किल यह है कि उसकी सलाह के बिना मैं कैसे निर्णय लूँगा?
बस सक्ती के बस स्टैंड पर रुकी। झामुलाल बस से उतर कर लड़का देखने के लिए आगे बढ़ गया।
* * * * *
लड़का अपने बाप की कपड़े की दूकान में साथ में बैठता है। दूकान छोटी है लेकिन माल भरा हुआ है। छोटी बस्ती में बिकने वाला सामान है, जैसे, लुगरा, धोती, गमछा, मच्छरदानी, छाता आदि। झामुलाल जब दूकान पहुंचा तो बाप-बेटा दोनों वहीं मिल गए। झामुलाल ने जब अपने आने का कारण बताया तो लड़के के पिता ने उसे चाय लेने के लिए भेज दिया। दोनों की बातचीत शुरू हुई।
'मेरी लड़की है, सबसे बड़ी है, शादी लायक है। मेरी इच्छा है कि वह आपके घर की बहू बने।' झामुलाल ने कहा।
'बहुत खुशी की बात है। कौन गाँव में रहते हो और कौन-कौन हैं घर में?' लड़के के पिता पुन्नीराम ने पूछा।
'किरारी में। साथ में दाई और ददा हैं, पत्नी और पाँच बच्चे हैं, चार लड़कियां और एक सबसे छोटा लड़का।'
'क्या करते हैं?'
'खेती-बाड़ी है और घर में कपड़े भी सिलता हूँ।'
'ठीक है, हम लोग आपके घर आते हैं, लड़की देखकर तय करेंगे।' पुन्नीराम ने कहा। इतने में चाय आ गयी। दोनों ने चाय पी और झामुलाल ने विदा ली और बसस्टेंड आ गया। लड़का दिखने में ठीक लगा, सरिता के हिसाब से सही था। 'यह रिश्ता हो जाता तो अच्छा हो जाता।' मन ही मन में झामुलाल ने सोचा।
दसवें दिन पुन्नीराम लड़की देखने आए. लड़की पसंद आ गयी. विवाह तय हो गया. एक माह बाद का मंडप तय हुआ. बारात आयी, विवाह हुआ, सरिता अपनी ससुराल चली गयी. सरिता का सबसे छोटा भाई सुखनंदन उस समय कक्षा आठ में पढ़ रहा था. यह उसकी पढ़ाई का आखिरी साल था क्योंकि गाँव में आठवीं से ऊपर की पढ़ाई नहीं थी. हाई स्कूल पढ़ने के लिए गाँव से बाहर जाना पड़ता, झामुलाल आर्थिक रूप से इतना समर्थ न था कि वह सुखनंदन को कहीं बाहर पढ़ने भेज सके इसलिए सुखनंदन को आगे खेती का काम संभालना तय था।
सुखनंदन पढ़ाई में तेज था, क्लास में सबसे अधिक नंबर पाने वाला विद्यार्थी था लेकिन भुवन पटेल से उसका मुक़ाबला रहता था। भुवन एक साल पहले ही किरारी आया था, उसके पिता दीनानाथ पटेल की नियुक्ति पटवारी के पद पर हुई थी। स्कूल में यद्यपि दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा थी लेकिन दोनों अच्छे दोस्त थे। एक दूसरे से प्यार करते थे और मदद भी। उधर दीनानाथ और झामुलाल की भी आपस में बहुत पटती थी। झामुलाल की लड़की के विवाह में दीनानाथ ने बहुत मदद की थी। दोनों की रोज मुलाक़ात होती, दुनिया भर की बातें होती। एक दिन सुखनंदन के बारे में बात चली।
'क्या सोचे हो सुखनंदन के बारे में?' दीनानाथ ने पूछा।
'क्या सोचना है? झामुलाल ने उलट कर प्रश्न किया।
'उसकी आगे की पढ़ाई के बारे में?
'बस, आठवीं तक पढ़ेगा।'
'सुखनंदन बहुत होशियार है, ऐसा भुवन बता रहा था। उसको आगे पढ़ाना चाहिए।'
'बात तो ठीक है तुम्हारी लेकिन मेरी हालत तुमसे छुपी तो नहीं है। किसी प्रकार से अपनी गृहस्थी चला रहा हूँ। तीन लड़कियां और बची हैं, जिनका ब्याह करना है। घर में आठ लोग खाने वाले हैं, मैं अकेला कमाने वाला हूँ। सुखनंदन को बाहर भेज कर पढ़ाने का खर्च बहुत होगा, मेरे से नहीं हो सकेगा।'
'मैं सब जानता हूँ लेकिन सुखनंदन को आगे पढ़ाना चाहिए।'
'कैसा करूँ, तुम बताओ?'
'मेरी बात सुनो, मैं भुवन को बिलासपुर भेज रहा हूँ, आगे पढ़ने के लिए। सुखनंदन भी उसके साथ जाएगा, उसके साथ रहेगा और पढ़ेगा।'
'और उसका खर्च कौन उठाएगा?'
'मैं उठाऊंगा।'
'तुम क्यों उठाओगे?'
'क्योंकि सुखनंदन मुझे भुवन जैसा लगता है, अपना बेटा सा लगता है।' दीनानाथ ने कहा। झामुलाल की आँखों में आँसू आ गए, वह कुछ बोल न सका, उसका गला रुँध गया।
तो, उस शाम की बातचीत में भुवन के साथ सुखनंदन का गाँव से बाहर जाकर पढ़ना तय हो गया।
झामुलाल के भाई सर्विस में थे, शहरों में रहते थे, उनके बच्चे शहर की स्कूलों में पढ़ रहे थे लेकिन उन्हें अपने भाई के बच्चे को अपने साथ रखकर पढ़ाने का विचार नहीं आया। झामुलाल गाँव में रहकर बूढ़े माँ-बाप की सेवा कर रहा था, ज़मीनों के देखरेख कर रहा था लेकिन उसका कोई उपकार मानने को तैयार न था। वहीं पर एक दोस्त ने सुखनंदन के गुण को पहचाना और उसे आगे पढ़ाने का बीड़ा उठाया। इस दुनिया में ऐसा देखा गया है कि दिल के रिश्ते खून के रिश्तों से ज़्यादा कारगर सिद्ध हुए हैं।
समय बीतता गया। आठवीं कक्षा का रिजल्ट आया। भुवन ने सर्वोच्च अंक प्राप्त किए, दूसरी वरीयता में सुखनंदन था। उसके बाद गर्मियों की छुट्टियाँ चली और एक दिन सुखनंदन के घर छोड़ कर जाने का दिन आ गया। सुखनंदन की माँ सुबह से रो रही थी। चौदह साल का लड़का घर छोड़ कर बाहर जा रहा है। कहाँ रहेगा, क्या खाएगा? कौन देखरेख करेगा? एक तो वह एकदम सीधा-सादा लड़का है, बात कम करता है, बाहर की दुनिया का कैसे सामना करेगा? रात को सोता है तो इसको ठंड का भी पता नहीं रहता, घुटने सिकोड़ कर पड़ा रहता है, रात को मैं इसको चादर ओढ़ाती हूँ। वहाँ तबीयत खराब हो जाए, कौन देखेगा?
यहाँ क्या तकलीफ है, रहे हम सबके साथ। यहाँ रहेगा तो कम-से-कम हमारी आँखों के सामने रहेगा। क्या रखा है पढ़ाई-लिखाई में? पढ़ लेगा तो हमेशा के लिए हमसे दूर हो जाएगा। भगवान ने एक लड़का दिया है, रहे, यहीं पास रहे लेकिन पढ़ाई के चक्कर में फंसा रहे हैं इसको, पता नहीं, इन लोगों को क्या-क्या सूझता है। दोनों दोस्त मिलकर तय कर लिए सब, मुझसे पूछा तक नहीं। अपनी मर्जी चलाते हैं घर में।
शांति का मन आज बहुत अशांत है, वह लगातार रोए जा रही है। सुखनंदन का जाना उसको सहन नहीं हो रहा है।
बनाने को वह खाना बना रही है लेकिन आज उसका मन दाल के अदहन की तरह पक रहा है। धीरे-धीरे उसका दिमाग सुन्न पड़ गया और वह चौके में ही एक तरफ लुढ़क गयी। कुछ देर बाद किसी काम से जब झामुलाल किसी काम से घर आया तो उसने शांति को बेहोशी की हालत में लुढ़का हुआ देखा तो वह घबरा गया, सुखनंदन को आवाज दी, 'आ, जल्दी आ, देख तेरी माँ को क्या हो गया?'
सुखनंदन दौड़ता आया, उसने सबसे पहले माँ को सहारा देकर उठाया, इस बीच झामुलाल एक लोटा में पानी लेकर आया, शांति के चेहरे पर छिड़का, शांति ने आँखें खोली और रोते हुए कहने लगी, 'सुखनंदन को मत भेजो बिलासपुर।'
'नहीं भेजेंगे, ठीक है?' झामुलाल ने समझाया। शांति झामुलाल की बात सुनकर आँसू पोछते हुए शांत हो गयी लेकिन इस दौरान चूल्हे में चढ़ी दाल बटुए से लग गयी। शांति ने दाल का बटुआ उतारा और एक तरफ अलग रख दिया।
भुवन को उसके पिता लेकर चले गए लेकिन इस अप्रत्याशित घटना के कारण सुखनंदन का बिलासपुर जाना टल गया। सुखनंदन को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वह आगे पढ़ने के लिए कम उत्सुक था लेकिन भुवन के साथ रहने के लिए अधिक था। बिना भुवन के उसे अजीब सा सूनापन महसूस हो रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे उसके शरीर से किसी ने दिल और दिमाग को निकाल कर अलग कर दिया हो। वह चुप्पा हो गया, न किसी से कुछ बोलता, न बताता। उसकी यह हालत घर में किसी से छुपी नहीं थी लेकिन कोई कुछ बोल नहीं रहा था। बोलने का मतलब था, बात को आगे बढ़ाना लेकिन कोई भी बात को आगे बढ़ाना नहीं चाहता था। झामुलाल चुप था शांति के विरोध के कारण, शांति चुप थी अपने बेटे से अलग न रह पाने के कारण। वैसे, चुप्पी भी बिना शब्दों के बहुत कुछ कहती है इसलिए कुछ समय बाद टूटती भी है। पूरे घर में फैली इस चुप्पी को आखिरकार शांति ने तोड़ा, 'कैसन सुखनंदन, आजकल तैं हर चुप-चुप रथस?'
सुखनंदन चुप रहा। वह न तो बच्चा था जो ज़िद करके अपनी बात मनवा ले, न इतना बड़ा था कि अपना फैसला सुना दे। उसका भविष्य उसके माता-पिता की इच्छा पर आश्रित था। वह अकेला लड़का था इसलिए घर में अपनी उपस्थिति को थोड़ा-बहुत समझता था लेकिन सच बात तो यह थी कि उसका मन पढ़ाई में बहुत लगता था। क्लास में सदैव अव्वल आता था। इस साल की वार्षिक परीक्षा में भुवन उससे आगे निकल गया लेकिन उसके मन में भुवन के लिए कोई बात नहीं थी क्योंकि दोनों का मन एक-दूसरे से इस कदर मिला हुआ था कि उनके बीच कोई भी प्रतिस्पर्धा नहीं थी, सम भाव था। भुवन आगे हो गया, सुखनंदन के लिए उतनी खुशी की बात थी जितनी उसे खुद आगे होने की होती। वे दो शरीर थे लेकिन एक प्राण हो गए थे। भुवन से हुई दूरी उसके लिए असहनीय थी लेकिन वह कैसे कहे? किससे कहे? शांति ने फिर पूछा, 'काबर नईं बोलथस ?'
सुखनंदन रोने लगा। माँ ने उसकी पीठ में हाथ फेरा, उसे चुप कराया और उसे बोलने के लिए उत्साहित किया। सुखनंदन ने कहा, 'भुवन के बिना मुझे अच्छा नहीं लगता, मैं क्या करूँ?'
'कुछ दिन में अच्छा लगने लगेगा।'
'एक महीना तो बीत गया, अभी भी खराब लग रहा है।'
'तेरा उसके साथ रहने का बहुत मन है?'
'हाँ, मैं उसके साथ रहना चाहता हूँ, पढ़ना भी चाहता हूँ।'
'और मेरे साथ?'
'तुम्हारे साथ तो तब से हूँ जब से मैंने जन्म लिया।'
'तो अब क्या हुआ?'
'अब भुवन भी आ गया।'
'मतलब अब मैं कुछ नहीं?'
'नहीं यह बात नहीं है।'
'तो क्या बात है?'
'माँ, अब मैं बड़ा हो रहा हूँ। अब मुझे नए सहारे ढूँढने होंगे। कब तक तुम्हारे साथ लिपटा रहूँगा।'
'अब मेरी जरूरत नहीं है तुझे?'
'माँ की जरूरत कभी खत्म होती है क्या?'
'अभी तो तेरी बात से यही लग रहा है मुझे।'
'नहीं माँ, तेरे प्यार की जरूरत हर समय रहेगी।'
'फिर मुझे छोड़ कर क्यों जाना चाहता है?'
'मैं सिर्फ तुम्हें नहीं छोडूंगा, पिता जी को, दादा जी को, दादी जी को, इस घर को, इस गाँव को, सबको छोड़ कर जाऊंगा न माँ?'
'तुझे भुवन के कारण इतने सबके साथ को छोड़ना मंजूर है?'
'कुछ पाने के लिए कुछ छोड़ना पड़ेगा।'
'क्या पाएगा? भुवन का साथ?'
'नहीं माँ, मैं केवल भुवन के कारण नहीं जा रहा हूँ, आगे पढ़ने के लिए जाना चाहता हूँ।'
'पढ़ कर क्या मिलेगा तुझे?'
'यहाँ गाँव में क्या है? पिता जी खेत में इतनी मेहनत करते हैं, घर में सिलाई करते हैं लेकिन हम सब कितनी तकलीफ में हैं? पढ़-लिख लूँगा तो कोई अच्छी नौकरी मिल सकती है, घर अच्छे से चलेगा।'
'तेरी बात ठीक है लेकिन तेरा बाहर जाना मुझे सहन नहीं होगा।'
'तो, आता रहूँगा न तुझसे मिलने।'
'ठीक है, मैं तेरे पिता जी से बात करके बताती हूँ तुझे।' माँ ने कहा।
आज रात को भात के साथ रामकेरिया (भिंडी) बनी है और पताल (टमाटर) की तीखी चटनी। झामुलाल को बहुत पसंद है। वह चौके में आकर चटाई पर बैठ गया, शांति ने उसे थाली में भोजन परोस दिया। शांति का सुखनंदन के बारे में बोलने का मन हो रहा था लेकिन हिम्मत नहीं हो रही थी। सुखनंदन का दुखी चेहरा उससे देखा नहीं जा रहा था और अपना दुख सहा नहीं जा रहा था। बहुत पशोपेश में थी वह। अचानक ही वह बोल पड़ी, 'सुनो।'
'कहो।' झामुलाल ने कहा।
'सुखनंदन के बारे में कुछ सोच रही थी मैं।'
'उसके ब्याह के बारे में क्या?'
'कैसी बात करते हो तुम? अभी उसकी तीन बड़ी बहनें घर में बैठी हैं ब्याहने को।'
'तो फिर?'
'उसको बिलासपुर भेज दो।' शांति की बात सुनकर झामुलाल चौंक गया। उसने पूछा, 'सुखनंदन को बिलासपुर भेजने के लिए कह रही हो तुम?'
'हाँ, वह बहुत दुखी हो गया है। उसका बहुत मन है वहाँ जाकर पढ़ने का। मैं अपना दुख संभाल लूँगी, उसे भेज दो।' कहते-कहते शांति का गला रुँध गया, उसकी आँखों में आँसू आ गए।
* * * * *
सुखनंदन और भुवन दोनों बिलासपुर की गवर्नमेंट स्कूल में पढ़ने लगे। दोनों के बीच बहुत प्यार था। पल पल का साथ था। भुवन कुछ खरीदता तो सुखनंदन के लिए भी लेता। पढ़ाई-लिखाई में दोनों तेज थे इसलिए स्कूल में दोनों का नाम भी था। सुखनंदन खेलकूद में भी तेज था इसलिए उसका नाम हाकी, फुटबाल और कबड्डी की स्कूली टीम में भी शामिल रहता। आम तौर पर पढ़ाई और खेलकूद का मिश्रण नहीं दिखाई पड़ता, जो बच्चे पढ़ाई में तेज होते हैं, वे खेल में फिसड्डी होते हैं और जिनकी खेलों में रुचि होती है वे पढ़ाई-लिखाई में कमजोर निकलते हैं। सुखनंदन में दोनों गुण समान मात्रा में थे इसलिए वह शिक्षकों का प्रिय छात्र बनते जा रहा था। भुवन का दिल पढ़ाई में लगता था, खेलकूद की ओर उसका रुझान नहीं था.
चार साल पलक झपकते बीत गए. दोनों किशोर अब युवा हो गए थे. बिलासपुर के सी.एम.डी. कालेज में विज्ञान विषय लेकर पढ़ने लगे. पांच साल और बीत गए, दोनों ने एम.एस.सी.भी कर लिया. एम.एस.सी. (केमिस्ट्री) में सुखनंदन ने विश्वविद्यालय में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया।
अब नौकरी की चिंता शुरू हो गयी. गोल्ड मैडलिस्ट होने के कारण सुखनंदन को सी.एम.डी. कालेज में ही एडहाक लेक्चरर की नौकरी मिल गयी पर अस्थाई नौकरी की अनिश्चितता के कारण दो साल बाद सरकारी स्कूल में शिक्षकीय नौकरी पकड़ ली, इस बीच रजनी से उसका विवाह हो गया. सामान्य जीवन व्यवस्थित हो गया लेकिन सुखनंदन के मन में एक टीस उठती रही कि वह उस खाकी वर्दी को नहीं पहन पाया जिसकी इच्छा एक समय उसके पिता ने भी की थी, वे सिलेक्ट होने के बाद भी पारिवारिक कारणों से पुलिस में भरती नहीं हो पाए थे. सुखनंदन उनकी उस अधूरी इच्छा को पूरा करके उन्हें दिखाना चाहता था. खाकी वर्दी पहनने की लालसा में सुखनंदन ने तीन बार पुलिस इन्स्पेक्टर की परीक्षा दी, तीनों बार असफल रहा. उसे समझ में आ गया कि पुलिस की वर्दी उसके भाग्य में नहीं है, एक शिक्षक के रूप में ही जीवन बीतेगा. शिक्षक की भूमिका निभाने में दस साल और बीत गए.
सागर में पुलिस प्रशिक्षण केंद्र है जहाँ पर नवनियुक्त पुलिस अधिकारियों को पुलिस ट्रेनिंग दी जाती है. अपने परिचितों से मिलने के लिए एक दिन सुखनंदन वहां पहुंच गया. दोस्तों ने दिल खोल कर उसका स्वागत किया. बहुत बड़ा खुला मैदान था, धूप निखरी हुई थी. विश्राम का समय मिला हुआ था सबको. उसके एक पुराने दोस्त विवेक ने पूछा, 'क्यों पुलिस में आने का इरादा छोड़ दिया तूने?'
'इरादा तो हैं लेकिन कोशिश छोड़ दी मैंने, खाकी वर्दी पहनना शायद मेरे भाग्य में नहीं है।' सुखनंदन ने उदास होकर जवाब दिया.
'ऐसा क्यों सोचता है तू? एक बार और कोशिश कर. इस बार हो जाएगा।'
'तीन बार फेल हो गया, अब हिम्मत नहीं होती.'
'हिम्मत करने से होती है.'
'कर चुका जितनी मुझसे हो सकती थी, अब और नहीं करूंगा. मालूम है तुमको कि सिलेक्ट नहीं होने पर कितनी पीड़ा होती है.'
'समझता हूँ लेकिन तुझे एक बार कोशिश फिर से करनी चाहिए.' उसने कहा और सभी दोस्तों ने हाँ में हाँ मिलायी. उसके बाद उसने सुखनंदन का हाथ पकड़ा और कहा, 'तू इस मैदान में खड़े होकर कसम ले कि तू इसी मैदान में पुलिस की ट्रेनिंग लेने आएगा.'
सुखनंदन जोर से हंसा, फिर तनिक थमा फिर मुस्कुराते हुए उसने अपने दोनों हाथ आसमान की ओर उठाए और उद्घोष किया, 'मैं शपथ लेता हूँ कि इसी मैदान में मैं पुलिस की ट्रेनिंग लेने के लिए आऊंगा, जरुर आऊंगा।'
सागर से लौटते समय ट्रेन में बैठा सुखनंदन सोच रहा था कि ऐसी शपथ लेने का क्या मतलब जिसकी दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है? पर दोस्तों का मन रखना भी तो जरुरी है न. परन्तु दोस्तों के कहने पर मैंने झूठी शपथ क्यों ली? बारह वर्ष बीत गए हैं पढ़ाते-पढ़ाते, अब तो यही मेरा वर्तमान है, यही मेरा भविष्य है. जब पढ़ने की उम्र थी तब तो इन्स्पेक्टर बन नहीं पाया, परीक्षा में फेल हो गया, अब इस उम्र में कैसे पढ़ सकूँगा? घर में बीवी है, बेटा है, अब भला कैसे तैयारी होगी? दोस्ती-यारी में झूठी कसम खा ली, गलती हो गयी. मुझे माफ़ करना भगवान.
मनुष्य के जीवन का कोई ठिकाना नहीं होता. कब क्या हो जाए कोई जान नहीं सकता. सागर के पुलिस ग्राउंड में ली गयी कसम का असर अचानक दिखने लगा. एक दिन रजनी ने कहा, 'तुम स्टेट पी.एस.सी. की परीक्षा में क्यों नहीं बैठते?'
'इन्स्पेक्टर तो बन नहीं पाया, पी.एस.सी. कैसे क्लीयर का सकूँगा.' सुखनंदन ने उत्तर दिया.
'देखो, मेरा कजिन पी.एस.सी.में सिलेक्ट हो गया. मैं उसकी और तुम्हारी दोनों की काबिलियत को अच्छे से जानती हूँ, जब उसका हो गया तो तुम्हारा भी हो सकता है.'
'अब पढ़ने की उम्र न रही. फिर स्कूल से छुट्टी भी नहीं मिलेगी.'
'स्कूल से विदाउट पे लीव ले लेना लेकिन मेरी बात मानो, तुम इस बार पी.एस.सी. फेस करो.'
'तैयारी के लिए जांजगीर या बिलासपुर जाना होगा.'
'जाओ, जहां जाना है जाओ, मैं यहाँ का सम्हाल लूंगी.'
'सच कह रही हो?'
'तुम अपनी काबिलियत को जानते नहीं हो, मैं जानती हूँ.'
'सच में?'
'सच.' रजनी ने कहा और सुखनंदन की बाहों में सिमट गयी.
सुखनंदन ने रजनी की बात पर गौर किया. उसी उधेड़बुन में उस रात वह बहुत देर तक जागता रहा, दस किस्म की बातें दिमाग में आती रही, जाती रही. कभी उसकी हिम्मत बंध जाए तो कभी टूट जाए. बहुत मगज़मारी की लेकिन किसी निर्णय तक पहुंचना न हो सका. अचानक नींद ने उसे अपने आगोश में ले लिया.
सपने में उसने देखा कि वह ट्रेन से जाने के लिए स्टेशन पहुँच गया है, अचानक ट्रेन ने सीटी दी और बहुत तेजी से आगे बढ़ गयी. वह दौड़ा लेकिन डिब्बे में घुस नहीं पाया। ट्रेन के सबसे पीछे लगा शॉकएब्जार्वर उसकी पकड़ में आ गया. ट्रेन ने स्पीड पकड़ ली, वह शॉकएब्जार्वर को पकड़े हुए बहुत दूर तक घिसटते हुए चला जा रहा है. अचानक ट्रेन ने ब्रेक लगाया तो उसके हाथ की पकड़ ढीली पड़ गयी, वह फेंका गया. ट्रेन रुकी, वह उठकर दौड़ा और फिर से ट्रेन के चालू होने के पहले एक जनरल कोच में चढ़ने में सफल गया. उसकी साँस फूल रही है, वह हांफ रहा है. उसने आसपास बैठे यात्रियों की तरफ देखा, वे सब सो रहे थे, किसी ने उसकी ओर देखा तक नहीं।
सहसा उसकी नींद खुली, वह पसीने से तर-बतर हो गया था. उसने पंखा चालू किया और देखा कि रजनी गहरी नींद में सोई हुई है. बिस्तर से उठकर वह बाथरूम गया, वहां से लौटकर एक गिलास ठंडा पानी पिया और बिस्तर में वापस लेटकर उसने आँखें बंद की. थोड़ी देर में उसे फिर से नींद आ गयी.
सुखनंदन ने एक बार और कोशिश करने का निर्णय लिया. स्कूल में छुट्टी की अर्जी लगाई और कोचिंग के लिए जांजगीर चला गया. कुछ दिनों बाद बिलासपुर. उसने मन लगाकर तैयारी की और टेस्ट में बैठ गया. प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा में वह पास हो गया और साक्षात्कार भी अच्छा हुआ लेकिन चयन में वह वेटिंग लिस्ट में पहली प्राथमिकता में था. आसमान से गिरा, खजूर के पेड़ में अटक गया. अब प्रतीक्षा के अलावा उसके पास और क्या था?
अचानक एक दिन उसे आयोग से एक पत्र मिला जिसमें उसके उप पुलिस अधीक्षक के रूप में चयन का सुखद समाचार था. वह बहुत बड़ी ख़ुशी थी उसके और रजनी के लिए. वह रायपुर स्थित पुलिस मुख्यालय गया, अपनी उपस्थिति दर्ज कराई अचानक ज्ञात हुआ कि उस चयन पर उच्चन्यायालय ने स्थगन का आदेश दे दिया है, उसकी आँखों से आंसू बह निकले. उसे लग रहा था जैसे उसके मुंह में जाता निवाला छीन लिया गया हो. फिर वही प्रतीक्षा.
'पता नहीं कब पुलिस की वर्दी पहनूंगा मैं?' वह रायपुर से वापस लौटते समय दुखी होकर सोच रहा था.
उच्चन्यायालय में मामला अटक गया. इधर दिन बीते, माह बीते, साल बीत गया लेकिन कोई भी आशा की किरण दिखाई न पड़ी बल्कि एक चिंताजनक खबर मिली कि पिता जी का एक हाथ पत्थर जैसा हो गया है. संभवतः किसी विषैले कीड़े या सांप ने हाथ में डंक मारा था यद्यपि झामुलाल ने उसे देखा नहीं इसलिए वह ठीक से बता नहीं पा रहा था कि क्या हुआ? सुखनंदन अपने पिता को बिलासपुर दिखाने लाया। डाक्टरों को बीमारी समझ में नहीं आयी, उन्होंने रायपुर ले जाने की सलाह दी. सड़क मार्ग से रायपुर रवाना हुए लेकिन नांदघाट पुल पर जाम लगा था, घंटों बीत गए लेकिन गाड़ी आगे न बढ़ी तो बिलासपुर वापस आये, ट्रेन से रायपुर के लिए रवाना हुए. वह १४ अगस्त का दिन था. झामुलाल को वह रात न मिल सकी और वे रायपुर अस्पताल में शांत हो गए. पार्थिव शरीर को गाँव लेकर आए और १५ अगस्त को अंतिम संस्कार किया गया.
सुखनंदन पिता की अस्थियां लेकर इलाहाबाद गया. अस्थि विसर्जन की पूरी क्रिया के दौरान उसकी आँखों से आंसू बहते रहे. वह अपने पिता का विछोह सह नहीं पा रहा था. उसे यह भी अफ़सोस हो रहा था कि वह पुलिस की वर्दी पहनकर अपने पिता के सामने खड़ा नहीं हो पाया, पिता असमय चले गए. पंडा शम्भुनाथ ने जब उसे इस तरह लगातार रोते हुए देखा तो कहा, 'इतना दुखी क्यों हो? तुम्हारे पिता कहीं नहीं गए हैं, हर समय तुम्हारे पास हैं. उन्हें जब भी याद करोगे तब अपने सामने खड़ा हुआ पाओगे.'
आज सुखनंदन उप पुलिस अधीक्षक बन गया है. रोज जब पुलिस की वर्दी पहनता है तो अपने पिता को अपने सामने खड़ा हुआ पाता है, उसे लगता है जैसे उसके पिता उसे देखकर बहुत खुश हो रहे हैं. लेकिन १५ अगस्त को सुखनंदन के लिए वर्दी पहनना बहुत भारी लगता है क्योंकि उस दिन भी वह अपने पिता को याद करता है लेकिन वे सामने आते नहीं, बहुत याद करने पर भी नहीं आते.
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छत्तीसगढ़ में वर्षाऋतु का अलग रंग होता है। रह-रहकर बरसता है और भरपूर बरसता है। बारिश के दिनों में हरियाए धान के खेत ऐसे लगते हैं जैसे धरती पर मखमली कालीन बिछी हो। जब हवा चलती है तो धान के पौधे ऐसे झूमते हैं जैसे योगाभ्यास कर रहे हों। खेत खेत नहीं, नन्हें-नन्हें तालाब बन जाते हैं जो पौधों की तीव्र प्यास को अनवरत बुझाते हैं। हफ्ते-दो हफ्ते अगर पानी न गिरा तो भी कोई फिक्र नहीं, मेघ जब बरसेंगे तब बरसेंगे, तब तक धरती के पास अपने नवजात शिशु को नवप्रसूता माँ की तरह दुग्ध-पान कराने का अजस्र भंडार सुरक्षित रहता है। धान के पौधों को जितना पानी चाहिए, उतनी धूप भी। सूर्य भी बादलों को भेदकर धरती में पसर जाता है और पौधे मुस्कुराने लगते है, किसान का मन-मयूर नाचने लगता है। हर सुबह वह अपने खेत को उस तरह देखने जाता है जैसे नव-ब्याहता के मुखड़े को उसका अति-आतुर पति झाँकता है। लगभग सौ दिनों की घूँघट दिखाई के बाद जब फसल तैयार होती है तो श्रम की बूंदें ता-थई-थई करती हुई नृत्य करती हैं और किसान अपने घर के साल भर का अनाज, अगली फसल के लिए बीज, घरवाली का इलाज, बच्चों की शादी, दीवाली और एकादशी के लिए कपड़े और ऋण पटाने या ऋण का ब्याज पटाने का गणित हल करने की कोशिश करता है। कुछ दिनों में उसे समझ आ जाता है कि उसे गणित नहीं आता, केवल परिश्रम करना आता है। जो उसे आता है, उसे उसने कर दिया; जो नहीं आता उसका वह क्या करे?
हमारी हर सांस गिनती की है, हर क्रिया का निश्चित परिणाम है। सब जोड़-घटाना है लेकिन जीवन के गणित में अंक गणित जैसे निश्चित परिणाम नहीं आते और जब कुछ का कुछ हो जाता है तो दिमाग घूमने लगता है। बहुत से होशियार गणित करने में खुद को सिद्ध समझते हैं लेकिन जब समय अपना आदेश-चक्र चलाता है तो वे धूल चाटते नज़र आते हैं। बहस हो सकती है कि सफलता-असफलता समय के हाथ में है लेकिन कुछ हमारे हाथ में भी है।
एक शिशु जब इस धरती में अवतरित होता है तो जयघोष करते हुए आता है। रुदन वह जयघोष है जो विश्व को बताता है कि एक नयी संभावना ने पृथ्वी में जन्म ले लिया है। रोने की आवाज़ शिशु की माँ के कानों से होती हुई स्तन तक पहुँचती है और उष्ण दुग्ध के माध्यम से शिशु के रक्तकणों में प्रविष्ट हो जाती है जिसका प्रभाव आजीवन रहता है। सवाल यह है कि यह जयघोष जीवन भर जय-पराजय के बीच क्यों झूलता है?
झामुलाल की बात बताता हूँ, कृषक परिवार है। पारिवारिक बँटवारे में तीन एकड़ जमीन मिली। घर खाने के लिए अनाज मिल जाता है लेकिन कुछ खास बचत नहीं होती। घर में बूढ़े माँ-बाप हैं। पत्नी है शांति, पाँच बच्चे हैं, चार लड़कियां, एक लड़का। जब बच्चे थे तब बच्चे थे, अब बढ़ रहे हैं तो उन्हें बच्चे कहने में संकोच होता है लेकिन उन्हें बच्चे न कहें तो क्या कहें? चारों बेटियाँ बड़ी हैं, गाँव की स्कूल में आठवी तक पढ़ ली, आगे पढ़ने का स्कूल नहीं है इसलिए उनका विवाह झामुलाल की चिन्ता का कारण बन गया। कुछ पैसा जुड़ जाए इसके लिए उसने घर के बाहर परछी में कपड़े सिलने वाली मशीन लगा ली, छिट-पुट काम मिलने लगा। शांति भी सिलाई सीख गयी, थोड़ी मदद हो गयी।
एक दिन की बात है, शांति कपड़े की कटिंग कर रही थी, झामुलाल सिलाई कर रहा था, शांति ने कहा, "शादी की बात कहीं चला रहे हो?"
"अभी तो मशीन चला रहा हूँ।"
"वो तो मुझे भी दिख रहा है लेकिन शादी की बात चलाते नहीं दिख रहे हो।"
"क्या करूँ? हाथ में कुछ पैसा हो तो हिम्मत आए।"
"चार-चार लड़कियां हैं, बस, बैठो रहो और पैसे का रास्ता देखो।"
"अरे, मैं बैठा हूँ क्या? खेत का काम करता हूँ, घर में मशीन चला रहा हूँ, तुमको दिखता नहीं?'
"मैंने कब कहा कि तुम कुछ नहीं कर रहे हो? मैं देख रही हूँ तुमको, दिन-रात मेहनत करते हो लेकिन मैं लड़कियों की माँ हूँ, मुझे चिंता होती है। सरिता सोलह साल की हो गयी, उसके पीछे तीन और हैं जो मुनगा के पेड़ की तरह बढ़ रही हैं। एक-एक करके विदा करना पड़ेगा न?"
"बात तुम्हारी ठीक है। इस साल पानी अच्छा गिरा है। धान अच्छा होगा तो कुछ बचत हो सकती है। इस ठंड में सरिता को निपटाते हैं।"
"कहीं बात चलाए हो?"
"एक लड़के का पता चला है, सक्ती में है। जाकर देखता हूँ, कैसा है, फिर उसके बाप से बात करूंगा।"
"कब जाओगे?"
"पाँच-सात दिन में।"
"कल क्यों नहीं जाते?"
"कल क्यों?"
"कल अच्छा दिन है। शुभ काम शुरु करने के लिए बृहस्पत का दिन अच्छा होता है।" शांति ने बताया।
"ठीक है, कल सुबह निकल जाता हूँ। सिलाई का बचा हुआ काम तुम निबटा लेना। कल शाम को कपड़ा सिलकर देना जरूरी है, मैं झूठा न बन जाऊँ।" झामुलाल ने चेताया।
अगली सुबह बस में बैठा हुआ झामुलाल अपने अतीत में खो गया जब उसे पुलिस विभाग में नौकरी मिल गयी थी और वह पुस्तैनी खेती-बाड़ी का काम छोड़कर एक नयी ज़िंदगी की शुरुआत करने वाला था। पुलिस की खाकी ड्रेस, रुवाबदार कड़क आवाज उसे बहुत लुभाती थी। उसका सुहाना सपना सच होने जा रहा था।
अपना नियुक्तिपत्र लेकर वह अपने जिगरी दोस्त लखनलाल के पास पहुंचा, "लखन, मेरा पुलिस में हो गया।"
"सच?" लखनलाल ने पूछा।
"ये लेटर देख।"
"वाह, बधाई हो। कब जाएगा, कहाँ जाना है?"
"परसों निकलूँगा, बिलासपुर आफिस में रिपोर्ट करना है। फिर वो जहां तैनात करें।"
"भाभी और बच्चे?"
"वहाँ जाकर देखता हूँ, क्वार्टर मिल गया तो ले जाऊंगा, नहीं तो ये लोग यहीं रहेंगे, मैं छुट्टी लेकर बीच-बीच में आया करूंगा।"
"अकेले रह लेगा वहाँ?"
"रहना पड़ेगा, नौकरी में सब सहना पड़ता है। यहाँ परिवार के साथ हूँ तो कौन सा तीर मार रहा हूँ?"
"तीनों भाई नौकरी करेंगे तो यहाँ का क्या होगा?"
"दोनों मज़े में हैं, नौकरी में चले गए, अपना परिवार भी ले गए। मैं यहाँ अकेला खट रहा हूँ। इधर दाई-ददा को देखो, उधर खेती देखो। सुबह से रात तक चैन नहीं रहता, फिर गुजारा भी ठीक से नहीं होता।"
"ये बता, तू गाँव छोड़ देगा तो तेरे दाई-ददा को कौन देखेगा?"
"जब भाई लोग नहीं सोच रहे हैं तो मैं अपना दिमाग क्यों लगाऊँ?"
''चलो मान लिया कि वो ज़िम्मेदारी नहीं समझते लेकिन तुझे तो सोचना चाहिए।"
"तू क्या चाहता है कि मैं नौकरी में न जाऊँ, यहीं रहूँ ?"
"ये मैंने कब कहा? मैं यह पूछ रहा हूँ कि जो यहाँ हैं, उनका क्या होगा? उनकी इस उम्र में कोई तो देखने वाला होना चाहिए। तुम सब यहाँ से चले जाओगे तो खेती की जमीन भी हाथ से निकल जाएगी। आसपास वाले हर समय जमीन हथियाने के ताक में रहते हैं।"
"जाए तो जाए, अकेली मेरी तो नहीं जाएगी, सब भाइयों की जाएगी।"
"क्या हो गया है तेरे दिमाग को? धरती हमारी माँ है, हमारा पेट भरती है। पुलिस में जाने के लिए तू अपनी माँ और परिवार को बेसहारा छोड़ कर जा रहा है?"
"तो क्या करूँ?"
"अपनी ज़िम्मेदारी को समझ और यहीं गाँव में रह।"
"और, पुलिस की नौकरी?"
"तेरे लिए नहीं है, छोड़ उसको। यहाँ तेरा अपना काम है, तू खुद मालिक है। वहाँ क्या साहबों की जी-हुज़ूरी हो पाएगी तुझसे?"
"पर पुलिस का काम अच्छा है, रुआब रहता है?"
"क्या करेगा पुलिस में जाकर? थाना मिलेगा तब न पब्लिक पर रौब गांठेगा। कहीं किसी बड़े साहब के घर में ड्यूटी लग गयी तो उसके बच्चे की टट्टी वाली चड्डी धोना, साहबिन की डांट खाना, बंगले में झाड़ू लगाना, किचन में खाना बनाना या बगीचे में पौधे खोंसना। कर लेगा तू? कोई पुलिस कप्तान बनकर नहीं जा रहा है, सिपाही बन कर जा रहा है। साहबों का रौब सहते तेरी ज़िंदगी गुजर जाएगी तब कहीं जाकर मुश्किल से हवलदार बन पाएगा।"
"तू डरा रहा है यार मुझे।"
"मैं तुझे सही बात समझा रहा हूँ, मेरी बात मान, छोड़ पुलिस की नौकरी का चक्कर और यहीं रह। लखनलाल ने समझाया। झामुलाल सोच में पड़ गया। बोला, "तेरी बात में दम है, शांति से बात करता हूँ, वो क्या कहती है।"
"लखन भैया सही कह रहे हैं। मैं कहती तो तुमको समझ नहीं आता। यहीं घर में रहो, जो भगवान देगा, हमें मंजूर है।" शांति ने कहा।
"तुम भी लखन की तरफ हो गयी।" झामुलाल भन्नाया।
"तरफदारी की बात नहीं है, समझदारी की बात है। दो बूढ़े हैं घर में, उनके तीन-तीन लड़के हैं, तीन बहुएँ हैं और वे अकेले रहेंगे?"
"बाकी दो की भी तो कोई ज़िम्मेदारी है कि नहीं?"
"उनकी छोड़ो, ये बताओ कि तुम्हारी ज़िम्मेदारी क्या है?"
"मैं पूछता हूँ, उनकी ज़िम्मेदारी क्या है?"
"मैं पूछती हूँ, तुम्हारी ज़िम्मेदारी क्या है?"
"मेरे जिम्मदारी तुम हो, बच्चे हैं।"
"माँ-बाप नहीं हैं तुम्हारी ज़िम्मेदारी?"
"हैं।"
"तो फिर निभाओ न।"
"मतलब तुम लखन की तरफ हो गयी?"
"लखन भैया बीच में कहाँ से आ गए? घर की, खेत-खार की और बाल-बच्चों की ज़िम्मेदारी हम दोनों की है, इसको निभाना चाहिए। फिर मैं हूँ न तुम्हारा साथ देने के लिए।" शांति ने समझाया।
झामुलाल चुप होकर सोचने लगा। वह धर्मसंकट में फंस गया, हाथ में आयी नौकरी हाथ से जा रही थी, अगर नौकरी में चला गया तो ज़िम्मेदारी जा रही थी। झल्लाकर बोला, "ले न भात राँध, अउ पताल के चटनी मां बने मिरचा पीस देबे, मोर रोये के मन होवत हे।"
"टिकट?" बस कंडक्टर की आवाज़ सुनकर झामुलाल चौंका। जेब से पैसे निकालकर दिये। टिकट में कुछ गोदा-गादी थी जिसे कंडक्टर ही समझ सकता था, उसे जेब में रख लिया और चलती बस के बाहर देखने लगा। बस थोड़ी दूर आगे बढ़ती, फिर रुक जाती, रास्ते में मिल रही सवारी को बस में लेने के लिए। सामने वाली सीट पर एक बूढ़ा आदमी बीड़ी पी रहा था और खाँसते जा रहा था। मन हुआ कि उसे डांट पिलाई जाए लेकिन 'क्या फायदा' सोचकर चुप रहा गया और उसकी बीड़ी बुझने का इंतज़ार करता रहा.
बाबू भी बहुत बीड़ी पीता है। एक दिन बाबू की बीड़ी चुराकर मैंने भी एक सुट्टा मारा था, इतनी ज़ोर की खांसी आयी, लगा, सांस उखड़ जाएगी, उस दिन से कान पकड़ लिया। अब तो उसके धुएँ की गंध से भी नफरत हो गयी। कोई पीता है तो चिढ़ होती है लेकिन क्या करोगे? जब बाबू को मना नहीं कर पाता तो दूसरे को कैसे मना करेगा?
शांति कहती है, "बाबू का ख्याल रखा करो, उनसे मेहनत का काम मत लो, आराम करने दो। ज़िंदगी भर काम किया है, अब तुमको संभालना चाहिए, है कि नहीं?" बात तो ठीक कहती है लेकिन बाबू की आदत है, बिना काम किए रह नहीं सकता। सूरज उगने के पहले खेत चला जाता है और वहाँ बैठकर धान के पौधों के साथ खुसुर-फुसुर बात करते रहता है। पौधे क्या बाबू की भाषा समझते होंगे? हो नहीं सकता लेकिन जब तक फसल पककर तैयार नहीं होती, तब तक कुछ तो उनके बीच बात होती है। एक दिन बाबू से हिम्मत करके पूछा, "का गोठियाथस ओखर लंग ?" बाबू मुस्कुरा के चुप हो गया।
जरूर कोई बात है जो मुझे अभी समझ में नहीं आ रही है पर कभी तो आएगी। मेरे से ज्यादा समझदार शांति है, कह रही थी कि पौधे मन की भाषा समझते हैं, उनको प्यार से देखो तो वे खिल उठते हैं, हरे-भरे हो जाते हैं। यहाँ, आदमी आदमी की बात नहीं समझता, पौधे कैसे समझ जाएंगे? दोनों भाइयों को कितना समझाता हूँ कि अच्छी नौकरी में लगे हो, कुछ यहाँ घर में मदद किया करो लेकिन उनका रोना ही खत्म नहीं होता। कहते हैं, शहर में खर्चा ज्यादा है, हमको नहीं पूरता, घर कैसे भेजें? स्वार्थी हैं, अपना-अपना घर भर रहे हैं और हमारे सामने टेसुवा बहाते हैं। जमीन का बंटवारा हुआ तो यहाँ जमकर बैठ गए और जब तक जमीन उनके नाम नहीं चढ़ी, तब तक पटवारी के पीछे लगे रहे। उनका नाम चढ़ा और घर-द्वार, बाबू-दाई सब बेगाने हो गये।
इधर अपनी खेती मैं देखूँ, उधर उनके खेत को भी ताकूँ। चार लड़कियां हैं, उनको ब्याहना है, उनको भी सोचना चाहिए तो उनके रंग-ढंग ऐसे हैं जैसे हम लोग एक मां की संतान नहीं हैं। मुझे लगता है कि शांति को दुनियादारी समझ में नहीं आती और मुझे भी कुछ करने नहीं देती। बढ़िया पुलिस की नौकरी में जा रहा था, उल्टा-सीधा समझा दिया मुझे, हाथ से नौकरी निकल गयी और यह बेगारी आ गयी, करो सबकी सेवा। शांति की बात मानने से कोई फायदा नहीं है, अब उसकी बात नहीं मानूँगा, खुद निर्णय लूँगा लेकिन मुश्किल यह है कि उसकी सलाह के बिना मैं कैसे निर्णय लूँगा?
बस सक्ती के बस स्टैंड पर रुकी। झामुलाल बस से उतर कर लड़का देखने के लिए आगे बढ़ गया।
* * * * *
लड़का अपने बाप की कपड़े की दूकान में साथ में बैठता है। दूकान छोटी है लेकिन माल भरा हुआ है। छोटी बस्ती में बिकने वाला सामान है, जैसे, लुगरा, धोती, गमछा, मच्छरदानी, छाता आदि। झामुलाल जब दूकान पहुंचा तो बाप-बेटा दोनों वहीं मिल गए। झामुलाल ने जब अपने आने का कारण बताया तो लड़के के पिता ने उसे चाय लेने के लिए भेज दिया। दोनों की बातचीत शुरू हुई।
'मेरी लड़की है, सबसे बड़ी है, शादी लायक है। मेरी इच्छा है कि वह आपके घर की बहू बने।' झामुलाल ने कहा।
'बहुत खुशी की बात है। कौन गाँव में रहते हो और कौन-कौन हैं घर में?' लड़के के पिता पुन्नीराम ने पूछा।
'किरारी में। साथ में दाई और ददा हैं, पत्नी और पाँच बच्चे हैं, चार लड़कियां और एक सबसे छोटा लड़का।'
'क्या करते हैं?'
'खेती-बाड़ी है और घर में कपड़े भी सिलता हूँ।'
'ठीक है, हम लोग आपके घर आते हैं, लड़की देखकर तय करेंगे।' पुन्नीराम ने कहा। इतने में चाय आ गयी। दोनों ने चाय पी और झामुलाल ने विदा ली और बसस्टेंड आ गया। लड़का दिखने में ठीक लगा, सरिता के हिसाब से सही था। 'यह रिश्ता हो जाता तो अच्छा हो जाता।' मन ही मन में झामुलाल ने सोचा।
दसवें दिन पुन्नीराम लड़की देखने आए. लड़की पसंद आ गयी. विवाह तय हो गया. एक माह बाद का मंडप तय हुआ. बारात आयी, विवाह हुआ, सरिता अपनी ससुराल चली गयी. सरिता का सबसे छोटा भाई सुखनंदन उस समय कक्षा आठ में पढ़ रहा था. यह उसकी पढ़ाई का आखिरी साल था क्योंकि गाँव में आठवीं से ऊपर की पढ़ाई नहीं थी. हाई स्कूल पढ़ने के लिए गाँव से बाहर जाना पड़ता, झामुलाल आर्थिक रूप से इतना समर्थ न था कि वह सुखनंदन को कहीं बाहर पढ़ने भेज सके इसलिए सुखनंदन को आगे खेती का काम संभालना तय था।
सुखनंदन पढ़ाई में तेज था, क्लास में सबसे अधिक नंबर पाने वाला विद्यार्थी था लेकिन भुवन पटेल से उसका मुक़ाबला रहता था। भुवन एक साल पहले ही किरारी आया था, उसके पिता दीनानाथ पटेल की नियुक्ति पटवारी के पद पर हुई थी। स्कूल में यद्यपि दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा थी लेकिन दोनों अच्छे दोस्त थे। एक दूसरे से प्यार करते थे और मदद भी। उधर दीनानाथ और झामुलाल की भी आपस में बहुत पटती थी। झामुलाल की लड़की के विवाह में दीनानाथ ने बहुत मदद की थी। दोनों की रोज मुलाक़ात होती, दुनिया भर की बातें होती। एक दिन सुखनंदन के बारे में बात चली।
'क्या सोचे हो सुखनंदन के बारे में?' दीनानाथ ने पूछा।
'क्या सोचना है? झामुलाल ने उलट कर प्रश्न किया।
'उसकी आगे की पढ़ाई के बारे में?
'बस, आठवीं तक पढ़ेगा।'
'सुखनंदन बहुत होशियार है, ऐसा भुवन बता रहा था। उसको आगे पढ़ाना चाहिए।'
'बात तो ठीक है तुम्हारी लेकिन मेरी हालत तुमसे छुपी तो नहीं है। किसी प्रकार से अपनी गृहस्थी चला रहा हूँ। तीन लड़कियां और बची हैं, जिनका ब्याह करना है। घर में आठ लोग खाने वाले हैं, मैं अकेला कमाने वाला हूँ। सुखनंदन को बाहर भेज कर पढ़ाने का खर्च बहुत होगा, मेरे से नहीं हो सकेगा।'
'मैं सब जानता हूँ लेकिन सुखनंदन को आगे पढ़ाना चाहिए।'
'कैसा करूँ, तुम बताओ?'
'मेरी बात सुनो, मैं भुवन को बिलासपुर भेज रहा हूँ, आगे पढ़ने के लिए। सुखनंदन भी उसके साथ जाएगा, उसके साथ रहेगा और पढ़ेगा।'
'और उसका खर्च कौन उठाएगा?'
'मैं उठाऊंगा।'
'तुम क्यों उठाओगे?'
'क्योंकि सुखनंदन मुझे भुवन जैसा लगता है, अपना बेटा सा लगता है।' दीनानाथ ने कहा। झामुलाल की आँखों में आँसू आ गए, वह कुछ बोल न सका, उसका गला रुँध गया।
तो, उस शाम की बातचीत में भुवन के साथ सुखनंदन का गाँव से बाहर जाकर पढ़ना तय हो गया।
झामुलाल के भाई सर्विस में थे, शहरों में रहते थे, उनके बच्चे शहर की स्कूलों में पढ़ रहे थे लेकिन उन्हें अपने भाई के बच्चे को अपने साथ रखकर पढ़ाने का विचार नहीं आया। झामुलाल गाँव में रहकर बूढ़े माँ-बाप की सेवा कर रहा था, ज़मीनों के देखरेख कर रहा था लेकिन उसका कोई उपकार मानने को तैयार न था। वहीं पर एक दोस्त ने सुखनंदन के गुण को पहचाना और उसे आगे पढ़ाने का बीड़ा उठाया। इस दुनिया में ऐसा देखा गया है कि दिल के रिश्ते खून के रिश्तों से ज़्यादा कारगर सिद्ध हुए हैं।
समय बीतता गया। आठवीं कक्षा का रिजल्ट आया। भुवन ने सर्वोच्च अंक प्राप्त किए, दूसरी वरीयता में सुखनंदन था। उसके बाद गर्मियों की छुट्टियाँ चली और एक दिन सुखनंदन के घर छोड़ कर जाने का दिन आ गया। सुखनंदन की माँ सुबह से रो रही थी। चौदह साल का लड़का घर छोड़ कर बाहर जा रहा है। कहाँ रहेगा, क्या खाएगा? कौन देखरेख करेगा? एक तो वह एकदम सीधा-सादा लड़का है, बात कम करता है, बाहर की दुनिया का कैसे सामना करेगा? रात को सोता है तो इसको ठंड का भी पता नहीं रहता, घुटने सिकोड़ कर पड़ा रहता है, रात को मैं इसको चादर ओढ़ाती हूँ। वहाँ तबीयत खराब हो जाए, कौन देखेगा?
यहाँ क्या तकलीफ है, रहे हम सबके साथ। यहाँ रहेगा तो कम-से-कम हमारी आँखों के सामने रहेगा। क्या रखा है पढ़ाई-लिखाई में? पढ़ लेगा तो हमेशा के लिए हमसे दूर हो जाएगा। भगवान ने एक लड़का दिया है, रहे, यहीं पास रहे लेकिन पढ़ाई के चक्कर में फंसा रहे हैं इसको, पता नहीं, इन लोगों को क्या-क्या सूझता है। दोनों दोस्त मिलकर तय कर लिए सब, मुझसे पूछा तक नहीं। अपनी मर्जी चलाते हैं घर में।
शांति का मन आज बहुत अशांत है, वह लगातार रोए जा रही है। सुखनंदन का जाना उसको सहन नहीं हो रहा है।
बनाने को वह खाना बना रही है लेकिन आज उसका मन दाल के अदहन की तरह पक रहा है। धीरे-धीरे उसका दिमाग सुन्न पड़ गया और वह चौके में ही एक तरफ लुढ़क गयी। कुछ देर बाद किसी काम से जब झामुलाल किसी काम से घर आया तो उसने शांति को बेहोशी की हालत में लुढ़का हुआ देखा तो वह घबरा गया, सुखनंदन को आवाज दी, 'आ, जल्दी आ, देख तेरी माँ को क्या हो गया?'
सुखनंदन दौड़ता आया, उसने सबसे पहले माँ को सहारा देकर उठाया, इस बीच झामुलाल एक लोटा में पानी लेकर आया, शांति के चेहरे पर छिड़का, शांति ने आँखें खोली और रोते हुए कहने लगी, 'सुखनंदन को मत भेजो बिलासपुर।'
'नहीं भेजेंगे, ठीक है?' झामुलाल ने समझाया। शांति झामुलाल की बात सुनकर आँसू पोछते हुए शांत हो गयी लेकिन इस दौरान चूल्हे में चढ़ी दाल बटुए से लग गयी। शांति ने दाल का बटुआ उतारा और एक तरफ अलग रख दिया।
भुवन को उसके पिता लेकर चले गए लेकिन इस अप्रत्याशित घटना के कारण सुखनंदन का बिलासपुर जाना टल गया। सुखनंदन को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। वह आगे पढ़ने के लिए कम उत्सुक था लेकिन भुवन के साथ रहने के लिए अधिक था। बिना भुवन के उसे अजीब सा सूनापन महसूस हो रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे उसके शरीर से किसी ने दिल और दिमाग को निकाल कर अलग कर दिया हो। वह चुप्पा हो गया, न किसी से कुछ बोलता, न बताता। उसकी यह हालत घर में किसी से छुपी नहीं थी लेकिन कोई कुछ बोल नहीं रहा था। बोलने का मतलब था, बात को आगे बढ़ाना लेकिन कोई भी बात को आगे बढ़ाना नहीं चाहता था। झामुलाल चुप था शांति के विरोध के कारण, शांति चुप थी अपने बेटे से अलग न रह पाने के कारण। वैसे, चुप्पी भी बिना शब्दों के बहुत कुछ कहती है इसलिए कुछ समय बाद टूटती भी है। पूरे घर में फैली इस चुप्पी को आखिरकार शांति ने तोड़ा, 'कैसन सुखनंदन, आजकल तैं हर चुप-चुप रथस?'
सुखनंदन चुप रहा। वह न तो बच्चा था जो ज़िद करके अपनी बात मनवा ले, न इतना बड़ा था कि अपना फैसला सुना दे। उसका भविष्य उसके माता-पिता की इच्छा पर आश्रित था। वह अकेला लड़का था इसलिए घर में अपनी उपस्थिति को थोड़ा-बहुत समझता था लेकिन सच बात तो यह थी कि उसका मन पढ़ाई में बहुत लगता था। क्लास में सदैव अव्वल आता था। इस साल की वार्षिक परीक्षा में भुवन उससे आगे निकल गया लेकिन उसके मन में भुवन के लिए कोई बात नहीं थी क्योंकि दोनों का मन एक-दूसरे से इस कदर मिला हुआ था कि उनके बीच कोई भी प्रतिस्पर्धा नहीं थी, सम भाव था। भुवन आगे हो गया, सुखनंदन के लिए उतनी खुशी की बात थी जितनी उसे खुद आगे होने की होती। वे दो शरीर थे लेकिन एक प्राण हो गए थे। भुवन से हुई दूरी उसके लिए असहनीय थी लेकिन वह कैसे कहे? किससे कहे? शांति ने फिर पूछा, 'काबर नईं बोलथस ?'
सुखनंदन रोने लगा। माँ ने उसकी पीठ में हाथ फेरा, उसे चुप कराया और उसे बोलने के लिए उत्साहित किया। सुखनंदन ने कहा, 'भुवन के बिना मुझे अच्छा नहीं लगता, मैं क्या करूँ?'
'कुछ दिन में अच्छा लगने लगेगा।'
'एक महीना तो बीत गया, अभी भी खराब लग रहा है।'
'तेरा उसके साथ रहने का बहुत मन है?'
'हाँ, मैं उसके साथ रहना चाहता हूँ, पढ़ना भी चाहता हूँ।'
'और मेरे साथ?'
'तुम्हारे साथ तो तब से हूँ जब से मैंने जन्म लिया।'
'तो अब क्या हुआ?'
'अब भुवन भी आ गया।'
'मतलब अब मैं कुछ नहीं?'
'नहीं यह बात नहीं है।'
'तो क्या बात है?'
'माँ, अब मैं बड़ा हो रहा हूँ। अब मुझे नए सहारे ढूँढने होंगे। कब तक तुम्हारे साथ लिपटा रहूँगा।'
'अब मेरी जरूरत नहीं है तुझे?'
'माँ की जरूरत कभी खत्म होती है क्या?'
'अभी तो तेरी बात से यही लग रहा है मुझे।'
'नहीं माँ, तेरे प्यार की जरूरत हर समय रहेगी।'
'फिर मुझे छोड़ कर क्यों जाना चाहता है?'
'मैं सिर्फ तुम्हें नहीं छोडूंगा, पिता जी को, दादा जी को, दादी जी को, इस घर को, इस गाँव को, सबको छोड़ कर जाऊंगा न माँ?'
'तुझे भुवन के कारण इतने सबके साथ को छोड़ना मंजूर है?'
'कुछ पाने के लिए कुछ छोड़ना पड़ेगा।'
'क्या पाएगा? भुवन का साथ?'
'नहीं माँ, मैं केवल भुवन के कारण नहीं जा रहा हूँ, आगे पढ़ने के लिए जाना चाहता हूँ।'
'पढ़ कर क्या मिलेगा तुझे?'
'यहाँ गाँव में क्या है? पिता जी खेत में इतनी मेहनत करते हैं, घर में सिलाई करते हैं लेकिन हम सब कितनी तकलीफ में हैं? पढ़-लिख लूँगा तो कोई अच्छी नौकरी मिल सकती है, घर अच्छे से चलेगा।'
'तेरी बात ठीक है लेकिन तेरा बाहर जाना मुझे सहन नहीं होगा।'
'तो, आता रहूँगा न तुझसे मिलने।'
'ठीक है, मैं तेरे पिता जी से बात करके बताती हूँ तुझे।' माँ ने कहा।
आज रात को भात के साथ रामकेरिया (भिंडी) बनी है और पताल (टमाटर) की तीखी चटनी। झामुलाल को बहुत पसंद है। वह चौके में आकर चटाई पर बैठ गया, शांति ने उसे थाली में भोजन परोस दिया। शांति का सुखनंदन के बारे में बोलने का मन हो रहा था लेकिन हिम्मत नहीं हो रही थी। सुखनंदन का दुखी चेहरा उससे देखा नहीं जा रहा था और अपना दुख सहा नहीं जा रहा था। बहुत पशोपेश में थी वह। अचानक ही वह बोल पड़ी, 'सुनो।'
'कहो।' झामुलाल ने कहा।
'सुखनंदन के बारे में कुछ सोच रही थी मैं।'
'उसके ब्याह के बारे में क्या?'
'कैसी बात करते हो तुम? अभी उसकी तीन बड़ी बहनें घर में बैठी हैं ब्याहने को।'
'तो फिर?'
'उसको बिलासपुर भेज दो।' शांति की बात सुनकर झामुलाल चौंक गया। उसने पूछा, 'सुखनंदन को बिलासपुर भेजने के लिए कह रही हो तुम?'
'हाँ, वह बहुत दुखी हो गया है। उसका बहुत मन है वहाँ जाकर पढ़ने का। मैं अपना दुख संभाल लूँगी, उसे भेज दो।' कहते-कहते शांति का गला रुँध गया, उसकी आँखों में आँसू आ गए।
* * * * *
सुखनंदन और भुवन दोनों बिलासपुर की गवर्नमेंट स्कूल में पढ़ने लगे। दोनों के बीच बहुत प्यार था। पल पल का साथ था। भुवन कुछ खरीदता तो सुखनंदन के लिए भी लेता। पढ़ाई-लिखाई में दोनों तेज थे इसलिए स्कूल में दोनों का नाम भी था। सुखनंदन खेलकूद में भी तेज था इसलिए उसका नाम हाकी, फुटबाल और कबड्डी की स्कूली टीम में भी शामिल रहता। आम तौर पर पढ़ाई और खेलकूद का मिश्रण नहीं दिखाई पड़ता, जो बच्चे पढ़ाई में तेज होते हैं, वे खेल में फिसड्डी होते हैं और जिनकी खेलों में रुचि होती है वे पढ़ाई-लिखाई में कमजोर निकलते हैं। सुखनंदन में दोनों गुण समान मात्रा में थे इसलिए वह शिक्षकों का प्रिय छात्र बनते जा रहा था। भुवन का दिल पढ़ाई में लगता था, खेलकूद की ओर उसका रुझान नहीं था.
चार साल पलक झपकते बीत गए. दोनों किशोर अब युवा हो गए थे. बिलासपुर के सी.एम.डी. कालेज में विज्ञान विषय लेकर पढ़ने लगे. पांच साल और बीत गए, दोनों ने एम.एस.सी.भी कर लिया. एम.एस.सी. (केमिस्ट्री) में सुखनंदन ने विश्वविद्यालय में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया।
अब नौकरी की चिंता शुरू हो गयी. गोल्ड मैडलिस्ट होने के कारण सुखनंदन को सी.एम.डी. कालेज में ही एडहाक लेक्चरर की नौकरी मिल गयी पर अस्थाई नौकरी की अनिश्चितता के कारण दो साल बाद सरकारी स्कूल में शिक्षकीय नौकरी पकड़ ली, इस बीच रजनी से उसका विवाह हो गया. सामान्य जीवन व्यवस्थित हो गया लेकिन सुखनंदन के मन में एक टीस उठती रही कि वह उस खाकी वर्दी को नहीं पहन पाया जिसकी इच्छा एक समय उसके पिता ने भी की थी, वे सिलेक्ट होने के बाद भी पारिवारिक कारणों से पुलिस में भरती नहीं हो पाए थे. सुखनंदन उनकी उस अधूरी इच्छा को पूरा करके उन्हें दिखाना चाहता था. खाकी वर्दी पहनने की लालसा में सुखनंदन ने तीन बार पुलिस इन्स्पेक्टर की परीक्षा दी, तीनों बार असफल रहा. उसे समझ में आ गया कि पुलिस की वर्दी उसके भाग्य में नहीं है, एक शिक्षक के रूप में ही जीवन बीतेगा. शिक्षक की भूमिका निभाने में दस साल और बीत गए.
सागर में पुलिस प्रशिक्षण केंद्र है जहाँ पर नवनियुक्त पुलिस अधिकारियों को पुलिस ट्रेनिंग दी जाती है. अपने परिचितों से मिलने के लिए एक दिन सुखनंदन वहां पहुंच गया. दोस्तों ने दिल खोल कर उसका स्वागत किया. बहुत बड़ा खुला मैदान था, धूप निखरी हुई थी. विश्राम का समय मिला हुआ था सबको. उसके एक पुराने दोस्त विवेक ने पूछा, 'क्यों पुलिस में आने का इरादा छोड़ दिया तूने?'
'इरादा तो हैं लेकिन कोशिश छोड़ दी मैंने, खाकी वर्दी पहनना शायद मेरे भाग्य में नहीं है।' सुखनंदन ने उदास होकर जवाब दिया.
'ऐसा क्यों सोचता है तू? एक बार और कोशिश कर. इस बार हो जाएगा।'
'तीन बार फेल हो गया, अब हिम्मत नहीं होती.'
'हिम्मत करने से होती है.'
'कर चुका जितनी मुझसे हो सकती थी, अब और नहीं करूंगा. मालूम है तुमको कि सिलेक्ट नहीं होने पर कितनी पीड़ा होती है.'
'समझता हूँ लेकिन तुझे एक बार कोशिश फिर से करनी चाहिए.' उसने कहा और सभी दोस्तों ने हाँ में हाँ मिलायी. उसके बाद उसने सुखनंदन का हाथ पकड़ा और कहा, 'तू इस मैदान में खड़े होकर कसम ले कि तू इसी मैदान में पुलिस की ट्रेनिंग लेने आएगा.'
सुखनंदन जोर से हंसा, फिर तनिक थमा फिर मुस्कुराते हुए उसने अपने दोनों हाथ आसमान की ओर उठाए और उद्घोष किया, 'मैं शपथ लेता हूँ कि इसी मैदान में मैं पुलिस की ट्रेनिंग लेने के लिए आऊंगा, जरुर आऊंगा।'
सागर से लौटते समय ट्रेन में बैठा सुखनंदन सोच रहा था कि ऐसी शपथ लेने का क्या मतलब जिसकी दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है? पर दोस्तों का मन रखना भी तो जरुरी है न. परन्तु दोस्तों के कहने पर मैंने झूठी शपथ क्यों ली? बारह वर्ष बीत गए हैं पढ़ाते-पढ़ाते, अब तो यही मेरा वर्तमान है, यही मेरा भविष्य है. जब पढ़ने की उम्र थी तब तो इन्स्पेक्टर बन नहीं पाया, परीक्षा में फेल हो गया, अब इस उम्र में कैसे पढ़ सकूँगा? घर में बीवी है, बेटा है, अब भला कैसे तैयारी होगी? दोस्ती-यारी में झूठी कसम खा ली, गलती हो गयी. मुझे माफ़ करना भगवान.
मनुष्य के जीवन का कोई ठिकाना नहीं होता. कब क्या हो जाए कोई जान नहीं सकता. सागर के पुलिस ग्राउंड में ली गयी कसम का असर अचानक दिखने लगा. एक दिन रजनी ने कहा, 'तुम स्टेट पी.एस.सी. की परीक्षा में क्यों नहीं बैठते?'
'इन्स्पेक्टर तो बन नहीं पाया, पी.एस.सी. कैसे क्लीयर का सकूँगा.' सुखनंदन ने उत्तर दिया.
'देखो, मेरा कजिन पी.एस.सी.में सिलेक्ट हो गया. मैं उसकी और तुम्हारी दोनों की काबिलियत को अच्छे से जानती हूँ, जब उसका हो गया तो तुम्हारा भी हो सकता है.'
'अब पढ़ने की उम्र न रही. फिर स्कूल से छुट्टी भी नहीं मिलेगी.'
'स्कूल से विदाउट पे लीव ले लेना लेकिन मेरी बात मानो, तुम इस बार पी.एस.सी. फेस करो.'
'तैयारी के लिए जांजगीर या बिलासपुर जाना होगा.'
'जाओ, जहां जाना है जाओ, मैं यहाँ का सम्हाल लूंगी.'
'सच कह रही हो?'
'तुम अपनी काबिलियत को जानते नहीं हो, मैं जानती हूँ.'
'सच में?'
'सच.' रजनी ने कहा और सुखनंदन की बाहों में सिमट गयी.
सुखनंदन ने रजनी की बात पर गौर किया. उसी उधेड़बुन में उस रात वह बहुत देर तक जागता रहा, दस किस्म की बातें दिमाग में आती रही, जाती रही. कभी उसकी हिम्मत बंध जाए तो कभी टूट जाए. बहुत मगज़मारी की लेकिन किसी निर्णय तक पहुंचना न हो सका. अचानक नींद ने उसे अपने आगोश में ले लिया.
सपने में उसने देखा कि वह ट्रेन से जाने के लिए स्टेशन पहुँच गया है, अचानक ट्रेन ने सीटी दी और बहुत तेजी से आगे बढ़ गयी. वह दौड़ा लेकिन डिब्बे में घुस नहीं पाया। ट्रेन के सबसे पीछे लगा शॉकएब्जार्वर उसकी पकड़ में आ गया. ट्रेन ने स्पीड पकड़ ली, वह शॉकएब्जार्वर को पकड़े हुए बहुत दूर तक घिसटते हुए चला जा रहा है. अचानक ट्रेन ने ब्रेक लगाया तो उसके हाथ की पकड़ ढीली पड़ गयी, वह फेंका गया. ट्रेन रुकी, वह उठकर दौड़ा और फिर से ट्रेन के चालू होने के पहले एक जनरल कोच में चढ़ने में सफल गया. उसकी साँस फूल रही है, वह हांफ रहा है. उसने आसपास बैठे यात्रियों की तरफ देखा, वे सब सो रहे थे, किसी ने उसकी ओर देखा तक नहीं।
सहसा उसकी नींद खुली, वह पसीने से तर-बतर हो गया था. उसने पंखा चालू किया और देखा कि रजनी गहरी नींद में सोई हुई है. बिस्तर से उठकर वह बाथरूम गया, वहां से लौटकर एक गिलास ठंडा पानी पिया और बिस्तर में वापस लेटकर उसने आँखें बंद की. थोड़ी देर में उसे फिर से नींद आ गयी.
सुखनंदन ने एक बार और कोशिश करने का निर्णय लिया. स्कूल में छुट्टी की अर्जी लगाई और कोचिंग के लिए जांजगीर चला गया. कुछ दिनों बाद बिलासपुर. उसने मन लगाकर तैयारी की और टेस्ट में बैठ गया. प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा में वह पास हो गया और साक्षात्कार भी अच्छा हुआ लेकिन चयन में वह वेटिंग लिस्ट में पहली प्राथमिकता में था. आसमान से गिरा, खजूर के पेड़ में अटक गया. अब प्रतीक्षा के अलावा उसके पास और क्या था?
अचानक एक दिन उसे आयोग से एक पत्र मिला जिसमें उसके उप पुलिस अधीक्षक के रूप में चयन का सुखद समाचार था. वह बहुत बड़ी ख़ुशी थी उसके और रजनी के लिए. वह रायपुर स्थित पुलिस मुख्यालय गया, अपनी उपस्थिति दर्ज कराई अचानक ज्ञात हुआ कि उस चयन पर उच्चन्यायालय ने स्थगन का आदेश दे दिया है, उसकी आँखों से आंसू बह निकले. उसे लग रहा था जैसे उसके मुंह में जाता निवाला छीन लिया गया हो. फिर वही प्रतीक्षा.
'पता नहीं कब पुलिस की वर्दी पहनूंगा मैं?' वह रायपुर से वापस लौटते समय दुखी होकर सोच रहा था.
उच्चन्यायालय में मामला अटक गया. इधर दिन बीते, माह बीते, साल बीत गया लेकिन कोई भी आशा की किरण दिखाई न पड़ी बल्कि एक चिंताजनक खबर मिली कि पिता जी का एक हाथ पत्थर जैसा हो गया है. संभवतः किसी विषैले कीड़े या सांप ने हाथ में डंक मारा था यद्यपि झामुलाल ने उसे देखा नहीं इसलिए वह ठीक से बता नहीं पा रहा था कि क्या हुआ? सुखनंदन अपने पिता को बिलासपुर दिखाने लाया। डाक्टरों को बीमारी समझ में नहीं आयी, उन्होंने रायपुर ले जाने की सलाह दी. सड़क मार्ग से रायपुर रवाना हुए लेकिन नांदघाट पुल पर जाम लगा था, घंटों बीत गए लेकिन गाड़ी आगे न बढ़ी तो बिलासपुर वापस आये, ट्रेन से रायपुर के लिए रवाना हुए. वह १४ अगस्त का दिन था. झामुलाल को वह रात न मिल सकी और वे रायपुर अस्पताल में शांत हो गए. पार्थिव शरीर को गाँव लेकर आए और १५ अगस्त को अंतिम संस्कार किया गया.
सुखनंदन पिता की अस्थियां लेकर इलाहाबाद गया. अस्थि विसर्जन की पूरी क्रिया के दौरान उसकी आँखों से आंसू बहते रहे. वह अपने पिता का विछोह सह नहीं पा रहा था. उसे यह भी अफ़सोस हो रहा था कि वह पुलिस की वर्दी पहनकर अपने पिता के सामने खड़ा नहीं हो पाया, पिता असमय चले गए. पंडा शम्भुनाथ ने जब उसे इस तरह लगातार रोते हुए देखा तो कहा, 'इतना दुखी क्यों हो? तुम्हारे पिता कहीं नहीं गए हैं, हर समय तुम्हारे पास हैं. उन्हें जब भी याद करोगे तब अपने सामने खड़ा हुआ पाओगे.'
आज सुखनंदन उप पुलिस अधीक्षक बन गया है. रोज जब पुलिस की वर्दी पहनता है तो अपने पिता को अपने सामने खड़ा हुआ पाता है, उसे लगता है जैसे उसके पिता उसे देखकर बहुत खुश हो रहे हैं. लेकिन १५ अगस्त को सुखनंदन के लिए वर्दी पहनना बहुत भारी लगता है क्योंकि उस दिन भी वह अपने पिता को याद करता है लेकिन वे सामने आते नहीं, बहुत याद करने पर भी नहीं आते.
* * * * * * * * * *
Bhaut Khoob... Agrawal ji ... Hindi Sahity ki is vidha ka ganit to thik baith raha hai ... ! God Bless ...Issi tharah Chiraayu thak likhte rahein ... !
ReplyDeleteबहुत बहुत शिक्षापरक, व्यवहारिक और प्रभावशाली ढंग से लिखा है
ReplyDeleteबहुत ही बढ़िया आदरणीय।
ReplyDeleteबहुत ही बढ़िया आदरणीय
ReplyDeleteबेहतरीन......
ReplyDeleteHarish C Mathpal जी, Mahmud Alam जी, रामप्रसाद राजभर जी, swami vijay satyarthi जी, आभार मेरा।
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