Monday, 31 May 2021

तेरी मेरी कहानी है : चार : किस्सा काशी राम का :

किस्सा काशी राम का :


बिलासपुर का म्युनिसपल स्कूल. १९५८-५९ का सत्र था. क्लास VIII-D. क्लास-टीचर थे, चिरंजीव सिंह ठाकुर. सेक्सन-ए में होशियार लड़के थे. सेक्सन-बी में उनसे कम होशियार, सेक्शन-सी में मध्यम बुद्धि वाले और सेक्सन-डी में मंदबुद्धि छात्र. मैं भी सेक्सन-डी में था, संभवतः बारह वर्ष की उम्र में ही अध्यापकों ने मेरा समुचित मूल्यांकन कर लिया था.

सेक्सन-डी में संयोगवश दो-चार पढ़न्ते भी थे, बाकी सब घर से स्कूल भगाए गए उद्दंड लड़के थे जिन्हें घर में शांति स्थापित करने की गरज से पढ़ाई के लिए स्कूल भेजा गया था. अधिकतर लड़कों की रूचि पढ़ाई के समय गपशप करने या व्यवधान उपस्थित करने में होती थी. क्लास-टीचर चिरंजीव सिंह ठाकुर सब पर कड़ी नज़र रखते थे और हमारी बदमाशियों पर नियंत्रण स्थापित करने का असफल यत्न करते रहते थे. चूँकि हर-एक छात्र को नक़ल करने में महारत हासिल थी इसलिए परीक्षा का डर किसी के आसपास नहीं फटकता था. नक़ल करने के आधुनिकतम तरीके ईजाद करने में वे जितनी शक्ति लगाते थे, उतनी ऊर्जा यदि पढ़ाई में लगाते तो उनकी ज़िन्दगी बदल जाती लेकिन उन्हें पढ़ना उन सबकी शान के खिलाफ था.
दोपहर को दो बजे खाने की छुट्टी होती थी. आधे घंटे बाद पांचवा पीरियड लगता था. बिलासपुर की श्याम टाकीज में मेटिनी शो में देव आनंद की फिल्म लगी थी, 'टैक्सी ड्राइवर', उस दिन सेक्सन-डी के समस्त विद्यार्थी टाकीज के थर्ड-क्लास में विराजमान होकर फिल्म का आनंद ले रहे थे, सीटियाँ बजा रहे थे. क्लास टीचर को क्लास खाली देखकर कुछ समझ में नहीं आया लेकिन तथाकथित दो-चार पढ़न्ते स्कूल के बरामदे में घूमते हुए मिल गए जिन्होंने असली बात उगल दी. अगले दिन भी स्कूल लगी. प्रार्थना के बाद पहले पीरियड की क्लास लगी, सब लड़के क्लास में आकर बैठ गए. प्रधानाचार्य भगवतीप्रसाद पांडे तमतमाते हुए क्लास में घुसे, सबको क्लास के बाहर निकालकर लाइन से खड़ा किया और अपनी लपलपाती बेंत से सबकी गदेलियों में जी भर कर प्रसाद बांटा. पढ़न्ते भी मार खाने की कतार में चुपचाप शामिल हो गए क्योंकि यदि सिने-प्रेमियों को चुगलखोरों का नाम पता लग जाता तो शायद अधिक कुटाई होती. 

हमारी क्लास में अंग्रेजी, संस्कृत और अंक-बीज-रेखा गणित भी पढ़ाया जाता था. ये विषय हम लोगों को शिक्षकगण मन लगाकर पढ़ाते थे लेकिन विद्यार्थियों पर अनुकूल प्रभाव होता दिखाई नहीं पड़ता था. इन शिक्षकों को देखकर हम सोचते थे, 'इन लोगों ने अपना जीवन तो बर्बाद कर लिया है, हमारा वर्तमान नष्ट करने में क्यों तुले हुए हैं?' वे अपनी नौकरी से मजबूर थे तो हम भी उनकी मजबूरी से मजबूर थे. किसी प्रकार पढ़ाई ख़त्म होती तो हम सब खेल के मैदान की ओर दौड़ पड़ते क्योंकि वहां अलग-अलग समूहों में हाकी और फ़ुटबाल खेला जा रहा था. क्लास VIII-D में पढ़ने वाले कम थे किन्तु खिलाड़ी बड़ी संख्या में थे, खास तौर से हाकी खेलनेवाले. इन खिलाड़ियों में एक था काशीराम रजक, एक सीधा-सादा-शांत लड़का.

काशीराम के पिता का पैतृक व्यवसाय था, कपड़े धोना. घर में कोई पढ़ा-लिखा न था लेकिन काशीराम को खपरगंज प्राथमिक शाला में भेजा गया ताकि चार क्लास पढ़ ले तो कम-से-कम चिट्ठी पढ़ना-लिखना सीख ले. काशी की पढाई में रूचि न थी, खेल-कूद उसे अच्छा लगता था. स्कूल में खेल प्रतियोगिता होती थी जैसे, सामान्य दौड़, बोरा दौड़, जलेबी दौड़, आलू दौड़ आदि, इनमें वह हमेशा अव्वल रहता था क्योंकि उसकी तरह सरपट दौड़ने वाला कोई दूसरा न था.

स्कूल में सब बच्चे टाटपट्टी में पालथी मार कर बैठते थे और पढ़ाई करते थे. काशी को जब कुछ समझ में नहीं आता था तो बैठे-बैठे सो जाता था और वहीँ लुढ़क जाता था. जब पीठ में जब गुरूजी की छड़ी पड़ती तो वह चौंककर जाग जाता और बेमन से ब्लेकबोर्ड की तरफ देखता, थोड़ी देर में उसे फिर झपकी आ जाती. काशी की इस हरकत का असर अन्य बच्चों पर पड़ता था, वे भी ऊँघने लगते थे. गुरुजी एक दिन काशी के घर पहुँच गए और उसके बड़े भाई गेंदलाल से काशी का हाल बताया. गेंदलाल ने हाथ जोड़कर माफ़ी मांगी और काशी को 'अच्छे से' समझाने का भरोसा दिया.

उस रात काशी की तबीयत से कुटाई हुई. काशी ने कहा कि उसका पढ़ने में मन नहीं लगता इसलिए वह खुद स्कूल नहीं जाना चाहता. बाबू की डांट-डपट के कारण उसे स्कूल जाना पड़ता है. सच तो यह है कि काशी का बचपन संकट में था. घर से लेकर स्कूल तक आतंक पसरा हुआ था. मारपीट से वह उतना नहीं डरता था जितना पढ़ाई से. काशी ने किसी प्रकार चौथी कक्षा तक पढ़ाई की और 'प्राइमरी स्कूल पास' की डिग्री लेकर घर में बैठ गया.  

दस साल का लड़का, करे तो क्या करे? न कपड़े धो सकता था, न लोहा कर सकता था. बाबू ने उसे कपड़ा सुखाने और उतारने के काम से लगाया लेकिन कद कम था इसलिए रस्सी तक उसका हाथ नहीं पहुंचता था. बाबू सीधा था, उसे कुछ बोलता नहीं था. उसका अनुमान था कि काशी बड़ा हो जाएगा तो उसकी सहायता करेगा और बड़ा हो जाने पर लोगों के कपड़े धोकर अपना गुजारा कर लेगा. घर के सब लोग इसी काम से लगे थे सो काशी भी कर लेगा.

काशी को कुछ समझ में नहीं आता था लेकिन स्कूल से मिली मुक्ति से वह खुश था. अम्मा की कुछ मदद कर देता और हाफपेंट में कमीज खोंस कर घर से बाहर निकल जाता और पुलिस ग्राउंड में अपने दोस्त कादिर के साथ बैठकर मैदान में चल रहा हाकी मैच देखता. जब मैच ख़त्म हो जाता तो दोनों मैदान के चक्कर तब तक लगाते, जब तक कि थक कर निढाल न हो जाएं. यह सिलसिला रोज का था. जिस दिन तेज बारिश होती, उस दिन कोई मैच नहीं होता था, मैदान खाली रहता था लेकिन इन दोनों की दौड़ अवश्य होती थी क्योंकि बरसते पानी में पानी की बूंदों का मुकाबला करते हुए दौड़ना उन दोनों को अधिक पसंद था. कोई फिसलकर गिर जाता तो दूसरा उसे हंसते हुए सहारा देकर उठाता था और उसके बाद दोनों पेट पकड़कर हंसते थे, जब हंसी रुकती तो फिर दौड़ पड़ते.

'तू मस्त दौड़ता है बे, हॉकी खेलेगा तो तेरा ये दौड़ना बहुत काम आएगा.' कादिर ने कहा.
'मेरी तकदीर में कहाँ?' काशी ने दुखी होकर कहा.
'अपन लोग आज 'खपटा' से खेलते हैं, कल हाकी से खेलेंगे.'
'मालूम है? हाकी कितने में आती है?'
'कोई बता रहा था कि पांच रूपए में आती है, डेन्यूब स्पोर्ट्स की दूकान में मिलती है.'
'मैं तो आने-दो आने के लिए तरसता हूँ, पांच रूपए कहाँ से लाऊंगा?'
'एक काम कर तू म्युनिसपल स्कूल में भर्ती हो जा. हाकी टीम में शामिल हो जाना, वहां एकदम नई हाकी से खेलना.'
'सच में?'
'हां, मैं स्कूल की हाकी टीम में सिलेक्ट हो गया हूँ. तुमको पता है, जब मैंने हाकी को पकड़ा तो मुझे बहुत गुदगुदी हुई.'
'क्यों? गुदगुदी क्यों हुई?'
'हाकी अपने खपटा जैसी चुभने वाली नहीं होती, एकदम मुलायम होती है. छूने में मज़ा आता है और उससे खेलने में भी बहुत अच्छा लगता है.'
'ऐसा क्या?'
'तो क्या मैं झूठ बोल रहा हूँ?'
'नहीं रे, मैंने तो उस हाकी को कभी हाथ नहीं लगाया. मुझे तेरी बात पर भरोसा नहीं हो रहा है.'
'तो तू पढ़ेगा न?'
'पढ़ने को मत बोल, मुझसे नहीं होगा.'
'स्कूल में तो पढ़ना पड़ेगा.'
'तो फिर मैं स्कूल नहीं जाऊँगा.'
'स्कूल नहीं जाएगा तो हाकी कैसे खेलेगा?'
'क्या करूं मैं?'
'पढ़ाई की तू फ़िक्र मत कर, मैं तुझको नक़ल करना सिखा दूंगा, तू बिना पढ़े पास हो जाएगा.'
'नक़ल कैसे करते हैं?'
'तेरे को अभी सिखा दूं क्या? जब परीक्षा का समय आएगा तब बताऊंगा.'
'देख फंसवा मत देना.'
'नहीं यार, तू मेरा दोस्त है. पढ़ाई को गोली मार, केवल हाकी में ध्यान देना, बाकी मैं संभाल लूँगा.' कादिर ने समझाया. काशी स्कूल में भर्ती होने को तैयार हो गया.

पांचवी में अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू हो गयी. ए-बी-सी-डी रटना बहुत कठिन काम था. उसकी आधे में गाड़ी अटक जाती थी और बेनीमाधव मिश्रा मास्साब रोज क्लास में खड़ा करके पूछते थे, 'ए से जेड तक बिना देखे बोलो.' काशी बहुत परेशान हो गया. वह हॉकी पकड़ने की लालच में स्कूल आता था अन्यथा कब का भाग खड़ा होता, दौड़ने में तेज तो था ही.

स्कूल की मासिक 'फीस' छः आने थी जिसे उसके पिता बड़ी मुश्किल से दे पाते थे. कई बार समय पर फीस जमा न होने पर उसे स्कूल में डांट पड़ती जिसे सहन करने की उसे आदत पड़ गयी थी. कई बार दोस्त-यार भी उसकी मदद कर देते थे. रोज शाम को वह पुलिस ग्राउंड में जाकर हाकी मैच देखते रहता और मैदान में खेल रहे खिलाड़ियों की हरकतों पर गौर करता. उसका सपना था कि एक दिन वह हाकी-स्टिक को अपने हाथों से पकड़ कर बाल के पीछे दौड़े लेकिन वह तो अपनी गरीबी के पीछे दौड़ रहा था.

काशी को एक उपाय सूझा, उसने देखा कि छीन के झाड़ की टहनी हाकी-स्टिक की तरह मुड़ी हुई होती है, उसने मोटी टहनी तोड़ी, छील-छालकर उसे चिकना किया और अपनी कामचलाऊ स्टिक बना ली. मसानगंज के ईदगाह मस्जिद के खुले मैदान में कुछ हमउम्र बच्चों को इकठ्ठा किया और बच्चों की हाकी टीम तैयार की जो एक पेड़ की टहनियों के सहारे बिलासपुर के खेल-भविष्य की इबारत लिख रही थी.

उस दिन स्कूल में काशीराम को हॉकी मिली. हॉकी को पकड़कर वह जमीन पर बैठ गया, ख़ुशी के मारे रोने लगा जैसे उसकी पुरानी मन्नत पूरी हो गयी हो. उस दिन हॉकी ने भी काशी के हाथों में अपना हाथ दे दिया और अपना जीवन साथी बना लिया. काशी की ख़ुशी तो बाहर आ गयी लेकिन हॉकी चुपचाप रही क्योंकि वह  देखना चाहती थी कि काशी उसका साथ कैसा निभाता है?

हॉकी के खेल के नियम जो भी हों लेकिन उसकी खेलने की शैली हमारे जीवन शैली से बहुत मिलती-जुलती है. हॉकी को युद्ध की तरह खेला जाता है, जीत हासिल करने के लिए. जीत दोनों टीम को चाहिए लेकिन जीतेगा कोई एक. सवाल यह होता है कि कौन जीतेगा? जीतता वह है जो हारता नहीं है. जैसे, हमारा शरीर है, असंख्य ज्ञात-अज्ञात क्रियाओं का अद्भुत तालमेल, उसी तरह हॉकी का खेल शारीरिक दक्षता, मानसिक गुणा-भाग और सामूहिक प्रयास का परिणाम है. खेल में जीत या हार का पूरा दारोमदार 'टीमवर्क' पर निर्भर है, बिलकुल हमारी दुनियावी सफलता या असफलता की तरह. 

जिस तरह हमारा परिवार में टीम भावना के जरिए परिवार के सदस्यों की उन्नति का कथानक लिखा जाता है. परिवार की अवधारणा एक-दूसरे को सहारा देने की भावना से आरम्भ हुई. जिन परिवारों ने इस सूत्र को समझकर काम किया वे प्रगति की राह पर लगातार बढ़ते चले गए, जो नहीं समझ सके वे रसातल में चले गए. बिलकुल यही हॉकी में होता है. जब सब खिलाड़ी मिलजुलकर, सही तालमेल के साथ खेलते हैं तो जीतने की संभावना अपने-आप बढ़ जाती है. 

'अम्मा, आज हाकी को छू कर देखा हूँ.' काशी ने घर आकर बताया.
'अच्छा? कैसी होती है हाकी? अम्मा ने पूछा. 
'बिल्कुल तेरी जैसी.'
'मेरी जैसी?'
'जैसे तुझे छू कर अच्छा लगता है, वैसा ही हाकी को छू कर लगा.'
'मुझे तो बहुत डर लगता है तेरे खेल-कूद से. रोज गिरता है और हाथ-पैर में चोट लगाकर आ जाता है.'
'ये तो होता ही है.'
'घर में रहा कर. क्यों लाठी-डंडे का खेल खेलता है?'
'ठीक है, अब सावधानी के साथ खेलूंगा.' काशी ने अम्मा को आश्वस्त किया.

म्युनिस्पल स्कूल में स्पोर्ट्स इंचार्ज थे अब्दुल गफ्फार मास्साब. वे खेल के आशिक थे, खास तौर से हॉकी के. कक्षा VIII-डी के कुछ लड़कों में उनको संभावना दिखी तो उन्होंने राबिन्सन मास्साब से बात की, 'आठवीं के चार-पांच लड़कों का खेल मैंने देखा है, कुछ सातवीं और छठवीं के भी हैं. उनको अगर प्रशिक्षण दिया जाए तो अपनी स्कूल की हॉकी टीम तैयार हो सकती है. तुम हॉकी के जानकार हो, इन बच्चों को ट्रेनिंग दोगे?'
'क्यों नहीं.' राबिन्सन मास्साब ने उत्तर दिया.
'मेरा पूरा सपोर्ट रहेगा. सब सामान दूंगा, तुम पंद्रह लड़कों को सिलेक्ट कर लो. इनमें काशी नाम का लड़का बहुत होनहार खिलाड़ी है. कुछ लड़के उसके साथ ईदगाह में खपटा को हॉकी बनाकर खेलते है, उन लड़कों को भी स्कूल में भर्ती कर लो मैं प्रधानाचार्य से बात कर लेता हूँ.' गफ्फार मास्साब ने कहा. 

अगले दिन से राबिन्सन मास्साब ने म्युनिस्पल स्कूल की हॉकी टीम के गठन का काम शुरू कर दिया. महीने भर के अन्दर काशी के अलावा अब्दुल कादिर, सलाम बक्श, मुजीब, ज़हीर, रम्मू सिन्हा, रशीद,  सुधीर आनंद, नत्थू शर्मा, करीम, गफ्फार, सत्तार, सूरज मिश्रा, राजेन्द्र मिश्रा आदि को लेकर सीखने-सिखाने का लम्बा दौर शुरू हो गया. 

उस समय किसी को कल्पना भी न थी कि बिलासपुर के म्युनिस्पल स्कूल में गफ्फार मास्साब के और राबिन्सन मास्साब निर्देशन में ऐसी हॉकी टीम 'शेप' ले रही है जिसके खिलाड़ियों को आगे चलकर देशव्यापी प्रसिद्धि मिलने वाली है. 

स्कूल हर साल पुरानी और 'डेमेज' हॉकी की नीलामी होती थी. गफ्फार मास्साब स्कूल के बच्चों को ही बेच देते थे, सस्ते में. चार आने में एक हॉकी ! बच्चे उन हाकियों को सुधारकर स्कूल के बाहर के मैदानों में खेलते. कुछ उत्साही बच्चों के अच्छे खेल को देखकर गफ्फार मास्साब उनसे पुरानी हॉकी लेकर उन्हें स्कूल के नयी हॉकी दे देते थे, चुपचाप. गफ्फार और राबिन्सन मास्साब की जोड़ी ने म्युनिस्पल स्कूल की जो टीम तैयार की वह आगे चलकर बिलासपुर की टीम हो गयी और इसी टीम के कई खिलाड़ी मध्यप्रदेश की टीम के सदस्य बने और काशीराम ने तो नेशनल टीम में भी अपनी जगह बनाई.

अधिकतर खिलाड़ी पढ़ाई में कमजोर थे लेकिन उन्हें कभी इसके लिए क्लास में लज्जित नहीं किया गया, न ही वे किसी क्लास में फेल हुए. सब इनको आदर से देखते थे क्योंकि ये अपने हुनर में उस्ताद थे और लोगों के लिए आकर्षण के केंद्र. इनमें काशीराम को को लोग अपेक्षाकृत अधिक पसंद करते थे क्योंकि वह मीठे स्वभाव का इन्सान था. हर समय उसके चेहरे में मुस्कान विद्यमान रहती थे और मिजाज़ हर पल एकदम ठंडा.

१९६० में आयोजित 'इन्डियन स्कूल नेशनल टूर्नामेंट' में मध्यप्रदेश से चार खिलाड़ी चयनित हुए जिनमें बिलासपुर से काशीराम अकेला था. इसी सन की बात है, एक हॉकी टूर्नामेंट में मध्यप्रदेश पुलिस की नामी हॉकी टीम मध्यप्रदेश स्कूल की टीम से हार गयी. स्कूली टीम में से चार खिलाड़ी बिलासपुर के थे. बिलासपुर पुलिस के सर्वोच्च अधिकारी रंजीतसिंह (डी.आई.जी.) स्वयं हॉकी के अच्छे खिलाड़ी थे, खबर उन तक पहुंची. वे सुबह के समय पुलिस ग्राउंड में चल रहा प्रेक्टिस मैच देखने पहुँच गए. उन खिलाड़ियों के खेल से वे अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने उनमें से काशीराम, ओमप्रकाश वर्मा, सलाम बक्श और रशीद खान को पुलिस सेवा में भर्ती होने का आकर्षक प्रस्ताव दिया. सब ख़ुशी-ख़ुशी मान गए और उन्हें 'खेल-कोटा' में सिपाही पद पर नियुक्ति मिल गयी. इन खिलाड़ियों को कोई भी विभागीय कार्य नहीं मिला बल्कि तात्कालीन मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में हाकी की 'प्रेक्टिस' में झोंक दिया गया. काशीराम को स्कूल की पढ़ाई करते-करते नौकरी मिल गयी, उसकी पढ़ाई छूट गयी परन्तु उसकी आर्थिक हालत सुधर गयी. उसी समय बिलासपुर में कुछ अन्य खिलाड़ी भी हॉकी के अपनी उपस्थिति दर्ज की जैसे मधुप टंडन, सूर्यकिरण बिसेन, दामोदरन नायडू.

सन १९६० से लेकर १९६४ तक हर वर्ष वह 'नेशनल स्कूल्स टीम' में चुना जाता रहा. उस टीम में मध्यप्रदेश का प्रतिनिधित्व करने वाला काशीराम अकेला खिलाड़ी था. उसे सेंटर फॉरवर्ड खेलना पसंद था क्योंकि दौड़ने में तेज होने के कारण यदि वह गेंद पा जाता तो दूसरे खिलाड़ी उसे भागते हुए देखते रह जाते और वह विरोधी टीम के गोलपोस्ट पर पलक झपकते पहुँच जाता. उसकी चपलता से प्रभावित होकर ओलिम्पियन हमीद (झांसी) ने उसे गोल मारने की एक तकनीक सिखाई जिसे कहते हैं, 'रांग फुट'. 

सामान्यतया जब भी कोई खिलाड़ी गोल करने के लिए शाट मारता है तो अपने बायाँ पैर पीछे ले जाकर एक 'पोजीशन' बनाता है तब दाहिने पैर के पास रखी बाल को हिट करता है, इससे शाट में पावर आता है और बाल गोलपोस्ट में तेजी से घुस जाती है. होशियार गोलकीपर ताड़ लेते हैं कि बाल किस तरफ से घुसेगी और वे उस अनुमान के आधार पर आक्रमण से अपना बचाव कर लेते हैं. हमीद 'रांग फुट' से शाट मारा करते थे अर्थात अपना बायाँ पैर पीछे ले जाए बिना, खड़े-खड़े सीधा शाट मार देते थे. इस अजीब तकनीक के कारण गोलकीपर को पता ही नहीं चलता था कि बाल कहाँ से आएगी और जब तक वह अनुमान लगाता तब तक गोल हो जाता था. हमीद के मार्गदर्शन में काशी इस तकनीक का विशेषज्ञ हो गया और अपने गुरु से आगे बढ़ गया. कालांतर में नेशनल प्लेयर प्यारा सिंह (कलकत्ता) और मोहम्मद अहसान (मुरादाबाद) ने भी काशी को खेल के और भी कई गुर सिखाए.

काशी डरपोक था, चोट लगने से डरता था इसलिए किसी खिलाड़ी से भिड़ता नहीं था, किसी साथी खिलाड़ी ने यदि उसकी तरफ बाल बढ़ा दी तो फिर वह बाल को लेकर आगे बढ़ जाता था लेकिन किसी विरोधी खिलाड़ी से बाल छीनने का साहस नहीं करता था क्योंकि हॉकी के खेल में स्टिक केवल बाल खेलने के लिए नहीं होती, वरन सामने वाले की टांग तोड़ने के लिए भी होती है. हमारी स्कूली टीम में रम्मू सिन्हा 'राईट बैक' खेलता था जो सामने से आ रही बाल को रोकने के लिए अपनी स्टिक का बहु-उद्देशीय उपयोग करता था, उससे भिड़ने में सब डरते थे.

बात पुरानी है, बिलासपुर में आयोजित 'आल इंडिया हाकी टूर्नामेंट' में मध्यप्रदेश पुलिस और बिलासपुर रेंज पुलिस के मध्य मुकाबला चल रहा था. आम तौर पर दोस्ताना माहौल रहता था लेकिन उस दिन खेल की शुरुआत मार-धाड़ से हुई और बात लगातार बिगड़ती गयी. मध्यप्रदेश पुलिस की टीम में एक मरकनहा खिलाड़ी था, नारायण सिंह, बेक पोजीशन में खेलता था, वह खिलाड़ियों को चोटिल करने का विशेषज्ञ था. काशीराम उसको देखकर दूर भाग जाता था. नारायण सिंह उसके डर को भांप गया और मौक़ा पाकर काशीराम के पैर में स्टिक से प्रहार किया. काशीराम पैर पकड़कर मैदान में बैठ गया. नारायणसिंह से उसे ललकारा और उकसाया भी. काशीराम भन्नाते हुए अपनी स्टिक का सहारा लेकर खड़ा हुआ और लंगड़ाते हुए खेलने लगा. बदले की भावना से सराबोर काशीराम ने उस दिन गोल करने की हेट्रिक बनाई और अपनी टीम को जिताया भी. 

सन १९६४ के तोक्यो में आयोजित होने वाले खेल में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व करने वाली टीम की चयन प्रक्रिया जालंधर में जारी थी. मध्यप्रदेश से काशीराम को भेजा गया. पंद्रह दिनों की कड़ी चयन प्रक्रिया से गुजरने के बाद टीम की घोषणा अगली सुबह होने वाली थी. काशीराम का जी धुक-धुक कर रहा था. शाम के समय वरिष्ठ ओलिम्पियन लक्ष्मण (गोलकीपर) ने काशीराम से कहा, 'बधाई, तुम हमारे साथ तोक्यो जा रहे हो, मिठाई मंगवाओ.'
'सच में सर?' काशीराम ने पूछा.
'हाँ, यह सच है.'
'पर अभी तो घोषणा नहीं हुई?'
'घोषणा कल सुबह हो जाएगी, सिलेक्ट टीम की पूरी जानकारी मेरे पास है.'
'सर, विश्वास नहीं हो रहा है.'
'विश्वास कल कर लेना, आज मुंह मीठा कराओ.'
'ठीक है सर, अभी मंगवाता हूँ.' काशीराम ने ख़ुशी में फुदकते हुए कहा. जिस स्थल पर यह चल रहा था, वह सर्वथा प्रतिबंधित क्षेत्र था, किसी का भी आना जाना मना था लेकिन एक स्टाफ को मना-पटा कर एक डिब्बा मिठाई मंगवाई गयी. सबने मिलकर खाया और ख़ुशी मनाई. अगली सुबह जब लिस्ट घोषित हुई तो उसमें काशीराम का नाम नदारत था, उसकी जगह पंजाब का लेफ्ट-आउट दर्शन सिंह को चुन लिया गया. काशीराम आसमान में उड़ने की तैयारी कर रहा था, अचानक लगा, जैसे ओलिम्पिक में फॉरवर्ड खेलना एक सपना था जो आँख खुली और टूट गया. काशीराम का दिल टूट गया.

समय सब भुला देता है. ओलिम्पिक में न चुने जाने का दर्द भी धीरे-धीरे कम हो गया. काशी के खेल में और भी निखार आता गया. उस समय काशीराम मैच जीतने की गैरंटी बन गया. उसके शानदार खेल की खबर ONGC  और भारतीय रेलवे तक पहुँच गयी. दोनों संगठनों ने खिलाड़ी के रूप में नौकरी आफर की लेकिन बिलासपुर में बने रहने की चाहत में उसने ठुकरा दिया. काशीराम को पुलिस सेवा में एक पदोन्नति मिली और सेवाकाल समाप्त हो जाने के बाद सेवानिवृत्ति. 

इस बीच पैंतीस वर्ष की आयु में काशीराम ने ब्याह किया. उनकी संतान नहीं हुई इसलिए वे मोहल्ले के सभी बच्चों को अपना मानते थे, उनके साथ खेलते थे उनकी मदद करते थे. एक सुबह उनके सीने में दर्द उठा और ८० वर्ष की आयु में को उनका निधन हो गया.

काशीराम बिलासपुर के मस्तक पर चंदन का महकता हुआ टीका था जो अपनी खुशबू बिखेरते हुए हमसे सदा के लिए दूर चला गया.  

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