Monday, 31 May 2021

तेरी मेरी कहानी है : छः : किस्सा स्वामी ऋजुडा का :

किस्सा स्वामी ऋजुडा का :


यह सब सितम्बर 2001 में शुरू हुआ, एक महिला योग के बारे में बात करने के लिए हमारे हॉस्टल में आई। यह सुनकर कि कैसे योग हमारी याद्दाश्त और एकाग्रता बढ़ा सकता है, कैसे यह हमें स्वस्थ रखता है, और इसके कौन-कौन से दूसरे फायदे हैं? हममें से बहुतों ने बीएचईएल टाउनशिप में होने वाले ईशा योग कार्यक्रम के लिए अपना रजिस्ट्रेशन करवा लिया। हमारा इंजीनियरिंग कॉलेज तिरुचिरापल्ली के बाहरी इलाके में था और बीएचईएल की टाउनशिप वहां से कुछ ही किलोमीटर दूर थी।

जैसे ही मैं हॉल के अन्दर गया, मैंने कुर्सी पर एक दाढ़ी वाले आदमी की तस्वीर देखी। मैं थोड़ा चिढ़ गया। मैं इस ‘गुरु जी’ वाले झमेले में नहीं पड़ना चाहता था। हालांकि, जैसे-जैसे दिन गुज़रते गए, मैं कार्यक्रम में पूरी तरह शरीक होता गया। उन दिनों कार्यक्रम में सद्‌गुरु जग्गी वासुदेव के वीडियोज़ नहीं होते थे, शिक्षक ही पूरे कार्यक्रम का संचालन करते थे। पूरे कार्यक्रम के दौरान शिक्षक ने कभी भी सद्‌गुरु के बारे में बात नहीं की, सिवाय एक-दो बार के, जब उन्होंने कहा, ‘सद्‌गुरु कहते हैं कि अगर आप एक मिनट के लिए अपनी जागरूकता बरकरार रख सकें, तो कल जब आप यहां आएंगे, आप एक बुद्ध होंगे।’ मैंने सोचा, ‘वह व्यक्ति जो खुद एक बुद्ध नहीं है, यह बात नहीं कह सकता,’ और मैं सद्‌गुरु को लेकर उत्सुकता से भर गया। मैं सोचने लगा कि क्या वास्तव में आज की दुनिया में एक जीते-जागते ऋषि, एक जीवित गुरु मौजूद हैं?
कार्यक्रम के दौरान जब मैंने वालंटियर्स को 'भाव स्पंदन' कार्यक्रम के उनके अनुभवों को साझा करते हुए सुना, तो मैंने सोचा, ‘ये सभी पवित्र लोग हैं। केवल पवित्र लोग ही प्रेम, शांति और आनन्द की इतनी गहरी अवस्थाओं का अनुभव कर सकते हैं। यह निश्चित रूप से मेरे लिए तो संभव नहीं होगा।’ फिर भी, भाव स्पंदन का अनुभव करने की एक गहरी चाहत मेरे अन्दर उमड़ पड़ी। आने वाले कार्यक्रम में रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे, इसलिए मैं चुप रहा। किसी तरह बीएचईएल के एक वालंटियर को यह बात पता चल गई। उन्होंने मेरी फ़ीस भर दी और प्यार से कहा, ‘तुम कार्यक्रम के लिए जाओ। जब तुम्हारे पास पैसे हों, तब लौटा देना।’

मैं बहुत ज्यादा उत्साहित था, भाव स्पंदन में भाग लेने वाला था, आश्रम देखने वाला था और सद्‌गुरु के दर्शन करने वाला था! जब मैं आश्रम पहुंचा तो, मुझे लगा कि मैं स्वर्ग में आ गया हूँ। भाव स्पंदन के पहले सत्र के लिए, हम स्पंदा हॉल में करीने से रखी गई कुर्सियों पर बैठे थे। मुझे हॉल की बायीं ओर एक छोटा सा लोहे का दरवाज़ा दिखाई दिया। मैंने सोचा, ‘हो-न-हो, सद्‌गुरु ज़रूर इसी दरवाज़े से हॉल में प्रवेश करेंगे,’ और मैंने अपनी निगाहें उधर जमा लीं। वे आए! मैं उन पर से अपनी नज़रें हटा ही नहीं पा रहा था।
कार्यक्रम शुरू हुआ और मैंने पूरी तरह से खुद को उस प्रक्रिया में झोंक दिया। और जो अनुभव मुझे हुए, वे तीव्रता, प्रेम, मदहोशी, आनन्द, और स्थिरता की एक तेज़ बहाव वाली बाढ़ जैसे थे। मुझे पहले कभी ऐसे अनुभव नहीं हुए थे। मैं बस अपने सामने बैठे किसी व्यक्ति को देखता, या अपनी प्लेट में रखे भोजन को देखता, या किसी पौधे को देखता, और मेरी आंखों में आंसू आ जाते। मैंने अपने आस-पास की हर चीज़ के साथ एक गहरी एकरूपता महसूस की। मुझे एहसास हुआ कि मैं इतना तुच्छ और मूर्ख हूँ कि जो ठीक मेरी आंखों के सामने था, उसकी ओर आंखें बंद किए हुए मैंने अपने जीवन के 21 साल बर्बाद कर दिए थे। भाव स्पंदन के अनुभव के बाद, मैं अपनी साधना बिलकुल नियमित रूप से करने लगा, जैसा पहले नहीं होता था।
अगले साल, मैंने 'सम्यमा' कार्यक्रम में हिस्सा लिया। मैं सम्यमा में यह सोचकर गया था कि मैं अपने पिछले जन्मों के बारे में जान पाऊँगा, मुझे आत्मज्ञान हो जाएगा, मेरी कुंडलिनी जागृत हो जाएगी, लेकिन वैसा कुछ भी नहीं हुआ। असल में, मुझे यातना महसूस हो रही थी क्योंकि मैं तो ध्यान भी नहीं कर पा रहा था। मेरा मन फुल-स्पीड पर भाग रहा था, और मेरे मन में कई सवाल थे जिन्हें मैं मौन में होने के कारण पूछ भी नहीं सकता था लेकिन शाम के सत्संग में सद्‌गुरु आते और एक-एक करके मेरे सारे सवालों के जवाब दे देते तो मैं भौंचक्का रह जाता। जब भी वे हॉल में होते तो पूरे वातावरण में एक अलग ही प्रकार की ऊर्जा महसूस होने लगती और ऐसा लगता कि वहां होने वाली हर एक चीज़ पर उनका पूरा नियंत्रण है। वहां ऐसी चीज़ें हो रही थीं जो किसी सामान्य व्यक्ति की समझ से भी परे थी। हालांकि मैंने सम्यमा में कुछ भी अनुभव नहीं किया, लेकिन सिर्फ उस वातावरण में मौजूद रहकर मैं पूरी तरह से हिल गया। मैंने सोचा कि जब सद्‌गुरु जैसे महापुरुष जीवित हैं, तो उनकी छाया में रहने के सिवाय कुछ और करना मूर्खता होगी।
ध्यान ने मेरे साथ टाल-मटोल करना जारी रखा। ध्यानलिंग के भीतर या ‘प्रेजेंस टाइम’ के दौरान अपनी आंखें बंद करके बैठना मेरे लिए एक संघर्ष था, क्योंकि मुझे कुछ भी महसूस नहीं होता था। हालांकि, एक महीने के प्रशिक्षण के दौरान, मैंने देखा कि ईशा में की जाने वाली हर चीज़ मानवता के कल्याण के लिए की जाती है और उनके पीछे कोई भी स्वार्थ नहीं छुपा है। ईशा में यह समर्पण और सकारात्मकता देखने के बाद मुझे यह स्पष्ट हो गया कि मैं अपने जीवन में यही करना चाहता हूँ – सद्‌गुरु के हाथों में एक साधन बन जाना लेकिन, मुझे और मेरी दो बहनों को बाहर अच्छे कॉलेजों में पढ़ाने के लिए भेजने में मेरे माता-पिता द्वारा किए गए सभी संघर्षों की याद मुझे पीड़ा दे रही थी।
जब मैंने इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा में अच्छी रैंक हासिल की, तब मेरे पिता जी को मेरी कॉलेज की फ़ीस और दूसरे खर्चों के लिए पैसे उधार लेने पड़े थे। जिस दिन मैंने कॉलेज में दाखिला लिया, तब से मैं उस दिन का इंतज़ार कर रहा था जब मेरी नौकरी लगेगी और मैं अपने परिवार को सहारा देने लायक बन पाऊंगा। अब, जब मेरे पास एक अच्छी नौकरी थी, मेरे शरीर की हर कोशिका ईशा में होने की चाह कर रही थी। मेरा दिल दो टुकड़ों में फटा जा रहा था।
उस समय सद्‌गुरु अमेरिका गए हुए थे। जैसे-जैसे प्रशिक्षण का महीना खत्म होने को आया, मेरे दिल का दर्द असहनीय हो गया। एक शाम, मैं ध्यानलिंग गया और एक घंटे तक अपने दिल में इस तीव्र दर्द के साथ बैठा रहा। मैं सचमुच सद्‌गुरु से भीख मांग रहा था कि वे मुझे रास्ता दिखाएं। नाद आराधना के बाद, मैं प्रेजेंस टाइम के लिए स्पंदा हॉल में वापस आ गया। मैंने सद्‌गुरु की तस्वीर के सामने बैठकर अपनी आंखें बंद कीं, और जीवन में पहली बार, मैंने सद्‌गुरु की उपस्थिति महसूस की। ऐसा लगा मानो मैं उनकी गोद में बैठा हुआ हूँ। मेरे शरीर की हर कोशिका उनकी कृपा से सराबोर थी। वे अमेरिका में थे, लेकिन मेरे अनुभव में, वे यहीं थे – खुद को मेरे सामने प्रकट कर रहे थे और मुझे अपने आगोश में ले रहे थे। मैं रोता रहा, रोता रहा, रोता रहा – पता नहीं कितनी देर तक।
अब मुझे पता चल चुका था कि मुझे अपने जीवन में क्या करना है।
सम्यमा के कुछ ही महीनों बाद मेरी कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने वाली थी और मुझे तिरुचिरापल्ली छोड़कर नौकरी के लिए पुणे जाना था। उस समय पुणे में ईशा के कार्यक्रम नहीं होते थे, और न ही मेरे शहर बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में। मैं बहुत दुखी था क्योंकि मैं ईशा के साथ संपर्क खोना नहीं चाहता था। जब मैंने आश्रम में होने वाले एक महीने के ‘शिक्षक प्रशिक्षण’ कार्यक्रम के बारे में सुना तो मैंने यह सोचते हुए आवेदन कर दिया कि इससे मुझे पुणे में ईशा के कार्यक्रमों को शुरू करने में मदद मिलेगी। सौभाग्य से, मेरी परीक्षाओं के खत्म होने के ठीक अगले दिन प्रशिक्षण शुरू होना था। तो, जैसे ही मेरा आखिरी पेपर पूरा हुआ, मैंने खुशी-खुशी अपना सामान बांधा और कोयम्बटूर जाने वाली बस में चढ़ गया।
महीना खत्म होने के बाद मैं वापस घर आ गया। घर पर हर कोई मेरी नई नौकरी को लेकर बहुत उत्साहित था। जैसे ही मैंने ये इशारा किया कि शायद मैं नौकरी जॉइन न करूं, कयामत ही आ गई! मेरे माता-पिता, परिवार के दूसरे सदस्य, दोस्त – सभी मुझ पर बरसने लगे। मुझे उनकी प्रतिक्रिया पर हैरानी हो रही थी, क्योंकि मुझे हमेशा लगा था कि वे मेरा समर्थन करेंगे। यह समझने में मुझे थोड़ा समय लगा कि मेरी पढ़ाई के उन चार सालों के दौरान उन्होंने मेरे जीवन को लेकर बड़े-बड़े सपने बुन लिए थे। वे अपने बेटे के लिए सिर्फ यह चाहते थे कि वो एक अच्छा जीवन जिए, लेकिन समाज के प्रभाव ने उन्हें यह विश्वास दिला दिया था कि अच्छा जीवन यानी ऊंची तनख्वाह वाली नौकरी होना, अमेरिका जाना, शादी करना, बच्चे पैदा करना, वगैरह-वगैरह।
एक दिन जब मेरी माँ मुझसे मेरा फैसला बदलवाने की कोशिश कर रही थीं, मैंने पूछा, ‘माँ, हमने अपने समाज में कई परिवारों को बहुत नजदीक से देखा है। जिन लड़कों के पास अच्छी नौकरी है, उनमें से कितने स्वर्ग में जी रहे हैं? जो अमेरिका में हैं या जिनकी शादी हो गई है, उनमें से कितने स्वर्ग में जी रहे हैं?’
उन्होंने कहा, ‘कोई भी नहीं!’
मैंने उनसे पूछा, ‘क्या आपको सच में लगता है कि मैं जो करना चाहता हूँ, वो गलत है?’
उन्होंने कहा, ‘नहीं, लेकिन…।’
मैं उनसे यह ‘लेकिन’ नहीं छुड़वा पाया, क्योंकि मैंने अपने भीतर जो महसूस किया था, उसे मैं शब्दों में बयान नहीं कर पा रहा था।
मैंने अपने घरवालों को बताया कि जून के अंत तक मैं आश्रम के लिए रवाना हो जाऊंगा क्योंकि मैंने एक कार्यक्रम में वालंटियर के रूप में मौजूद होने का वादा किया था। जब मैं घर से निकल रहा था, मेरे पिता जी ने मुझे ट्रेन की टिकट दी, और कहा, ‘लगता है कि तुमने जाने का मन बना लिया है। कम से कम बैठकर जाओ, खड़े-खड़े मत जाओ।’
मेरी माँ उनके साथ झगड़ने लगीं, ‘आप इसके जाने के लिए ट्रेन की टिकट लेकर आए हैं? क्या आप पागल हो गए हैं?’
खैर, वे दोनों मुझे छोड़ने के लिए रेलवे स्टेशन आए, और मैं सद्‌गुरु के एक कार्यक्रम में वालंटियरिंग करने के लिए समय पर आश्रम पहुंच गया।
लगभग 15 दिनों के बाद, पिता जी ने मुझे फोन किया। उन्होंने कहा, ‘तुम्हारी माँ अस्पताल में हैं। उन्होंने पिछले सात दिनों से कुछ भी नहीं खाया है। डॉक्टरों को उनके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है क्योंकि उन्होंने जीने की सारी इच्छा खो दी है। वैसे भी तुमने वहाँ रहने का मन बना लिया है' बस आखिरी बार घर आ जाओ। वे कुछ दिनों में मर जाएँगी। उनकी चिता को आग लगा देना और उसके बाद तुम जहाँ चाहे जा सकते हो,’ उन्होंने बहुत दुख भरी आवाज़ में कहा। यह सुनकर मेरा दिल ही डूब गया।
‘ये शानदार लोग जिन्होंने मुझे जन्म दिया, इतने प्यार से मुझे पाला और बड़ा किया, मेरी खातिर अपने जीवन में इतनी सारी चीज़ों की कुर्बानी दी और मुझे अपने पैरों पर खड़े होने के काबिल बनाया और मैं बदले में उनके साथ क्या कर रहा हूँ?’ मेरा सिर इस तरह के विचारों के साथ चकराने लगा। पूरी बात पर एक बार फिर से गौर करने लिए मैं अपने भीतर मुड़ गया। लेकिन, एक बार फिर, यह बात मेरे सामने साफ़ थी कि मेरा इरादा उन्हें दुख देने का नहीं था, और मुझे यह भी पता था कि आज जो मैं कर रहा हूँ, एक दिन उन्हें उस पर गर्व होगा। मैंने इस परिस्थिति को इस मार्ग के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की परीक्षा के रूप में भी देखा। मुझे स्पष्ट रूप से अपना ऐसा सोचना याद है, ‘अगर आज मैं अपने गुरु के चरणों को छोड़कर चला गया, तो मैं फिर कभी वापस नहीं आ पाऊंगा।’ मैंने अपनी माँ के भाग्य को सद्‌गुरु के हाथों में छोड़ने का फैसला किया। ‘अगर सद्‌गुरु को लगता है कि उनके जाने का समय आ गया है, तो उन्हें जाने दें। अगर सद्‌गुरु को लगता है कि उन्हें अभी रुकना चाहिए, तो उन्हें रुकने दें। मैं उनसे कुछ भी नहीं मांगूंगा।’ यहां तक कि अपने भीतर भी, मैंने सद्‌गुरु से उनका ध्यान रखने की गुज़ारिश नहीं की। मैंने यह बस उनके ऊपर छोड़ दिया।
माँ की तबीयत कुछ दिनों में ठीक हो गई। दो हफ्तों के बाद, वे दोनों मुझे वापस ले जाने के लिए आश्रम आए। वे सुबह आए थे और उनकी योजना शाम को मुझे लेकर वापस लौटने की थी। मैंने खुशी-खुशी उनका सबसे परिचय कराया, उनके लिए चित्रा ब्लॉक में पहाड़ के नज़ारे वाला एक कमरा लिया, और दिन भर उनके साथ ही रहा। जब शाम हुई, मेरी माँ ने कहा, ‘मुझे पागल कुत्ते ने काटा होगा जो मैं अपने बेटे को इस स्वर्ग से लेकर जाऊँगी!’
अब मेरे पिता जी की उनसे झगड़ने की बारी थी। ‘हम इसे वापस ले जाने के लिए आए हैं और तुम कह रही हो कि ये स्वर्ग है?’
उन्होंने कहा, ‘क्या आपके पास आंखें नहीं हैं? क्या आपको ये जगह और यहाँ के लोग दिखाई नहीं देते? क्या हम कभी भी अपने बेटे को ऐसी ज़िन्दगी दे सकते हैं? अगर हमारे पास थोड़ी सी भी समझ है, तो हमें भी यहां आकर इसके साथ रहना चाहिए। इसे यहीं रहने दीजिए।’
आखिरकार, मुझे उनका आशीर्वाद मिल गया था!
मेरे आश्रम आने के कुछ महीनों बाद सद्‌गुरु की नई किताब ‘मिस्टिक्स म्यूज़िंग्स’ जारी की गई। मैंने एक प्रति ले ली और मैं उस किताब को नीचे ही नहीं रख पाया। जैसे-जैसे मैं उस पुस्तक में गहरा उतरता गया, मेरे मन में एक सवाल उभरने लगा – ‘वे वास्तव में कौन हैं? वे अस्तित्व के विभिन्न आयामों के बारे में इतनी स्पष्टता से बात कर रहे हैं, और साफ़ है कि वे यह सब अपनी खुद की आंखों से देख पा रहे हैं। एक इंसान ये बातें नहीं जान सकता, केवल भगवान ही इन बातों को जान सकते हैं।’ मैं बस इंतजार कर रहा था कि कब मुझे मौका मिले और मैं सद्‌गुरु से पूछूं, ‘आप वास्तव में कौन हैं?’
दिसम्बर 2003 में, मिस्टिक्स म्यूज़िंग्स किताब के प्रचार के एक हिस्से के रूप में, उस किताब से जुड़े सवालों को संबोधित करने के लिए सद्‌गुरु को चेन्नई के लैंडमार्क बुकस्टोर्स में आमंत्रित किया गया। बुकस्टोर के भीतर थोड़ी सी जगह में सवाल पूछने के लिए कुछ लोग इकट्ठा हुए थे। मैं वहां वालंटियरिंग कर रहा था, और मुझे यह काम मिला था कि जो लोग सवाल पूछने के लिए हाथ खड़ा करते हैं, मुझे दौड़कर उनके पास जाना है और उन्हें माइक देना है। मैं अपना सवाल पूछने के लिए बेताब था, लेकिन अपने सवाल के लिए माइक का इस्तेमाल करने में मुझे बहुत झिझक हो रही थी। सत्र के दौरान, पहली पंक्ति में बैठी एक महिला ने अपना हाथ उठाया। मैं उन्हें माइक देने के लिए दौड़ा। जब सद्‌गुरु ने उस महिला के सवाल का जवाब देना शुरू किया, मैं वहीं फर्श पर बैठ गया, सद्‌गुरु से बमुश्किल 10 फुट की दूरी पर। मुझे याद नहीं कि वह सवाल क्या था, और न ही मुझे ये याद है कि सद्‌गुरु ने क्या जवाब दिया। लेकिन अपने जवाब के बीच में कहीं, उन्होंने कहा, ‘अभी आप किसी और को देखकर सोच रहे हैं कि वो भगवान हैं। ऐसा सिर्फ इसलिए है क्योंकि आपने अभी एक इंसान होने की संभावना को नहीं जाना है।’
वे एक पल के लिए रुके, उन्होंने मेरी ओर देखा, और फिर अपना जवाब जारी रखा।
कोयम्बटूर में सद्‌गुरु के साथ पहले दो दिवसीय 'इनर इंजीनियरिंग' कार्यक्रम के दौरान मुझे ईशा ऑफरिंग्स काउंटर संभालने का काम सौंपा गया। पहले दिन, अंतिम सत्र के खत्म होने के बाद, मैं काउंटर के पीछे खड़ा किताबें, रुद्राक्ष, वगैरह खरीदने में प्रतिभागियों की सहायता कर रहा था। मैं कीमतों वगैरह की पूरी जानकारी लेकर तैयार था और मुझे लगा कि मैं सब कुछ अच्छी तरह संभाल रहा हूँ। सत्र खत्म होने के कुछ समय बाद, बाकी सभी वालंटियर्स अगले दिन की तैयारी के लिए हॉल के अन्दर चले गए, और मैं काउंटर पर अकेला था। सद्‌गुरु हॉल से बाहर आए और अपनी कार की तरफ़ जाने लगे। अचानक वे काउंटर के पास रुके और उन्होंने पूछा, ‘मैं किताबें साइन करने के लिए रुकूं या चला जाऊं?’ मैं बिलकुल अवाक रह गया। किसी ने भी मुझे यह नहीं बताया था. मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था कि क्या कहना है. मैं उनकी ओर अवाक होकर देखता रहा। उन्होंने कहा, ‘ठीक है, मैं जा रहा हूँ,’ और वे चले गए।
अगले दिन, मैंने सब कुछ पता कर लिया – उन्हें रुकने की ज़रूरत है या नहीं। अगर है, तो वे किताबें साइन करने के लिए कहां बैठेंगे… सब कुछ। स्वामी सुयग्ना ने मुझे एक और काम दिया - सद्‌गुरु के मंच पर आकर सोफे पर बैठने के बाद, मुझे उनके लिए माइक स्टैंड को सही जगह पर रखना होगा। मैंने सारी गतिविधियों का अभ्यास किया और पूरी तरह तैयार हो गया। जब सद्‌गुरु ने मंच की ओर चलना शुरू किया, तो मैं उनके पीछे था और मुझे पता था कि क्या करना है। पहली सीढ़ी चढ़ने से ठीक पहले उन्होंने पीछे मुड़कर पूछा, ‘मैं अपनी सैंडल यहीं छोड़ दूँ या मैं उन्हें ऊपर ले जा सकता हूँ?’ और बेचारा मैं… फिर से निरुत्तर रह गया।
मुझे लगता था कि मैं बहुत स्मार्ट हूँ और चीज़ों को सलीके से करता हूँ, लेकिन सद्‌गुरु का एक सवाल, और मेरी सारी स्मार्टनेस हवा हो जाती। मैंने धीरे-धीरे सीखा कि जब आप सद्‌गुरु के इर्द-गिर्द होते हैं, आपको बहुत ज्यादा सतर्क रहना होता है।
दिसम्बर 2008 में, दिल्ली में एक सत्संग के दौरान, एक वालंटियर ने सद्‌गुरु से इनर इंजीनियरिंग कार्यक्रमों को हिंदी में शुरू करने का निवेदन किया, क्योंकि उत्तर भारत में एक बड़ी जनसंख्या अंग्रेज़ी में सहज नहीं है। सद्‌गुरु ने तुरंत घोषणा कर दी, ‘हम अप्रैल में हिंदी कार्यक्रम शुरू करेंगे।’
मुझे पूरे कार्यक्रम का हिंदी अनुवाद करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। यह एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट था। देश भर से कई वालंटियर्स ने अनुवाद, प्रूफ रीडिंग, डबिंग और एडिटिंग में सहयोग किया। हमने सभी सत्रों के वीडियोज़ को हिंदी में डब किया, सिवाय शाम्भवी महामुद्रा दीक्षा वाले वीडियो के – जिसे सद्‌गुरु ने खुद हिंदी में रिकॉर्ड किया। पूरे प्रोजेक्ट में उम्मीद से कहीं ज्यादा समय लग गया, और हम अप्रैल 2010 में, मुम्बई में, पहला हिंदी इनर इंजीनियरिंग कार्यक्रम भेंट कर पाए। कम से कम हम वह महीना कायम रख पाए, जिसकी सद्‌गुरु ने घोषणा की थी!
पहले हिंदी कार्यक्रम के पहले दिन, परिचय वार्ता पूरी होने के बाद मैं डीवीडी प्लेयर के पास बैठ गया और मैंने सद्‌गुरु का वीडियो चलाने के लिए बटन दबाया। मेरा दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। हम नहीं जानते थे कि लोग डब किए गए वीडियो पर कैसी प्रतिक्रिया देंगे? जो वालंटियर्स सद्‌गुरु की आवाज़ सुनने के आदी थे, उन्हें वह वीडियो थोड़ा अजीब लगा, लेकिन प्रतिभागी उस वीडियो में रमे हुए थे। वे सद्‌गुरु को वैसे ही रिस्पोंड कर रहे थे जैसे हम उनके अंग्रेज़ी वीडियो देखते वक्त करते हैं। मैं देख सकता था कि यह वीडियो काम कर रहा है! मैं अपनी आंखों से बहते आंसू पोंछते हुए वहाँ बैठा रहा।
जल्दी ही हिंदी इनर इंजीनियरिंग कार्यक्रम उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों के कई शहरों में होने लगे, और सद्‌गुरु को हिंदी-भाषी क्षेत्र में भी जाना जाने लगा।
फरवरी 2015 में, शिवराज चौहान (तात्कालीन मुख्यमंत्री, मध्य प्रदेश) सद्‌गुरु से मिलने के लिए आश्रम आए। चूंकि मैं हिंदी भाषी क्षेत्र की गतिविधियों के प्रबंधकों में से एक था, मुझे उनकी मुलाकात के दौरान उपस्थित रहने के लिए कहा गया। बातचीत के दौरान, सद्‌गुरु जो कुछ भी कहते, मैं उसे जल्दी से लिख लेता और शिवराज जी और उनकी पत्नी के लिए उसका हिंदी में अनुवाद करता। कुछ समय बाद सद्‌गुरु ने कहा, ‘स्वामी, आप बहुत अच्छा अनुवाद कर रहे हैं।’ मैं खुश भी था और भौंचक्का भी – क्योंकि सद्‌गुरु से प्रशंसा पाना आसान नहीं है। रात के खाने के बाद, सद्‌गुरु उन्हें मंदिर परिसर में घुमाने ले गए। पूरे समय मैं उनके साथ था और लगातार अनुवाद कर रहा था। जब हम ‘निर्काया स्थानम’ पार कर रहे थे, तब सद्‌गुरु ने उस स्थान के बारे में बताया और कहा, ‘अब, स्वामी इसके बारे में मुझसे भी बेहतर तरीके से समझाएंगे।’ मैं तुरंत सतर्क हो गया। मुझे समझ आ गया कि पिछली कुछ पंक्तियों का अनुवाद करते हुए मैंने अपनी ओर से भी थोड़ा-बहुत जोड़ दिया था, जो मुझे नहीं करना चाहिए था, और सद्‌गुरु ने इशारे से मुझे मेरी गलती का एहसास कराया था।
सितम्बर 2016 में, मैं इंडियन लैंग्वेज पब्लिकेशन विभाग का हिस्सा बन गया और हिंदी अनुवाद मेरा फुल-टाइम काम बन गया। हम यह पक्का करना चाहते थे कि सद्‌गुरु की बातें हिंदी भाषी लोगों को उपलब्ध हों। तब तक, सद्‌गुरु नहीं चाहते थे कि हम डब किए हुए वीडियोज़ इंटरनेट पर डालें। इंडियन लैंग्वेज पब्लिकेशन विभाग में शामिल होने के तुरंत बाद, स्वामी चित्ता और मैंने लगातार दो महीनों तक सद्‌गुरु को एक के बाद एक पत्र लिखे, और उन्हें डब वीडियोज़ के कई नमूने भेजे। आखिरकार, वीडियो की गुणवत्ता बरकरार रखने के लिए कुछ खास दिशानिर्देश देते हुए, सद्‌गुरु ने वीडियोज़ डब करने की अनुमति दे दी।
2 जनवरी, 2017 को, हमने ‘सद्‌गुरु हिंदी’ यूट्यूब चैनल पर पहला हिंदी वीडियो अपलोड किया। हम बहुत ज्यादा उत्साहित थे और लगभग हर 10 सेंकड बाद दर्शकों की संख्या जांच रहे थे। यहाँ तक कि रात में भी, जब स्वामी चित्ता अपने दांत ब्रश कर रहे थे, मैंने उनसे उनके मोबाइल फ़ोन पर दर्शकों की संख्या देखने के लिए कहा। तब तक संख्या 100 पार कर चुकी थी, और हम सचमुच नाचने लगे! अक्टूबर 2017 तक, हम 1 लाख सब्स्क्राइबर पार कर चुके थे। आज, सद्‌गुरु हिंदी यूट्यूब चैनल के 31 लाख से ज्यादा सब्स्क्राइबर्स हैं, और 2 करोड़ से भी ज्यादा लोग हर महीने सद्‌गुरु के हिंदी वीडियोज़ देखते हैं।
मैंने इस मार्ग पर बहुत से संघर्षों का सामना भी किया है, और कई मौकों पर मुझे लगा कि मैं रास्ते से गिर जाऊंगा। लेकिन संघ, साधकों का यह सुंदर समुदाय, हमेशा मदद के लिए मौजूद होता है। स्वामी उल्लासा, माँ नैध्रुवा, माँ कश्यपी, स्वामी चित्ता, माँ दक्षिणा, और भी बहुत से लोगों ने मेरी बहुत ज्यादा मदद की है – कभी मेरा भार अपने कंधों पर लेकर, कभी मुझे एक कड़ी चेतावनी देकर, कभी इतना भरोसा देकर कि मैं उनसे कुछ भी साझा कर सकूं, और कभी एक विनम्र फीडबैक देकर।
अगर हाल का एक उदाहरण साझा करूं तो… कुछ महीनों पहले ऑफिस में एक स्थिति पैदा हो गई जिसने मुझे काफी असहज बना दिया। माँ ईडा भी वहाँ थीं और उन्होंने देखा कि मेरे साथ क्या हो रहा है, लेकिन उस समय उन्होंने कुछ नहीं कहा। अगले दिन, किसी दूसरी बातचीत के दौरान, मेरे साथ अपना अनुभव साझा करते हुए वे बोलीं, ‘कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं सबसे अच्छी जगह में रह रही हूँ, सबसे अच्छे लोगों के साथ हूँ, और सबसे अच्छा काम कर रही हूँ। हमारे सारे संघर्ष केवल भीतरी संघर्ष हैं। है कि नहीं, स्वामी?’ मैंने कहा, ‘हां, माँ। हमारे सारे संघर्ष केवल भीतरी संघर्ष हैं।’ अपने ही सौम्य तरीके से, मेरा ध्यान भीतर की ओर मोड़ने में उन्होंने मेरी मदद की।
सद्‌गुरु के साथ होने के अनुभव को शब्दों में अभिव्यक्त करना बहुत मुश्किल है। जब मैं उनके साथ सत्संगों या मीटिंग्स में होता हूँ तो, मुझे विश्वास ही नहीं होता कि मैं सच में सद्‌गुरु के सामने बैठा हूँ। जब मैं उनकी ओर देखता हूँ, तो मुझे उन पर अपनी आंखें फोकस करने में दिक्कत होती है। ऐसा लगता है मानो वे वहाँ हैं भी, और नहीं भी हैं।
कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं वास्तव में इस जगह में रहने के लायक नहीं हूँ। यह जगह इतनी शानदार है कि मेरे जैसे बेवकूफ़ को, जिसकी इतनी सारी विवशताएँ और सीमाएँ हैं, यहाँ होना ही नहीं चाहिए। लेकिन फिर मुझे सद्‌गुरु के शब्द याद आते हैं, ‘अगर आप ऊँचा चढ़ना चाहते हैं, तो आपको स्थिरता और संतुलन की ज़रूरत है। स्थिरता और संतुलन के बिना, आपके द्वारा जीवन में उठाया गया हर कदम एक आधा-अधूरा कदम होगा।’ मैं जानता हूँ कि मैं अपने जीवन में आधे-अधूरे कदम ही उठा रहा हूँ। मुझे अधिक स्थिरता और संतुलन की जरूरत है। और इस पर काम करने के लिए मेरे पास साधन हैं। मैं बस सुबह होने का इंतज़ार करता हूँ, ताकि मैं अपना योग-मैट लेकर साधना हॉल जाऊं, अपनी साधना करूं, और उस दिशा में कम से कम एक छोटा सा कदम उठा पाऊँ.

( यह लेख 'ईशा हिंदी ब्लॉग' से उद्धृत एवं मेरे द्वारा संशोधित)

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